श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें440 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/82-87 ] निषिद्ध हुई है; मध्यलीला 8/202-204 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 82 ॥ स्वयंको गोपियोंकी दासी जानकर महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकी श्रीराधादि गोपियोंके साथ जलक्रीड़ाका वर्णन (चित्रजल्प) :— यथा राग— पट्टवस्त्र, अलङ्कारे, समर्पिया सखी करे, सूक्ष्म-शुक्लवस्त्र परिधान। कृष्ण लञा कान्तागण, कैला जलावगाहन, जलकेलि रचिला सुठाम ॥ 83 ॥ अनुवाद—[श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ा कर रही] गोपियोंने अपने रेशमी वस्त्र और अलङ्कार तटपर खड़ी सखियोंके (मञ्जरियोंके) हाथोंमें सौंपकर स्वयं सूक्ष्म श्वेत वस्त्र पहन लिये। तब श्रीकृष्णने कान्ताओंको अपने साथ लेकर जलमें प्रवेश किया और अत्यन्त सुन्दर जलकेलि की ॥ 83 ॥ सखि हे, देख कृष्णेर जलकेलि रङ्गे। कृष्ण—मत्त करिवर, चञ्चल कर-पुष्कर, गोपीगण करि' निज सङ्गे ॥ 84 ॥ ध्रु॥ आरम्भिला जलकेलि, अन्योऽन्ये जल फेलाफेली, हुड़ाहूड़ि, वर्षे जलधार। सबे जय-पराजय, नाहि किछु निश्चय, जलयुद्ध बाड़िल अपार ॥ 85 ॥ अनुवाद—हे सखियों! श्रीकृष्णकी आनन्दमयी जलकेलिको देखो। मत्त गजराजकी भाँति श्रीकृष्णने गोपियोंको अपने साथ लेकर अपने चञ्चल हस्तरूपी कमलके द्वारा जलकेलि आरम्भ की है। श्रीकृष्ण और गोपियाँ एक-दूसरेके ऊपर जल उड़ेल रहे हैं और उनमें होड़ लग गयी है। उस होड़में जलकी बड़ी धाराओंका वर्षण हो रहा है, इस कारण किसकी जय हो रही है, किसकी पराजय—कुछ भी निश्चित नहीं हो पा रहा है। इस जलक्रीड़ामें जल उड़ेलनाका युद्ध अपार बढ़ गया है ॥ 84-85 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'करपुष्कर',—करकमल; (मतान्तरमें सूँडका अग्रभाग) ॥ 84 ॥ वर्षे स्थिर तड़िद्घन, सिञ्चे श्याम नवघन, घन वर्षे तड़ित्-उपरे। सखीगणेर नयन, तृषित चातकीगण, सेइ अमृत सुखे पान करे ॥ 86 ॥ अनुवाद—स्थिर विद्युत्की भाँति गोपियाँ नवघनश्यामरूप कृष्णको जलकी वर्षा करके सींचने लगी, दूसरी ओर, श्यामरूपी नवघन भी पुनः (गोपीरूपी) विद्युत्पर जलकी वर्षा करने लगे। प्यासे चातककी (पपीहेकी) भाँति मञ्जरियोंके नयन उस अमृतका सुखपूर्वक पान कर रहे थे ॥ 86 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्थिर विद्युत्की भाँति गोपियाँ नवघनश्यामरूप कृष्णको जलकी वर्षा करके सींचने लगी, दूसरी ओर, श्यामरूपी नवघन भी पुनः (गोपीरूपी) विद्युत्पर जलकी वर्षा करने लगे ॥ 86 ॥ प्रथमे युद्ध 'जलाञ्जलि', तबे युद्ध 'कराकरिं', तार पाछे युद्ध 'मुखामुखि'। तबे युद्ध 'हृदाहृदि', तबे हैल 'वादावादि', तबे हैल युद्ध 'नखानखि' ॥ 87 ॥ अनुवाद—पहले एक दूसरेपर जल फेंकते हुए युद्ध प्रारम्भ हुआ, उसके बाद हाथसे हाथका युद्ध होने लगा, फिर वह मुखसे मुखके युद्धमें परिवर्तित हो गया। तब हृदय-हृदयमें युद्ध होने लगा, फिर युद्धने वाद-विवादका रूप धारण किया और फिर नखसे नखका युद्ध होने लगा ॥ 87 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'रदा-रदि' ॥ 87 ॥