श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 17/41-51 सतरहवाँ अध्याय 425 जीवन-स्वरूप है; उसकी आशामें ही कर्ण-चकोर जीवित रहता है; कभी तो भाग्यवशतः उसे प्राप्त करता है, कभी अभाग्यवशतः उसे प्राप्त नहीं कर पाता; जब प्राप्त नहीं कर पाता, तब प्याससे वह मरणापन्न हो जाता है। पुनः उनकी वेणुकी मधुरध्वनि एकबार सुननेपर जगत्की नारियोंका चित्त शिथिल हो जाता है, नाड़ेका बन्धन ढीला पड़ जाता है एवं वे बिना मूल्यकी दासी होकर पागलोंकी भाँति कृष्णकी ओर दौड़ पड़ती हैं। और भी लक्ष्मी ठाकुराणी उनकी मुरलीकी ध्वनि श्रवण करके प्रत्याशासे कृष्णके निकट आकर भी कृष्णके सङ्गको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण उनकी तृष्णा-तरङ्ग और बढ़ जाती है; उसीकी आशासे वे तपस्या करके भी कृष्णको प्राप्त नहीं कर पातीं। ये चार प्रकारके शब्दामृत अर्थात् वचन, नूपुर-कङ्कणका शब्द, कण्ठकी ध्वनि और मुरलीध्वनि भाग्यवान् लोगोंके कानोंमें ही प्रवेश करते हैं। जिनके कानोंमें इन चार प्रकारके शब्दामृतने प्रवेश नहीं किया, उन कानोंका जन्म ही व्यर्थ है; कानी-कौड़ीकी भाँति वे कान-निरर्थक हैं। अनुवाद-इस प्रकार विलाप करते-करते महाप्रभुके मनमें उद्वेग और भाव उदित हो आये, उनका मन निराश्रय होकर व्याकुल हो गया। उनमें उद्वेग, विषाद, मति, औत्सुक्य, त्रास, धृति और स्मृति आदि अनेक सञ्चारी भाव एक साथ मिलित होकर उदित हो आये। भाव-शाबल्यसे [सञ्चारी भावोंमें परस्पर युद्ध होनेपर पूर्ववर्ती भावको दबाकर दूसरे भावका उदय होनेसे] श्रीराधाके मुखसे निकली वाणी लीलांशुक श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुरके हृदयमें स्फुरित हुई थी। महाप्रभुने भी श्रीराधाके उन्हीं भावोंमें विभावित एक श्लोकका पाठ किया। महाप्रभु उन्मादकी अवस्थामें उस श्लोकका ऐसा अर्थ करने लगे, जिसे इस जगत्का कोई भी व्यक्ति नहीं जानता था॥ 49-50॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'लीलांशुक',-बिल्वमङ्गल गोस्वामी॥ 50॥ अनुभाष्य-[लीलाशुकेके] पाठान्तरमें, -लीलासुख ॥ 50 ॥ 'घटक',-एक प्रकारका पक्षी। 'शब्द, अर्थ, दुइ शक्ति', - 'अभिधा' और 'लक्षणा', ये दो शब्दकी शक्तियाँ हैं; उनमें अर्थालङ्कार आदि ही अर्थशक्ति है॥ 41-48॥ श्रीराधाकी उक्ति :- बिल्वमङ्गल-कृत कृष्णकर्णामृतमें (42 वाँ श्लोक)- किमिह कृणुमः कस्य ब्रूमः कृतं कृतमाशया कथयत कथमन्यां धन्यामहो हृदयेशयः। मधुरमधुरस्मेराकारे मनो नयनोत्सवे कृपणकृपणा कृष्णे तृष्णा चिरं बत लम्बते॥ 51॥ महाप्रभुका भाव-शाबल्य :- करिते ऐछे विलाप, उठिल उद्वेग, भाव, मने काहो नाहि आलम्बन । उद्वेग, विषाद, मति, औत्सुक्य, त्रास, धृति, स्मृति, नानाभावेर हइल मिलन॥ 49॥ श्रीकृष्ण विरहोन्माद :- भावशाबल्ये राधार उक्ति, लीलाशुके हैल स्फूर्ति, सेइ भावे पड़े एक श्लोक । उन्मादेर सामर्थ्ये, सेइ श्लोकेर करे अर्थे, येइ अर्थ नाहि जाने लोक॥ 50॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 51॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हाय, मैं क्या करूँ ! किसको कहूँ! उसकी आशामें मैंने जो किया है, सो किया, अब अन्य कोई अच्छी बात बतलाओ। (कामरूपमें) वे ही मेरे हृदयमें सोये हुए हैं, अतएव उनकी बात करना मैं किस प्रकार छोड़ूँ? उन मधुर-हास्य-मूर्ति मन और नयनके उत्सवरूप कृष्णमें मेरी दैन्यभावमयी (दीन) तृष्णा सर्वदा वृद्धिका अवलम्बन कर रही है (बढ़ रही है) ॥ 51॥ अनुभाष्य-