भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2453

436 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/40-51 ] प्रियहृदयमें प्रियके अदर्शन-हेतु अमङ्गलकी आशङ्का :- अभिज्ञानशकुन्तल-नाटकके चतुर्थ अङ्कमें शकुन्तलाके प्रति प्रियम्वदा-वचन- अनिष्टाशङ्कीनि बन्धुहृदयानि भवन्ति हि ॥ 40 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बन्धुका हृदय सदैव बन्धुके अनिष्टकी आशङ्का करता है॥ 40 ॥ अनुभाष्य—मूलग्रन्थमें—"सिनेहो पावसङ्की" अथवा "सिनेहो पावमासङ्कादि"—ऐसा पाठ देखा जाता है॥ 40 ॥ सभीके द्वारा मिलकर महाप्रभुको ढूँढ़ना :- समुद्रेर तीरे आसि' युकति करिला। चिरायु-पर्वत-दिके कतजन गेला ॥ 41 ॥ अनुवाद—उन सबने समुद्रके तटपर आकर कुछ विचार-विमर्श किया। तब कुछ भक्त चिरायु-पर्वतकी ओर गये ॥ 41 ॥ अनुभाष्य—'चिरायु-पर्वत',—चटक-पर्वत ॥ 41 ॥ पूर्व दिशाय चले स्वरूप लञा कतजन। सिन्धु-तीरे-नीरे करेन प्रभुर अन्वेषण ॥ 42 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर कुछ भक्तोंको अपने साथ लेकर पूर्व दिशाकी ओर चल दिये। वे महाप्रभुको समुद्रके तटपर और जलमें भी ढूँढ़ने लगे ॥ 42 ॥ विषादे विह्वल सबे, नाहिक 'चेतन'। तबु प्रेमे बुले करि' प्रभुर अन्वेषण ॥ 43 ॥ अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके विरह-दुःखसे ऐसे विह्वल हो रहे थे मानो उनकी चेतना लुप्त हो गयी हो। तो भी वे महाप्रभुके प्रेमके कारण उन्हें ढूँढ़ते हुए इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे॥ 43 ॥ अद्भुत-भावाविष्ट एक मछुवारेके साथ साक्षात्कार :- देखेन, एक जालिया आइसे कान्धे जाल करि'। हासे, कान्दे, नाचे, गाय, बले 'हरि' 'हरि' ॥ 44 ॥ अनुवाद—तभी श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंने देखा कि एक मछुवारा अपने कन्धेपर जाल डालकर आ रहा है। वह 'हरि', 'हरि' बोलते हुए कभी हँस रहा था, कभी रो रहा था, कभी नाच रहा था और कभी गा रहा था॥ 44 ॥ मछुवारेसे उसके भावावेशके कारणकी जिज्ञासा :- जालियार चेष्टा देखि' सबार चमत्कार। स्वरूप-गोसाञि तारे पुछेन समाचार ॥ 45 ॥ ग्रह-आविष्ट मछुवारेके द्वारा महाप्रभुके संवाद और उनकी अवस्थाका वर्णन :- "कह जालिया, एइ दिके देखिला एकजने? तोमार एइ दशा केने,—कह त' कारण??" 46 ॥ अनुवाद—उस मछुवारेके व्यवहारको देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गये। श्रीस्वरूप दामोदरने उस मछुवारेसे जानकारी लेनेके लिये पूछा,—"हे मछुवारे ! बतलाओ तो, क्या तुमने इस तरफ किसी एक अकेले व्यक्तिको देखा है? तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही है—इसका कारण तो बतलाओ?" 45-46 ॥ जालिया कहे,—"इँहा एक मनुष्य ना देखिल। जाल बाहिते एक मृत मोर जाले आइल ॥ 47 ॥ बड़ मत्स्य बलि' आमि उठाइलुँ यतने। मृतक देखिते मोर भय हैल मने ॥ 48 ॥ जाल खसाइते तार अङ्ग-स्पर्श हइल। स्पर्शमात्रे सेइ भूत हृदये पशिल ॥ 49 ॥ भये कम्प हैल, मोर नेत्रे बहे जल। गद्गद वाणी रोम उठिल सकल ॥ 50 ॥ किवा ब्रह्मदैत्य, किवा भूत, कहने ना याय। दर्शनमात्रे मनुष्येर पशे सेइ काय ॥ 51 ॥ अनुवाद—मछुवारेने कहा,—"मैंने यहाँ किसी अकेले मनुष्यको नहीं देखा, किन्तु जब मैंने समुद्रमें जाल