श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2450, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/13-22 अठारहवाँ अध्याय 433 अनुवाद—यदि अनन्तदेव भी अपने सैकड़ों मुखोंसे महाप्रभुकी केवल एक दिनकी लीलाका वर्णन करने लगें, तो भी वे उन लीलाओंका पूर्ण वर्णन नहीं कर पायेंगे॥ 13 ॥ स्वर्गके श्रेष्ठ लेखक गणेशके लिये भी वह सम्पूर्णतः असम्भव :— कोटियुग पर्यन्त यदि लिखये गणेश। एकदिनेर लीलार तबु नाहि पाय शेष ॥ 14 ॥ अनुवाद—करोड़ों युगों तक यदि गणेश भी लिखें, तो भी वे महाप्रभुकी एक दिनकी समस्त लीलाओंका वर्णन नहीं कर सकते ॥ 14 ॥ गोपियोंके प्रेमके दर्शनसे स्वयं श्रीकृष्णका भी विस्मित होना :— भक्तेर प्रेम-विकार देखि' कृष्णेर चमत्कार। कृष्ण यार ना पाय अन्त, केबा छार आर ?? 15 ॥ अनुवाद—भक्तोंके प्रेम-विकारको देखकर स्वयं श्रीकृष्ण भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। श्रीकृष्ण भी जिनका अन्त नहीं पा पाते, तो फिर एक क्षुद्र जीव कैसे उनका पूर्णरूपमें वर्णन कर सकता है ? 15 ॥ गोपीप्रेमको निर्धारित करने और आस्वादनका परिमाण करनेके उद्देश्यसे श्रीकृष्णके द्वारा गोपीभावको स्वीकार करना :— भक्त-प्रेमार ये-दशा, ये-गति-प्रकार। यत दुःख, यत सुख, यतेक विकार ॥ 16 ॥ कृष्ण ताहा सम्यक् ना पारे जानिते। भक्तभाव अङ्गीकारे, ताहा आस्वादिते ॥ 17 ॥ अनुवाद—भक्तकी प्रेमावस्थामें जैसी दशा होती है, जितनी प्रकारकी विभिन्न गतियाँ होती हैं, जितने प्रकारके दुःख-सुख और विकार होते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें सम्पूर्ण रूपसे नहीं जान पाते, इसलिये वे भक्तके भावको अङ्गीकार करके उसका आस्वादन करते हैं॥ 16-17 ॥ श्रीकृष्णप्रेमका अद्भुत विक्रम :— कृष्णेरे नाचाय प्रेमा, भक्तेरे नाचाइ'। आपने नाचये—तिने नाचे एकठानि ॥ 18 ॥ अनुवाद—प्रेम श्रीकृष्णको नचाता है, भक्तोंको नचाता है और स्वयं भी नाचता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण, भक्त और प्रेम—तीनों एक साथ नृत्य करते हैं॥ 18 ॥ श्रीकृष्णमाधुर्यास्वादनरूपी प्रेम—स्वयं भगवान्के वर्णनकी क्षमतासे भी अतीत :— प्रेमार विकार वर्णिते चाहे येइ जन। चान्द धरिते चाहे, येन हञा 'वामन' ॥ 19 ॥ अनुवाद—जो कोई भी व्यक्ति प्रेमके विकारोंका वर्णन करना चाहता है, तो यह ऐसा है जैसे एक बौना व्यक्ति चाँदको पकड़ना चाहता हो ॥ 19 ॥ चित्-परमाणु-कण जीवका अप्राकृत श्रीकृष्णप्रेमसिन्धुके बिन्दुमात्रको ही स्पर्श करनेका अधिकार :— वायु यैछे सिन्धुजलेर हरे एक 'कण'। कृष्णप्रेम-कण तैछे जीवेर स्पर्शन ॥ 20 ॥ क्षणे क्षणे उठे प्रेमार तरङ्ग अनन्त। जीव छार काँहा तार पाइबेक अन्त ?? 21 ॥ अनुवाद—वायु जैसे समुद्रके जलमें-से एक कणको ही ले पाती है, जीव भी वैसे ही कृष्णप्रेमके एक कणको ही स्पर्श कर पाता है। प्रेमकी अनन्त तरङ्गें क्षण-क्षणमें उठती रहती हैं, क्षुद्र-जीव उसका पार कहाँ पा सकता है ? 20-21 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीरामराय आदि श्रीकृष्णशक्तिवर्गका ही महाप्रभुके भावोंकी अनुभूतिमें अधिकार :— श्रीकृष्णचैतन्य याहा करेन आस्वादन। सबे एक जाने ताहा स्वरूपादि 'गण' ॥ 22 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु जिस वस्तुका आस्वादन करते हैं, उसे केवल श्रीस्वरूप दामोदरादि महाप्रभुके अन्तरङ्ग गण ही जानते हैं॥ 22 ॥