भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2466

उन्नीसवाँ अध्याय कथासार-मातृभक्तिके द्वारा उत्तेजित होकर महाप्रभु प्रत्येक वर्ष श्रीजगदानन्द-पण्डितको प्रसादी वस्त्र और मिष्ठान्न देकर श्रीनवद्वीपमें भेजते थे। श्रीजगदानन्द उसी प्रकार एक वर्ष नवद्वीपमें जाकर श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा लिखित एक पहेली लेकर आये। उसे पढ़कर महाप्रभुकी दशा वर्धित होने लगी और भक्तगण विचार करने लगे कि 'महाप्रभु शीघ्र ही अप्रकट होंगे।' (महाप्रभुकी अवस्था) ऐसी हो गयी कि रात्रिमें मुखको घिसनेसे महाप्रभुके क्षत-अङ्गोंसे रक्त निकलने लगा। श्रीस्वरूप-गोस्वामीने उसे रोकनेके लिये शङ्कर पण्डितको महाप्रभुके घरमें शयन करवाया। एक समय वैशाख-पूर्णिमाकी रात्रिमें [महाप्रभुने] श्रीजगन्नाथवल्लभ उद्यानमें प्रवेश करके अनेक प्रकारके भाव प्रकाशित करते-करते अशोक वृक्षके नीचे अकस्मात् श्रीकृष्णका दर्शन किया; उसके फलस्वरूप वे श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धसे उन्मत्त होकर भाव प्रकाशित करने लगे। -(अमृतप्रवाह भाष्य) मातारूपी भक्तके प्रति अतुलनीय स्नेहमय एवं जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें महाभावमें आविष्ट महाप्रभुकी वन्दना :- वन्दे तं कृष्णचैतन्यं मातृभक्तशिरोमणिम्। प्रलप्य मुखसङ्घर्षी मधूद्याने ललास यः ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो मातृभक्त-शिरोमणि हैं और जिन्होंने प्रलाप करते-करते घरकी दीवारोंसे मुखको घिसा था और कृष्णप्रेमकी लालसाको प्रदर्शित करनेके लिये जगन्नाथवल्लभरूपी मधु-उद्यानमें [वासन्तिक-विहार- काननमें] लीला की थी, मैं उन कृष्णचैतन्यकी वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य- मुखसङ्घर्षी (मुखं सङ्घर्षयितुं शीलं यस्य सः) यः (कृष्णचैतन्यदेवः) प्रलप्य (प्रलापवचनादिकम् उच्चार्य) मधूद्याने (जगन्नाथवल्लभाख्ये वासन्तिकविहारकानने) ललास (विलसितवान्), तं मातृभक्तशिरोमणिं (मातृभक्तेषु शिरोमणिः तं मस्तकभूषणं परम-श्रेष्ठं कृष्णचैतन्यम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ 2 ॥ महाप्रभुका दिव्योन्माद :- एइमते महाप्रभु कृष्णप्रेमावेशे। उन्माद-प्रलाप करे रात्रि-दिवसे ॥ 3 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु कृष्णप्रेमके आवेशमें रात-दिन उन्मादग्रस्त होकर प्रलाप करते थे॥ 3 ॥ पण्डित श्रीजगदानन्दके गुण :- प्रभुर अत्यन्त प्रिय पण्डित-जगदानन्द। याहार चरित्रे प्रभु पायेन आनन्द ॥ 4 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुको अत्यन्त प्रिय थे। महाप्रभुको उनके क्रियाकलापोंको देखकर बहुत आनन्द होता था॥ 4 ॥ प्रत्येक वर्षकी भाँति उस बार भी महाप्रभुके द्वारा नवद्वीपमें अपनी माताके प्रति अतुलनीय वात्सल्य-उक्ति-बतलानेके लिये श्रीजगदानन्दको भेजना :- प्रति वत्सर प्रभु ताँरे पाठान नदीयाते। विच्छेद-दुःखिता जानि' जननी आश्वासिते ॥ 5 ॥