भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2449, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2449

432 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/4-13 ] शारदीय ज्योत्स्ना-रात्रिमें रासलीलाका उद्दीपन :- शरत्कालेर रात्रि, सब चन्द्रिका उज्ज्वल। प्रभु निजगण लञा बेड़ान रात्रिसकल॥४॥ अनुवाद—शरत्-कालकी रात्रिमें पूर्णचन्द्र अपनी किरणोंसे सभी स्थानोंको उज्ज्वल कर रहा था और महाप्रभु अपने निजगणोंके साथ पूरी रात इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे॥४॥ उद्याने उद्याने भ्रमेन कौतुक देखिते। रासलीलार गीत-श्लोक पड़िते शुनिते॥५॥ अनुवाद—महाप्रभु एक उद्यानसे दूसरे उद्यानमें कौतुक देखनेके लिये रासलीलाके गीत और श्लोकोंको पढ़ते और सुनते हुए भ्रमण कर रहे थे॥५॥ कभु प्रेमावेशे करेन गान, नर्त्तन। कभु प्रेमावेशे रासलीलानुकरण॥६॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रेमके आवेशमें कभी गान, तो कभी नृत्य कर रहे थे। और कभी वे प्रेमावेशमें रासलीलाका अनुकरण कर रहे थे॥६॥ कभु भावोन्मादे प्रभु इति-उति धाय। भूमे पड़ि' कभु मूर्च्छा, कभु पड़ि' याय॥७॥ अनुवाद—महाप्रभु कभी भावोन्माद अवस्थामें इधर-उधर दौड़ने लगते, कभी भूमिपर गिर पड़ते, कभी मूर्च्छित हो जाते और कभी भूमिपर लोट-पोट खाने लगते॥७॥ रासलीलार एक श्लोक यबे पड़े, सुने। पूर्ववत् तबे अर्थ करेन आपने॥८॥ अनुवाद—जब महाप्रभु रासलीलाके किसी एक श्लोकको पढ़ते अथवा सुनते, तब पहलेकी भाँति वे स्वयं उसका अर्थ भी करते॥८॥ सम्पूर्ण रासपञ्चाध्यायके पाठ और व्याख्यामें महाप्रभुका एक ही समयमें हर्ष और विषाद :- एइमत रासलीलाय हय यत श्लोक। सबार अर्थ करे, पाय कभु हर्ष-शोक॥९॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार रासलीलाके पाँचों अध्यायोंमें जितने श्लोक हैं, उन सबका अर्थ किया। वे कभी हर्षित होते, तो कभी शोक करने लगते॥९॥ अनुभाष्य—कृष्णकी सम्भोग-लीलामें 'हर्ष' और गोपियोंकी विप्रलम्भ-लीलामें 'विषाद'॥९॥ ग्रन्थके विस्तारके भयसे उनका वर्णन नहीं करना :- से-सब श्लोकेर अर्थ, से-सब 'विकार'। से-सब वर्णिते ग्रन्थ हय अति विस्तार॥१०॥ अनुवाद—महाप्रभुके द्वारा वर्णित उन सभी श्लोकोंके अर्थ और महाप्रभुमें उदित होनेवाले समस्त विकारोंका वर्णन करनेपर ग्रन्थ बहुत विस्तृत हो जायेगा॥१०॥ द्वादश वत्सरे ये ये लीला क्षणे-क्षणे। अति बाहुल्य-भये ग्रन्थ ना कैलुँ लिखने॥११॥ अनुवाद—महाप्रभुने बारह वर्ष श्रीजगन्नाथपुरीमें रहकर क्षण-क्षणमें जो समस्त लीलाएँ कीं, मैंने ग्रन्थके अति वर्धित हो जानेके भयसे उन्हें नहीं लिखा॥११॥ पहले केवल दिग्दर्शन ही निर्दिष्ट :- पूर्वे येइ देखाञाछि दिक्‌दरशन। तैछे जानिह 'विकार' 'प्रलाप'-वर्णन॥१२॥ अनुवाद—मैंने पहले जिस प्रकार महाप्रभुकी लीलाओंका दिग्दर्शन करवाया है, उसी प्रकार ही महाप्रभुमें प्रकाशित होनेवाले विकार और उनके द्वारा किये गये प्रलापका अब (संक्षेपमें) वर्णन कर रहा हूँ॥१२॥ भगवान् शेष भी महाप्रभुकी लीलाका माप करनेमें असमर्थ :- सहस्र-वदने यबे कहये 'अनन्त'। एकदिनेर लीलार तबु नाहि पाय अन्त॥१३॥