भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2456

[ 18/73-82 अठारहवाँ अध्याय 439

महाप्रभुको चेतनावस्थामें लानेके लिये बहुत प्रयत्न और सेवा :- आर्द्र कौपीन दूर करि' शुष्क पराञा। बहिर्वासे शोयाइला बालुका छाड़ाञा ॥ 73 ॥

अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके गीले कौपीनको उतारकर सूखा कौपीन बाँध दिया, उन्होंने महाप्रभुकी देहसे बालूको हटाकर उन्हें बहिर्वास वस्त्रपर लिटा दिया ॥ 73 ॥

सभीके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन :- सबे मेलि' उच्च करि' करेन सङ्कीर्त्तने। उच्च करि' कृष्णनाम कहेन प्रभुर काणे ॥ 74 ॥

अनुवाद-सभी भक्त मिलकर उच्च स्वरमें सङ्कीर्तन करने लगे। वे सभी उच्च स्वरसे महाप्रभुके कानमें कृष्णनामका कीर्तन करने लगे ॥ 74 ॥

महाप्रभुका अर्द्धबाह्यदशामें आगमन :- कतक्षणे प्रभुर काणे शब्द परशिल। हुङ्कार करिया प्रभु तबहिँ उठिल ॥ 75 ॥ उठितेइ अस्थि सब लागिल निज-स्थाने। 'अर्द्धबाह्ये', इति-उति करेन दरशने ॥ 76 ॥

अनुवाद-कुछ देरमें महाप्रभुके कानमें कृष्णनाम प्रविष्ट हुआ, तभी महाप्रभु हुङ्कार करते हुए उठ खड़े हुए। उठते ही उनकी सब हड्डियाँ अपने-अपने स्थानपर जुड़ गयी, वे अर्द्धबाह्य दशामें इधर-उधर देखने लगे ॥ 75-76 ॥

महाप्रभुकी तीन दशाओंका परिचय :- तिन-दशाय महाप्रभु रहेन सर्वकाल। 'अन्तर्दशा', 'बाह्यदशा', 'अर्द्धबाह्य' आर ॥ 77 ॥

अनुवाद-महाप्रभु सब समय 'अन्तर्दशा', 'बाह्यदशा' और 'अर्द्धबाह्यदशा'-इन तीनों दशाओंमेंसे किसी-न-किसी एक दशामें रहते ॥ 77 ॥

स्वयंको गोपियोंकी दासी माननेवाले महाप्रभुकी अर्द्धबाह्य-दशाका वर्णन (चित्रजल्प) :- अन्तर्दशार किछु घोर, किछु बाह्य-ज्ञान। सेइ दशा कहेन भक्त 'अर्द्धबाह्य' नाम ॥ 78 ॥

अनुवाद-जब अन्तर्दशाकी प्रबलता रहती है और कुछ-कुछ बाह्य ज्ञान भी होता है, तो भक्त लोग उस दशाको 'अर्द्धबाह्य' दशा कहते हैं ॥ 78 ॥

'अर्द्धबाह्ये' कहेन प्रभु प्रलाप-वचने। आभासे कहेन प्रभु, शुनेन भक्तगणे ॥ 79 ॥ “कालिन्दी देखिया आमि गेलाङ वृन्दावन। देखि, - जलक्रीड़ा करेन व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 80 ॥ राधिकादि गोपीगण-सङ्गे एक मेलि'। यमुनार जले महारङ्गे करेन केलि ॥ 81 ॥ तीरे रहिं' देखि आमि सखीगण-सङ्गे। एकसखी सखीगणे देखाय सेइ रङ्गे ॥ 82 ॥

अनुवाद-महाप्रभु उस अर्द्धबाह्य दशामें प्रलापपूर्ण वचन कहने लगे। महाप्रभु मन्द वाणीसे कहने लगे और भक्तगण उन्हें ध्यानसे श्रवण करने लगे। [मञ्जरी भावमें विभावित] महाप्रभुने कहा, - “मैं कालिन्दीको (यमुनाको) देखकर वृन्दावन गयी थी, मैंने देखा कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण कालिन्दीमें जल-क्रीड़ा कर रहे थे। वे श्रीराधिका आदि गोपियोंके साथ मिलकर यमुनाके जलमें महा-आनन्दसे क्रीड़ा कर रहे थे। मैं तटपर रहकर सखियोंके (मञ्जरियोंके) साथ वह क्रीड़ा देख रही थी। उनमें-से एक सखी अन्य सखियोंको श्रीकृष्णके साथ श्रीराधादि गोपियोंकी लीलाके आनन्दका वर्णन कर रही थी।॥ 79-82 ॥

अनुभाष्य-'अपनी-अपनी यूथेश्वरीके सेवानन्द-सुखमें तत्पर मैं और मेरी जैसी अन्यान्य नवीन लाल्य किङ्करियाँ (मञ्जरियाँ)'-इस वाक्यके द्वारा आत्मेन्द्रिय सम्भोगकी वाञ्छाके उद्देश्यसे साधकके लिये अहंग्रहोपासना