भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2447

430 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/72-73 ] तीनों द्वारोंको खोला नहीं गया, तथापि उस कमरेसे गोदावरी नदी जिस स्थानपर समुद्रसे मिली है, बाहर निकलकर तीन दीवारोंको लाँघकर तैलङ्गी वहाँपर तैलङ्गदेशकी राजधानी 'करिङ्ग' अथवा 'दक्षिण गायोंके बीचमें भूमिपर पड़े हुए और सम्पूर्ण शरीरके कलिङ्ग' अवस्थित थी। तैलङ्गी गायको संस्कृत भाषामें सिकुड़ जानेसे कृष्णविरहमें कछुएकी आकृतिको प्राप्त 'कालिङ्गिक-सुरभि' कहकर लिखा गया है॥72॥ करके जो श्रीगौराङ्गदेव वहाँ विराजमान थे, वे मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त बना रहे हैं॥72॥ सत्रहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। सत्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥73॥ अनुभाष्य- इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे अहो, [काशीमिश्रगृहे] द्वारत्रयम् अनुद्घाट्य (अनुन्मुच्य) कूर्माकारानुभावोन्मादप्रलापो नाम सप्तदशः परिच्छेदः। उरु (उन्नत) भित्तित्रयं (प्राचीरत्रयं) च उच्चैः विलंघ्य अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी (उल्लङ्घ्य) कालिङ्गिकसुरभिमध्ये (त्रैलङ्गदेशान्तर्गत करिङ्ग- कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका देशोद्भव-गोषु मध्ये) निपतितः कृष्णोरुविरहात् (कृष्णस्य वर्णन कर रहा है॥73॥ विषमविच्छेदात्) तनूद्यत्सङ्कोचात् (तनौ शरीरे उदयन् यः सङ्कोचः खर्वत्वं तस्मात्) कमठः (कूर्मः) इव विराजन् गौराङ्गः मम हृदये उदयन् मां मदयति (आनन्दयति)। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें कूर्माकार-अनुभाव और श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। उन्माद-प्रलाप नामक सत्तरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।