भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2446, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2446

[ 17/64-72 सतरहवाँ अध्याय 429 विकार उत्पन्न होते, जब अनन्तदेव केवल उन्हींका सैकड़ों मुखोंसे वर्णन करके भी उनका पार नहीं पा सकते, तब मेरे जैसा दीन-हीन जीव उनका क्या वर्णन करेगा? मैं तो केवल शाखाचन्द्र-न्यायकी भाँति दिग्दर्शन करवा रहा हूँ॥ 64-65 ॥ अनुभाष्य—श्रीगौराङ्गकी दिव्योन्माद-चेष्टा विषयिणी लीला वर्णन करनेमें सहस्र मुखोंसे अनन्त-शक्तिमान् अनन्तदेव भी समर्थ नहीं हैं; मैं—दीन शक्तिहीन, अत्यन्त असमर्थ जीव हूँ, इसलिये सम्पूर्ण रूपसे गौरलीलाका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हुआ हूँ; तथापि दिशा निरूपित करनेके लिये मैंने शाखाचन्द्रन्याय-मात्रका आश्रय लिया है॥ 65 ॥ महाप्रभुके दिव्योन्माद-श्रवणसे प्रेमतत्त्वके ज्ञानका उदय :— इहा येइ शुने, तार जुड़ाय मन-काण। अलौकिक गूढ़प्रेम चेष्टा हय ज्ञान॥ 66 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके दिव्योन्मादके विषयमें जो कुछ मैंने संक्षेपमें वर्णन किया है, उसे जो भी श्रवण करता है उसके कान और मन आनन्दित हो जाते हैं एवं उसे अलौकिक गूढ़ कृष्णप्रेमकी चेष्टाओंको समझनेकी योग्यता प्राप्त हो जाती है॥ 66 ॥ श्रीमतीके भावमें महाप्रभुके द्वारा स्वयं श्रीकृष्णप्रेमका आस्वादन और जीवोंमें उसका वितरण :— अद्भुत निगूढ़ प्रेमेर माधुर्य-महिमा। आपनि आस्वादि' प्रभु देखाइला सीमा॥ 67 ॥ अनुवाद—प्रेमके माधुर्यकी महिमा आश्चर्यजनक रूपसे निगूढ़ है। महाप्रभुने उसका स्वयं आस्वादन करके उसकी सीमाको दिखलाया है॥ 67 ॥ महावदान्य और श्रीकृष्णप्रेम-प्रदाता :— अद्भुत-दयालु चैतन्य—अद्भुत-वदान्य। ऐछे दयालु दाता लोके शुने नाहि अन्य॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु अद्भुत दयालु हैं और अद्भुत उदार हैं। हमने इस जगत्में उनके अतिरिक्त किसी ऐसे दयालु दाताके विषयमें नहीं सुना है॥ 68 ॥ श्रीचैतन्यके भजनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— सर्वभावे भज, लोक, चैतन्य-चरण। याहा हैते पाइबा कृष्णप्रेमामृत-धन॥ 69 ॥ अनुवाद—आप सब श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका सभी प्रकारसे एकान्तिक भजन कीजिये, जिससे आपको कृष्णप्रेमामृतरूपी धनकी प्राप्ति होगी॥ 69 ॥ अनुभाष्य—'सर्वभावे',—सब प्रकारसे, एकान्त भावसे॥ 69 ॥ महाप्रभुका दिव्योन्माद (उद्घूर्णा और चित्रजल्प) वर्णित :— एइ त' कहिलुँ प्रभुर 'कूर्माकृति'-भाव। उन्माद-चेष्टित ताते उन्माद-प्रलाप॥ 70 ॥ अनुवाद—मैंने महाप्रभुकी भावावस्थामें प्रकाशित कूर्माकृतिका वर्णन किया है, जिसमें उनकी उन्मादग्रस्त चेष्टाओं और उन्माद-प्रलापका भी वर्णन हुआ है॥ 70 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा स्वरचित ग्रन्थमें महाप्रभुकी यह लीला-वर्णित :— एइ लीला स्वग्रन्थे रघुनाथ-दास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश॥ 71 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित चैतन्यस्तव- कल्पवृक्षमें उपरोक्त लीलाको प्रकाशित किया है॥ 71 ॥ (स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष स्तवका पाँचवाँ श्लोक)— अनुद्घाट्य द्वारत्रयमुरु च भित्त्रित्रयमहो विलङ्घ्योच्चैः कालिङ्गिकसुरभिमध्ये निपतितः। तनुद्यत्सङ्कोचात् कमठ इव कृष्णोरुविरहात्- विराजन् गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति॥ 72 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 72 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीकाशीमिश्रके घरके] बन्द