भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2454

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[ 18/47-62 अठारहवाँ अध्याय 437 फेंका तो एक मृत व्यक्ति मेरे जालमें आ गया। मैंने उसे बहुत बड़ी मछली समझकर बहुत परिश्रमसे बाहर निकाला, किन्तु मेरे मनमें मृत व्यक्तिको देखकर भय उत्पन्न हो गया। उस व्यक्तिको जालसे छुड़ाते समय मेरा उसके शरीरसे स्पर्श हो गया। स्पर्शमात्रसे वह भूत मेरे हृदयमें प्रविष्ट हो गया। मैं भयसे काँपने लगा, मेरे नेत्रोंसे अश्रु बहने लगे, मेरी वाणी गद्गद हो गयी और मुझमें रोमाञ्च होने लगा। वह कोई ब्रह्म-दैत्य है अथवा कोई भूत, यह मैं कह नहीं सकता। दर्शन करने मात्रसे ही वह मनुष्यके शरीरमें प्रवेश कर जाता है॥ 47-51 ॥ शरीर दीघल तार-हात पाँच-सात। एक हस्त पद तार, तिन तिन हात ॥ 52 ॥ अस्थि-सन्धि छुटि' चर्म करे नड़बड़े। ताहा देखि' प्राण कार नाहि रहे धरे ॥ 53 ॥ मड़ा रूप धरि' रहे उत्तान-नयन। कभु गोँ गोँ करे, कभु देखि अचेतन ॥ 54 ॥ साक्षात् देखेछौं, - मोरे पाइल सेइ भूत। मुइ मैले मोर कैछे जीवे स्त्री-पूत ॥ 55 ॥ सेइ त' भूतेर कथा कहन ना याय। ओझा ठाञि याइछौं, - यदि से भूत छोड़ाय ॥ 56 ॥ अनुवाद-उसका शरीर पाँच-सात हाथ लम्बा है, उसका एक-एक हाथ-पाँव तीन-तीन हाथ लम्बा है। उसकी हड्डियोंके जोड़ खुल गये हैं और उसकी त्वचा लटक गयी है। उसे देखकर कोई प्राण धारण नहीं कर सकता। उसने मरे हुए व्यक्तिकी भाँति रूप धारण किया हुआ है और उसके नेत्र ऊपर चढ़े हुए हैं। कभी तो वह गोँ-गोँ करता है और कभी अचेतन दिखायी देता है। मैंने उस भूतको साक्षात् रूपमें देखा है, वह भूत मेरे पीछे लग गया है। मेरे मरनेपर मेरी पत्नी और पुत्रका जीवन कैसे चलेगा? उस भूतकी बात कही नहीं जा सकती, मैं ओझाके पास जा रहा हूँ, हो सकता है वह मुझे भूतसे छुड़ा दे॥ 52-56 ॥ अनुभाष्य- 'जीवे',-बचेंगे ॥ 55 ॥ श्रीनृसिंह-स्मरणसे समस्त विपत्तियोंका विनाश :- एका रात्र्ये बुलि' मत्स्य मारिये निर्जने। भूत-प्रेत आमार ना लागे 'नृसिंह'-स्मरणे ॥ 57 ॥ एइ भूत नृसिंह-नामे चापये द्विगुणे। ताहार आकार देखिते भय लागे मने ॥ 58 ॥ ओथा ना याइह, आमि निषेधि तोमारे। ताँहा गेले सेइ भूत लागिबे सबारे ॥ "59 ॥ अनुवाद-मैं अकेला ही रात्रिमें घूमकर निर्जन स्थानपर मछलियोंको मारता हूँ। मुझे श्रीनृसिंह भगवान्‌के स्मरणके प्रभावसे भूत-प्रेत आदि नहीं लगते। किन्तु यह भूत नृसिंह भगवान्‌का नाम लेनेसे मुझे दो गुणा अधिक बलसे दबाता है। उसका आकार देखते ही मनमें भय हो जाता है। मैं आप लोगोंको भी मना कर रहा हूँ कि आप उधर मत जाना। वहाँ जानेपर आप सब लोगोंपर भी वह भूत चढ़ जायेगा ॥ "57-59 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुके सन्धान-प्राप्तिके विषयमें यथार्थ अनुमान :- एत शुनि' स्वरूप-गोसाञि सब तत्त्व जानि'। जालियारे किछु कय सुमधुर वाणी ॥ 60 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा मछुवारेको आश्वासन और उसके भयको दूर करना :- “आमि-बड़ ओझा, जानि भूत छोड़ाइते।” मन्त्र पड़ि' श्रीहस्त दिला ताहार माथाते ॥ 61 ॥ तिन चापड़ मारि' कहे, - "भूत पलाइल। भय ना पाइह" बलि' सुस्थिर करिल ॥ 62 ॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीस्वरूप दामोदर सब कुछ समझ गये और उन्होंने मछुवारेको अत्यन्त मधुर वाणीसे कहा, - "मैं एक बहुत बड़ा ओझा हूँ, मैं भूत