श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें450 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/5-15 ] अनुवाद—महाप्रभु अपनी माता श्रीशचीदेवीके स्वयंसे वियोगके दुःखको समझकर प्रत्येक वर्ष श्रीजगदानन्द पण्डितको उन्हें आश्वासन देनेके लिये नदीयामें भेजते थे॥ 5 ॥ “नदीया चलह, मातारे कहिह नमस्कार। आमार नामे पादपद्म धरिह ताँहार ॥ 6 ॥ कहिह ताँहारे,—तुमि करह स्मरण। नित्य आसि' तोमार वन्दिये चरण ॥ 7 ॥ ये-दिने तोमार इच्छा कराइते भोजन। से-दिने अवश्य आमि करिये भक्षण ॥ 8 ॥ भक्तवत्सल भगवान्की भी स्वयंको भक्तकी सेवामें अयोग्य जानकर दैन्यपूर्ण उक्ति और क्षमा-याचना :- तोमार सेवा छाड़ि' आमि करिलुँ संन्यास। ‘बाउल’ हञा आमि कैलुँ धर्मनाश ॥ 9 ॥ एइ अपराध तुमि ना लइह आमार। तोमार अधीन आमि—पुत्र से तोमार ॥ 10 ॥ श्रीशचीदेवीके आदेशसे ही महाप्रभुका पुरीमें वास :- नीलाचले आछि आमि तोमार आज्ञाते। यावत् जीव, तावत् आमि नारिब छाड़िते ॥” 11 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“तुम नदीया जाओ और माताको मेरा प्रणाम कहना। मेरी ओरसे उनके चरणकमलको स्पर्श करना और उन्हें मेरी ओरसे कहना—आपको स्मरण है कि मैं प्रतिदिन आकर आपके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। जिस दिन भी आपकी मुझे भोजन करानेकी इच्छा होती है, मैं अवश्य ही आपके पास आकर भोजन ग्रहण करता हूँ। मैंने आपकी सेवाको छोड़कर संन्यास ग्रहण किया है। मैंने पागल होकर अपने (आपकी सेवा करनेके कर्त्तव्यरूपी) धर्मका नाश किया है। आप मेरे इस अपराधको ग्रहण मत करना, क्योंकि मैं आपका पुत्र, आपके अधीन हूँ। मैं आपकी आज्ञानुसार ही जगन्नाथपुरीमें वास कर रहा हूँ। मैं जब तक जीवित रहूँगा, तब तक नीलाचलको नहीं छोड़ूँगा॥” 6-11 ॥ परमानन्द पुरीके अनुरोधसे श्रीशचीदेवीके लिये नवद्वीपमें वस्त्र और प्रसाद भेजना :- गोप-लीलाय पाइला येइ प्रसाद-वसने। मातारे पाठान ताहा पुरीर वचने ॥ 12 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको श्रीजगन्नाथदेवकी गोपलीलाका जो प्रसादी वस्त्र प्राप्त हुआ था, उन्होंने श्रीपरमानन्द पुरीके कहनेपर उसे माताके लिये भेज दिया॥ 12 ॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेवके गोपवेश-सम्बन्धीय प्रसादी-वस्त्र ॥ 12 ॥ जगन्नाथेर उत्तम प्रसाद आनिया यतने। मातारे पृथक् पाठान, आर भक्तगणे ॥ 13 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बहुत सावधानीसे श्रीजगन्नाथदेवका उत्तम प्रसाद लाये और उन्होंने श्रीशचीमाता एवं अन्य-अन्य भक्तोंके लिये पृथक्-पृथक् करके प्रसाद भेजा ॥ 13 ॥ अप्राकृत वात्सल्य-प्रेमके वशीभूत भगवान् :- मातृभक्तगणेर प्रभु हन शिरोमणि। संन्यास करिया सदा सेवेन जननी ॥ 14 ॥ अनुवाद—महाप्रभु मातृ-भक्तोंमें शिरोमणि हैं, वे संन्यास ग्रहण करके भी सदा माताकी सेवा करते हैं॥ 14 ॥ अनुभाष्य—माताके द्वारा जन्म और लालन-पालनसे पुष्ट किये जड़-शरीरको धारण करके उसे कृष्णभजनमें नियुक्त करनेसे ही हरिभजनके द्वारा शुद्धरूपसे अति उत्तम मातृ-सेवा होती है॥ 14 ॥ श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें जाकर श्रीशचीदेवीको महाप्रभुके द्वारा दिया गया सन्देशादि देना :- जगदानन्द नदीया गिया मातारे मिलिला। प्रभुर यत निवेदन, सकल कहिला ॥ 15 ॥