भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2451, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2451

434 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/23-30 ] जीव हञा करे येइ ताहार वर्णन। आपना शोधिते तार छोंये एक ‘कण’ ॥ 23 ॥ अनुवाद-जीव होकर भी यदि कोई उस प्रेमविकारका वर्णन करता है, तो वह केवल स्वयंको पवित्र करनेके लिये उसके एक कणको स्पर्श करता है ॥ 23 ॥ गोपियोंके साथ श्रीकृष्णके जलकेलिके श्लोकका पाठ :- एइमत रासेर श्लोक सकल पड़िला। शेषे जलकेलिर श्लोक पड़िते लागिला ॥ 24 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु रासलीलाके समस्त श्लोक पढ़नेके बाद अन्तमें श्रीकृष्णकी जलकेलि लीलाके श्लोक पढ़ने लगे ॥ 24 ॥ श्रीमद्भागवत (10/33/22)में - ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्गसङ्ग- घृष्टस्रजः स कुचकुङ्कुमरञ्जितायाः। गन्धर्वपालिभिरणुद्रुत आविशद्वाः श्रान्तो गजीभिरिभराडिव भिन्नसेतुः ॥ 25 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 25 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हथनियोंके साथ गजराज जिस प्रकार जलक्रीड़ा करता है, उसी प्रकार लोक-धर्मसे अतीत भगवान् श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ रासलीलामें थककर गन्धर्वपतिके समान भँवरोंके द्वारा अनुगत (पीछे पीछे कुन्दमालाकी गन्धसे आकृष्ट) होकर श्रमको दूर करनेकी आशासे जलमें प्रवेश किया। उस समय गोपियोंके कुच-कुङ्कुमसे रञ्जित माला उनके अङ्गसङ्गके द्वारा मर्दित हुई थी ॥ 25 ॥ अनुभाष्य-शुद्धचित्त परीक्षितके निकट महाभागवत परमहंसकुल-चूड़ामणि श्रीशुकदेव अप्राकृत गोपियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी अप्राकृत रासलीलाका वर्णन कर रहे हैं- श्रान्तः, सः (श्रीकृष्णः) श्रमं (क्रीड़ा-क्लान्तिम्) अपोहितुम् (अपनेतुम्) अङ्गसङ्गघृष्टस्रजः (अङ्गसङ्गेन घृष्टा सम्मर्दिता स्रक् कुन्दमाला तस्याः अतएव) कुचकुङ्कुमरञ्जितायाः (कुचकुङ्कुमेन रञ्जितायाः सम्बन्धिनिः) गन्धर्वपालिभिः (गन्धर्वपाः गन्धर्वपतयः इव गायन्ति ये अलयः तैः) अनुद्रुतः (अनुसृतः सन् ताभिः युतः) भिन्नसेतुः (विदारितवप्रः स्वयं भगवान् कृष्णस्तु अतिक्रान्तलोकमर्यादः) गजीभिः इभराट् (गजेन्द्रः इव) वाः (जलम्) आविशत्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 25 ॥ समुद्रको यमुना समझकर महाप्रभुका उसमें कूदना और मूर्च्छा :- एइमत महाप्रभु भ्रमिते भ्रमिते। आइटोटा हैते समुद्र देखेन आचम्बिते ॥ 26 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने इस प्रकार भ्रमण करते-करते अकस्मात् आइटोटासे समुद्रको देखा ॥ 26 ॥ चन्द्रकान्त्ये उथलिल तरङ्ग उज्ज्वल। झलमल करे,-येन 'यमुनार जल' ॥ 27 ॥ यमुनार भ्रमे प्रभु धाञा चलिला। अलक्षिते याइ' सिन्धुजले झाँप दिला ॥ 28 ॥ पड़ितेइ हैल मूर्च्छा, किछुइ ना जाने। कभु डुबाय, कभु भासाय तरङ्गेर गणे ॥ 29 ॥ तरङ्गे बहिया फिरे,-येन शुष्क काष्ठ। के बुझिते पारे एइ चैतन्येर नाट ? ? 30 ॥ अनुवाद-चन्द्रमाकी कान्तिसे समुद्रकी उमड़ती हुई उज्ज्वल तरङ्गैं ऐसे झलमल कर रही थीं जैसे यमुनाका जल हो। महाप्रभु यमुनाके भ्रमसे समुद्रकी ओर दौड़ने लगे और बिना किसीके देखे उन्होंने समुद्रके जलमें छलाँग लगा दी। वे समुद्रके जलमें प्रविष्ट होनेके साथ ही मूर्च्छित हो गये, उन्हें कोई ज्ञान नहीं रहा कि वे कहाँ हैं? समुद्रकी लहरें महाप्रभुको कभी तो डुबो देती और कभी उन्हें ऊपर लाकर तैराने लगतीं। वे समुद्रकी लहरोंके साथ ऐसे बहते जा रहे थे, मानो वे सूखी लकड़ी हों। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी ऐसी लीलाको कौन समझ सकता है ? 27-30 ॥

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