श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 17/53-58 सतरहवाँ अध्याय 427 अनुवाद—हाय-हाय! सखि, क्या उपाय करूँ! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मुझे कहाँ जानेपर श्रीकृष्ण मिलेंगे? श्रीकृष्णके बिना तो मेरे प्राण ही निकले जा रहे हैं॥” 53 ॥ निराशाकी आकाङ्क्षा और आदर :— क्षणे मन स्थिर हय, तबे मने विचारय, बलिते हइल भावोद्गम। पिङ्ग्लार वचन-स्मृति, कराइल भाव-मति, ताते करे अर्थ-निर्धारण ॥ 54 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका मन क्षण भरके लिये स्थिर हो गया और उन्होंने मनमें कुछ विचार किया। वे जब कुछ बोलने लगे, तब उनमें एक भाव उत्पन्न हुआ जिसने उन्हें पिङ्गलाके वचनका स्मरण करा दिया। तब वे पिङ्गलाके वचनका अर्थ-निर्धारण करने लगे॥ 54 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पिङ्ग्लार वचनकी स्मृति,'—पिङ्गला वेश्याने जो कहा था,—“आशा हि परमं दुखं, नैराश्यं परमं सुखम्” [अर्थात् इस संसारमें आशा ही मनुष्योंके परम दुःख और आशाका त्याग ही परम सुखका कारण होता है]। उस बातको स्मरण करके महाप्रभुमें भावका उदय हुआ और वे उसका अर्थ निर्धारित करने लगे॥ 54 ॥ अनुभाष्य—'पिङ्गलोपाख्यान'—भाः 11/8/22-44 संख्या एवं महाभारतमें शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वका 174 वाँ अध्याय देखें॥ 54 ॥ श्रीकृष्ण-विस्मरणकी चेष्टा :— “देखि एइ उपाये, कृष्ण-आशा छाड़ि दिये, आशा छाड़िले सुखी हय मन। छाड़ि' कृष्णकथा अधन्य, कह अन्यकथा धन्य, याते हय कृष्णविस्मरण ॥” 55 ॥ श्रीकृष्णके द्वारा अप्राकृत कामदेवके स्वरूपमें हृदयपर अधिकार :— कहिते हइल स्मृति, चित्ते हैल कृष्णस्फूर्त्ति, सखीरे कहे हञा विस्मिते। “यारे चाहि छाड़िते, से शुञा आछे चित्ते, कोन रीते ना पारि छाड़िते ॥” 56 ॥ राधाभावेर स्वभाव आन, कृष्णे कराय 'काम'-ज्ञान, काम-ज्ञाने त्रास हैल चित्ते। कहे, “ये जगत् मारे, से पशिल अन्तरे, एइ वैरी ना देय पासरिते ॥” 57 ॥ अनुवाद—“मैं एक उपाय देख रही हूँ कि श्रीकृष्णकी प्राप्तिकी आशाको ही छोड़ दिया जाय। उस आशाको छोड़नेसे मन सुखी हो जायेगा। दुःख प्रदान करनेवाली कृष्णकथाको छोड़कर कोई अन्य सुखप्रद कथा सुनाओ, जिससे श्रीकृष्णका विस्मरण हो सके।” ऐसा कहते ही श्रीमती राधिकाको श्रीकृष्णका स्मरण हो आया और चित्तमें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हो आयी। वे विस्मित होकर सखियोंसे कहने लगीं,—“मैं जिन्हें छोड़ना चाहती हूँ, वे तो मेरे हृदयमें शयन कर रहे हैं, मैं किसी भी प्रकारसे उन्हें छोड़ नहीं सकती।” श्रीराधाके स्वभावने उन्हें बोध करवा दिया कि श्रीकृष्ण साक्षात् कामदेव हैं और मनमें ऐसा भाव आते ही उनका चित्त भयभीत हो उठा। वे कहने लगीं,—“यह कामदेव जो समस्त जगत्को परास्त करता है और मेरे हृदयमें प्रवेश कर गया है, वह वैरी मुझे श्रीकृष्णको भुलाने नहीं देता!” 55-57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कृष्णे कराय 'काम'-ज्ञान,'— कृष्णको कन्दर्प बोध कराता है॥ 57 ॥ अनुभाष्य—'मारे',—'मार' अर्थात् कामदेवके रूपमें पराजित करता है॥ 57 ॥ श्रीकृष्णके लिये उत्सुकता :— औत्सुक्येर प्राधान्य, जिनि' अन्य भाव-सैन्य, उदय हैल निज राज्य-मने। मने हइल लालस, ना हय आपन-वश, दुःखे मने करेन भर्त्सने ॥ 58 ॥