भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2452, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2452

[ 18/31-39 अठारहवाँ अध्याय 435 मूच्छित अवस्थामें बहते-बहते कोणार्ककी ओर जाना :- कोणार्केर दिके प्रभुरे तरङ्गे लञा याय। कभु डुबाञा राखे, कभु भासाञा लञा याय॥ 31॥ अनुवाद—समुद्रकी लहरें महाप्रभुको कोणार्ककी ओर ले जा रही थीं, कभी वे उन्हें डुबोकर और कभी उन्हें ऊपर बहाते हुए ले जा रही थीं॥ 31॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कोणार्क',—'अर्कतीर्थ', जिसे आजकल 'कोणारक' कहते हैं॥ 31॥ अनुभाष्य—'कोणार्क',—उत्तर-अक्षांश 19°53′ 25″; पुरीसे उन्नीस मील उत्तरमें समुद्रतटपर स्थित। तेरहवीं शक-शताब्दीके प्रारम्भमें इस स्थानपर वास्तुशिल्पकी निपुणताके उत्कृष्ट उदाहरणस्वरूप काले पत्थरके सूर्य-मन्दिरके निर्माणका प्रयास हुआ॥ 31॥ भावमें निमग्न गोपी-किङ्करी-अभिमानी महाप्रभुकी उद्घूर्णा :- यमुनाते जलकेलि गोपीगण-सङ्गे। कृष्ण करेन, महाप्रभु मग्न सेइ रङ्गे॥ 32॥ अनुवाद—'श्रीकृष्ण गोपियोंके साथ यमुनामें जलकेलि कर रहे हैं'—महाप्रभु इसी लीलाके आनन्दमें निमग्न थे॥ 32॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 18/80-82 संख्या देखें॥ 32॥ श्रीस्वरूपादिके द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना :- इँहा स्वरूपादिगण प्रभु ना देखिया। 'काँहा गेला प्रभु?' कहे चमकित हञा॥ 33॥ अनुवाद—इधर श्रीस्वरूप दामोदर आदि महाप्रभुको नहीं देखकर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे,—'महाप्रभु कहाँ चले गये?' 33॥ निरङ्कुश इच्छाशक्तिके परिचालक महाप्रभुके प्रति स्वतन्त्र-ज्ञान :- मनोवेगे गेला प्रभु, देखिते नारिला। प्रभुरे ना देखिया संशय करिते लागिला॥ 34॥ मन-मनमें वितर्क :- 'जगन्नाथ देखिते, किंवा देवालये गेला? अन्य उद्याने किंवा उन्मादे पड़िला?? 35॥ गुण्डिचा-मन्दिरे गेला, किंवा नरेन्द्ररे? चटक-पर्वते गेला, किंवा कोणार्के??'36॥ अनुवाद—महाप्रभु मनके वेगसे चले गये, कोई उन्हें देख नहीं पाया। श्रीस्वरूप दामोदरादि महाप्रभुको नहीं देखकर कुछ संशय करते हुए कहने लगे,—'कहीं वे श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये मन्दिर तो नहीं गये हैं अथवा किसी अन्य उद्यानमें उन्मादग्रस्त होकर गिर पड़े हैं? क्या महाप्रभु गुण्डिचा मन्दिरमें गये हैं या नरेन्द्र सरोवर गये हैं अथवा चटक पर्वतपर गये हैं या फिर कोणार्क तो नहीं चले गये हैं?' 34-36॥ समुद्रके तटपर गमन :- एत बलि' सबे फिरे प्रभुरे चाहिया। समुद्रेर तीरे आइला कतजन लञा॥ 37॥ महाप्रभुके नहीं मिलनेपर उनके अन्तर्धानका अनुमान :- चाहिये बेड़ाइते ऐछे रात्रि शेष हैल। 'अन्तर्धान हइला प्रभु',—निश्चय करिल॥ 38॥ मन-ही-मन भक्तोंके द्वारा अमङ्गलकी आशङ्का :- प्रभुर विच्छेदे कार देहे नाहि प्राण। अनिष्टाशङ्का बिना कार मने नाहि आन॥ 39॥ अनुवाद—ऐसा कहते हुए सभी भक्त महाप्रभुको ढूँढ़ते हुए इधर-उधर घूमने लगे। श्रीस्वरूप दामोदर कुछ भक्तोंको अपने साथ लेकर समुद्रके तटपर आ गये। महाप्रभुको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते रात्रि समाप्त हो गयी और उन्होंने यह निश्चय किया,—'महाप्रभु अन्तर्धान हो गये हैं।' महाप्रभुके विरहमें सभीको लगा कि उनकी देहमें प्राण नहीं हैं। महाप्रभुके अनिष्टकी आशङ्काको छोड़कर किसीके मनमें अन्य कोई बात नहीं आ रही थी॥ 37-39॥