भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2448

अठारहवाँ अध्याय कथासार—शरत् ऋतुकी ज्योत्स्ना रात्रिमें किसी एक दिन महाप्रभु आइतोटासे समुद्रके दर्शन करके उसमें यमुनाके भ्रमवशतः जलमें कूद पड़े;—राधाकृष्णकी जलकेलि-लीलाका आस्वादन ही इस लीलाका तात्पर्य है। इस प्रकार बहते-बहते महाप्रभु कोणार्ककी ओर चले गये। एक मछुवारेने उन्हें 'बड़ी मछली' समझकर उन्हें जालके द्वारा खींचकर देखा कि अचेतन अवस्थामें महाप्रभुकी आकृति अत्यन्त विकृत हो गयी है। महाप्रभुको स्पर्श करने मात्रसे ही उसमें प्रेमका आवेश हो गया। उसे भय हुआ कि उसके (कन्धेके) ऊपर यह भूत आकर बैठ गया है, इसलिये वह ओझाके पास जाने लगा। उसी समय महाप्रभुको अनेक स्थानोंपर नाना प्रकारसे ढूँढ़ते हुए श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी आदिकी तटके साथ-साथ चलते हुए उस मछुवारेसे भेंट हुई। उससे महाप्रभुके विषयमें पूछनेपर उस मछुवारेने अपना सारा वृत्तान्त बतलाया। तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने देखा कि वह मछुवारा महाप्रभुको तटपर ले आया है। उन्होंने कृष्णनामका थप्पड़ लगाकर मछुवारेको भयरूपी भूतसे छुड़वा दिया। बादमें महाप्रभुको नामकीर्तनके द्वारा सचेतन करके उठाया और उनकी लीला श्रवण करके उन्हें घरमें ले आये। —(अमृतप्रवाह भाष्य) समुद्रको यमुना समझकर उसमें बहनेवाले श्रीकृष्णविरही महाप्रभुकी कृपाकी याचना :— शरज्ज्योत्स्ना-सिन्धोरवकलनया जातयमुना- भ्रमाद्धावन् योऽस्मिन् हरिविरहतापार्णव इव । निमग्नो मूर्च्छानः पयसि निवसन् रात्रिमखिलां प्रभाते प्राप्तः स्वैरवतु स शचीसूनुरिह नः ॥ १ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो शरत्-कालीय [मेघरहित] ज्योत्स्ना-रात्रिमें समुद्रको देखकर यमुनाके भ्रमसे हरिविरहके ताप-समुद्रमें निमग्न होकर जलमें गिरकर सम्पूर्ण रात्रि मूर्च्छित थे और प्रातःकालमें (श्रीस्वरूपादि अपने अन्तरङ्ग भक्तोंके द्वारा) प्राप्त हुए थे, वे शचीनन्दन अपनी लीलाके द्वारा हमारा पालन करें ॥ १ ॥ अनुभाष्य— यः (शचीनन्दनः) शरज्ज्योत्स्ना-सिन्धोः (शरदि शरत्कालीन- मेघरहिते व्योम्नि वा ज्योत्स्ना तया विभावितः यः सिन्धुः तस्य) अवकलनया (सन्दर्शनेन) जातयमुना-भ्रमात् (जातः यः यमुनायाः भ्रमः तस्मात् हेतोः) धावन् हरिविरहतापार्णवे (कृष्णविच्छेदक्लेशसमुद्रे) इव अस्मिन् (पयसि) मूर्च्छानः (निमग्नः सन्) अखिलां (समस्तां) रात्रिं निवसन् प्रभाते स्वैः (स्वीयैः अन्तरङ्गभक्तैः) प्राप्तः, सः शचीसूनुः (गौरः) इह नः (अस्मान्) अवतु (रक्षतु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, समस्त गौरभक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥ महाप्रभुका तीव्र श्रीकृष्णविरह :— एइमते महाप्रभु नीलाचले बैसे। रात्रि-दिने कृष्णविच्छेदार्णवे भासे ॥ ३ ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु नीलाचलमें वास करते हुए रात-दिन कृष्णविरहरूपी समुद्रमें निमज्जित रहते थे ॥ ३ ॥