श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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426 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/51-53 ] हे सख्यः, [तत्] इह (विप्रलम्भे वैशसे) किं कृणमः [येन तद्दर्शनं स्यात्?] कस्य ब्रूमः [यूयम् अपि तुल्यावस्थाः एव, तस्य] आशया (कृष्णलाभाशया) यत्कृतम् (अनुष्ठितं), तत् कृतम्; अन्यां (कामपि) धन्यां (पुण्यां) कथां कथयत; अहो (कष्टम्) हृदयेशयः (कामः शत्रुः मम हृदयमध्ये वसतीति न त्याज्यः अतः अयमेव मां मारयतीति किं कुर्मः?) बत (खेदे) मधुरमधुरस्मेराकारे (मधुरादपि मधुरः स्मेरः मदनमदादिभिः उत्फुल्लश्च आकारः आकृतिः यस्य तस्मिन्) मनोनयनोत्सवे (मनोनयनयोः उत्सव यस्मात् तस्मिन्) कृष्णे कृपणकृपणा (कृपणादपि कृपाणा उत्कण्ठया सुकातरा) तृष्णा चिरम् (अनुक्षणं) लम्बते (वर्धते)। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि! इस विरहके कष्टमें हाय, मैं क्या करूँ (जिससे उनका दर्शन मिले)? किसको कहूँ (तुम भी तो मेरे समान विरहमें दुःखी हो)! कृष्णको पानेकी आशामें मैंने जो किया है, सो किया, अब अन्य कोई अच्छी बात बतलाओ। (कामरूपमें) वे ही मेरे हृदयमें सोये हुए हैं, अतएव उनकी बात करना मैं किस प्रकार छोड़ूँ? उन मधुर-हास्य-मूर्ति मन और नयनके उत्सवस्वरूप कृष्णमें मेरी दैन्यभावमयी (दीन) तृष्णा प्रतिक्षण वर्धित हो रही है॥ 51 ॥ अमृतानुकणिका—पहले आवेगके उदय होनेके कारण श्रीराधा कह रही हैं,―'हे सखियों! इस विपदाके समय मैं अब क्या करूँ, जिससे उनके दर्शन प्राप्त हों।' उसके पश्चात् सखियोंको भी दुःखी देखकर चिन्ताके उदय होनेपर कह रही हैं,―'किसको कहूँ, क्योंकि सखियाँ भी मेरे समान दुःखी हैं, मेरा और कौन है, किससे पूछूँ, कौन मेरे मङ्गलका उपाय बतलायेगा?' उसी समय चिन्ताको आच्छादित करके 'मति' नामक भावके उदय होनेपर पिङ्गलाके वचनके ('आशा ही परमं दुःखं'के) समान कह रही हैं,—'कृष्णप्राप्तिकी आशामें जो किया, सो किया, और कुछ करनेका अब कोई प्रयोजन नहीं है। अर्थात् जो कुछ भी किया, वह सब व्यर्थ ही था, इसलिये उस आशाका परित्याग करना ही उचित है।' उसी समय 'अमर्ष'के उदय होनेपर एक सखीसे कह रही हैं,―'उन अकृतज्ञ कृष्णकी बातको छोड़कर तुम अन्य कोई पुण्य बात बोलो।' उसी समय ही हृदयमें कृष्णकी स्फूर्ति होते ही उन्हें बाणके द्वारा बींधनेवाले कामदेव मानकर उस अमर्षभावको आच्छादित करके 'त्रास'के उदय होनेपर व्याकुलता सहित कह रही हैं,―'हाय! कैसा कष्ट! जिनको छोड़नेका विचार कर रही हूँ, वे ही मेरे हृदयमें शयन कर रहे हैं, वह शत्रु काम मुझे पीड़ा दे रहा है, अब क्या करूँ?' उसके पश्चात् उस व्याकुलताको आच्छादित करके स्वाभाविक औत्सुक्यके उदय होनेपर कह रही हैं,―'वेश्या पिङ्गलाने भी नैराश्यको ही परम सुखका विषय कहा है, किन्तु हम श्रीकृष्णके विषयमें इस प्रकारकी आशाको त्याग करनेमें असमर्थ हैं। परित्यागकी बात तो दूर रहे, अपितु उन मधुर-हास्य-मूर्ति मन और नयनके उत्सवस्वरूप (आनन्दप्रदायक) कृष्णके प्रति तृष्णा प्रतिक्षण ही वर्धित हो रही है। वह तृष्णा दीन होनेपर भी उत्कण्ठावशतः अतिदीन हो रही है।'―(श्रील कविराज गोस्वामी टीका) ॥ 51 ॥ श्लोकार्थ; श्रीमतीकी श्रीकृष्णविरह-व्याकुलताका वर्णन :- यथा राग- “एइ कृष्णेर विरहे, उद्वेगे मन स्थिर नहे, प्राप्त्युपाय चिन्तन ना याय। येबा तुमि सखीगण, विषादे बाउल मन, कारे पुछौं, के कहे उपाय ?? 52 ॥ अनुवाद—“इन श्रीकृष्णके विरहमें उद्विग्न होनेके कारण मेरा मन स्थिर नहीं है, मैं उनकी प्राप्तिके उपायका भी चिन्तन नहीं कर पा रही हूँ। हे मेरी सखियों! विषादके कारण तुम्हारा मन भी पागल जैसा हो गया है, किससे पूछें, हमें कौन कोई उपाय बता सकता है ?52 ॥ हाहा सखि, कि करि उपाय! क्या करौं, काँहा याङ, काँहा गेले कृष्ण पाङ, कृष्ण बिना प्राण मोर याय ॥”53 ॥