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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

450 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/5-15 ] अनुवाद—महाप्रभु अपनी माता श्रीशचीदेवीके स्वयंसे वियोगके दुःखको समझकर प्रत्येक वर्ष श्रीजगदानन्द पण्डितको उन्हें आश्वासन देनेके लिये नदीयामें भेजते थे॥ 5 ॥ “नदीया चलह, मातारे कहिह नमस्कार। आमार नामे पादपद्म धरिह ताँहार ॥ 6 ॥ कहिह ताँहारे,—तुमि करह स्मरण। नित्य आसि' तोमार वन्दिये चरण ॥ 7 ॥ ये-दिने तोमार इच्छा कराइते भोजन। से-दिने अवश्य आमि करिये भक्षण ॥ 8 ॥ भक्तवत्सल भगवान्‌की भी स्वयंको भक्तकी सेवामें अयोग्य जानकर दैन्यपूर्ण उक्ति और क्षमा-याचना :- तोमार सेवा छाड़ि' आमि करिलुँ संन्यास। ‘बाउल’ हञा आमि कैलुँ धर्मनाश ॥ 9 ॥ एइ अपराध तुमि ना लइह आमार। तोमार अधीन आमि—पुत्र से तोमार ॥ 10 ॥ श्रीशचीदेवीके आदेशसे ही महाप्रभुका पुरीमें वास :- नीलाचले आछि आमि तोमार आज्ञाते। यावत् जीव, तावत् आमि नारिब छाड़िते ॥” 11 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“तुम नदीया जाओ और माताको मेरा प्रणाम कहना। मेरी ओरसे उनके चरणकमलको स्पर्श करना और उन्हें मेरी ओरसे कहना—आपको स्मरण है कि मैं प्रतिदिन आकर आपके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। जिस दिन भी आपकी मुझे भोजन करानेकी इच्छा होती है, मैं अवश्य ही आपके पास आकर भोजन ग्रहण करता हूँ। मैंने आपकी सेवाको छोड़कर संन्यास ग्रहण किया है। मैंने पागल होकर अपने (आपकी सेवा करनेके कर्त्तव्यरूपी) धर्मका नाश किया है। आप मेरे इस अपराधको ग्रहण मत करना, क्योंकि मैं आपका पुत्र, आपके अधीन हूँ। मैं आपकी आज्ञानुसार ही जगन्नाथपुरीमें वास कर रहा हूँ। मैं जब तक जीवित रहूँगा, तब तक नीलाचलको नहीं छोड़ूँगा॥” 6-11 ॥ परमानन्द पुरीके अनुरोधसे श्रीशचीदेवीके लिये नवद्वीपमें वस्त्र और प्रसाद भेजना :- गोप-लीलाय पाइला येइ प्रसाद-वसने। मातारे पाठान ताहा पुरीर वचने ॥ 12 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको श्रीजगन्नाथदेवकी गोपलीलाका जो प्रसादी वस्त्र प्राप्त हुआ था, उन्होंने श्रीपरमानन्द पुरीके कहनेपर उसे माताके लिये भेज दिया॥ 12 ॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेवके गोपवेश-सम्बन्धीय प्रसादी-वस्त्र ॥ 12 ॥ जगन्नाथेर उत्तम प्रसाद आनिया यतने। मातारे पृथक् पाठान, आर भक्तगणे ॥ 13 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बहुत सावधानीसे श्रीजगन्नाथदेवका उत्तम प्रसाद लाये और उन्होंने श्रीशचीमाता एवं अन्य-अन्य भक्तोंके लिये पृथक्-पृथक् करके प्रसाद भेजा ॥ 13 ॥ अप्राकृत वात्सल्य-प्रेमके वशीभूत भगवान् :- मातृभक्तगणेर प्रभु हन शिरोमणि। संन्यास करिया सदा सेवेन जननी ॥ 14 ॥ अनुवाद—महाप्रभु मातृ-भक्तोंमें शिरोमणि हैं, वे संन्यास ग्रहण करके भी सदा माताकी सेवा करते हैं॥ 14 ॥ अनुभाष्य—माताके द्वारा जन्म और लालन-पालनसे पुष्ट किये जड़-शरीरको धारण करके उसे कृष्णभजनमें नियुक्त करनेसे ही हरिभजनके द्वारा शुद्धरूपसे अति उत्तम मातृ-सेवा होती है॥ 14 ॥ श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें जाकर श्रीशचीदेवीको महाप्रभुके द्वारा दिया गया सन्देशादि देना :- जगदानन्द नदीया गिया मातारे मिलिला। प्रभुर यत निवेदन, सकल कहिला ॥ 15 ॥

[ 19/15-23 उन्नीसवाँ अध्याय 451 नवद्वीप और शान्तिपुरमें रहनेके बाद विदायी-हेतु प्रार्थना :- आचार्यादि-भक्तगणे मिलिला प्रसाद दिया। माता-ठाञि आज्ञा लइला मासेक रहिया ॥ 16 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने नवद्वीपमें जाकर श्रीशचीमातासे मिलकर उन्हें महाप्रभुका प्रणाम निवेदन किया और उनका सन्देश सुनाया। फिर वे श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंसे मिले और उन्होंने सभीको महाप्रभुके द्वारा भेजा गया श्रीजगन्नाथजीका प्रसाद दिया। उन्होंने एक मास तक नवद्वीपमें रहनेके पश्चात् श्रीशचीमातासे जानेके लिये आज्ञा ली॥ 15-16॥ आचार्येर ठाञि गिया आज्ञा मागिला। आचार्य-गोसाञि प्रभुरे सन्देश कहिला ॥ 17 ॥ पण्डितके माध्यमसे महाप्रभुके निकट श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा पहेली भेजना :- तरजा-प्रहेली आचार्य कहेन ठारे-ठोरे। प्रभुमात्र बुझेन, केह बुझिते ना पारे ॥ 18 ॥ “प्रभुरे कहिह आमार कोटि नमस्कार। एइ निवेदन ताँर चरणे आमार ॥ 19 ॥ महाप्रभुके अवतारके उद्देश्यकी सिद्धि एवं लीलाको सङ्गोपन करनेके लिये इङ्गित करना :- बाउलके कहिह,—लोक हइल बाउल। बाउलके कहिह,—हाटे ना बिकाय चाउल ॥ 20 ॥ बाउलके कहिह,—काये नाहिक आउल। बाउलके कहिह,—इहा कहियाछे बाउल ॥” 21 ॥ अनुवाद—उन्होंने श्रीअद्वैताचार्यसे भी जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब श्रीअद्वैताचार्य गोसांईने महाप्रभुके लिये एक सन्देश दिया। वह सन्देश एक तरजा-पहेलीके रूपमें था, जिसे एकमात्र महाप्रभु ही समझ सकते थे, अन्य कोई भी नहीं। श्रीअद्वैताचार्यने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“महाप्रभुको मेरा करोड़ों बार प्रणाम कहना। उनके श्रीचरणकमलोंमें मेरा यही निवेदन है,—'पागलसे कहना—लोग पागल हो गये हैं। पागलसे कहना—हाटमें अब चावल नहीं बिक रहे हैं। पागलसे कहना—पागलका अब कोई कार्य नहीं है। पागलसे कहना—यह बात एक पागलने कही है॥'” 17-21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(श्रीअद्वैतप्रभुने पण्डित श्रीजगदानन्दके द्वारा यह कहकर भिजवाया,–) महाप्रभुको कहना कि लोग प्रेममें उन्मत्त हो गये हैं, और प्रेमके हाटमें प्रेमरूपी चावलको बेचनेका स्थान नहीं है। महाप्रभुको कहना कि आउल अर्थात् प्रेमोन्मत्त बाउलको और कोई सांसारिक कार्य नहीं है। महाप्रभुको कहना कि प्रेममें उन्मत्त होकर ही अद्वैतने यह बात कही है। तात्पर्य यह है कि महाप्रभुके आविर्भूत होनेका जो तात्पर्य था, वह सम्पूर्ण हो गया है, अब महाप्रभुकी जैसी इच्छा, वैसा हो॥ 20-21 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—‘बाउलके कहिओ, लोक हइल आउल।' आउल शब्दका अर्थ आतुर अर्थात् प्रेमपूर्ण है। कोई-कोई उसका ‘शिथिल', ‘असंलग्न' अर्थ भी करते हैं; आउल-शब्दसे ‘निष्किञ्चन', ‘आर्त्त' और ‘आतुर' आदि भी समझा जाता है। ‘काये नाहिक आउल',—कोई-कोई व्याख्या करते हैं कि प्रेम-प्रचार-कार्यमें और उच्छृङ्खलता नहीं है॥ 20-21 ॥ उसे सुनकर श्रीजगदानन्दका हँसना और पुरीमें आकर महाप्रभुके समक्ष उसका वर्णन :- एत शुनि' जगदानन्द हासिते लागिला। नीलाचले आसि' तबे प्रभुरे कहिला ॥ 22 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीअद्वैताचार्यकी पहेलीको सुनकर हँसने लगे। उन्होंने नीलाचलमें आकर महाप्रभुको श्रीअद्वैताचार्यकी पहेलीको सुनाया॥ 22 ॥ उसे सुनकर महाप्रभुका हँसना और मौन धारण करना :- तरजा शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिला। “ताँर येइ आज्ञा”—बलि' मौन धरिला ॥ 23 ॥

452 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/23-33 ] अनुवाद-महाप्रभु पहेलीको सुनकर मन्द-मन्द मुस्कराये और फिर “उनकी जैसी आज्ञा”-कहकर मौन हो गये॥ 23॥ श्रीस्वरूपके द्वारा अर्थकी जिज्ञासा :- जानिया स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे पुछिल। “एइ तरजार अर्थ बुझिते नारिल॥” 24॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर उस पहेलीका रहस्य जानते थे, तथापि उन्होंने महाप्रभुसे पूछा,-“मैं इस पहेलीका अर्थ नहीं समझ पाया हूँ॥” 24॥ महाप्रभुके द्वारा पहेलीकी व्याख्याका सङ्केत :- प्रभु कहेन,-“आचार्य हय पूजक प्रबल। आगम-शास्त्रेर विधि-विधाने कुशल॥ 25॥ उपासना लागि' देवेर करेन आवाहन। पूजा लागि' कतकाल करेन निरोधन॥ 26॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-“श्रीअद्वैताचार्य भगवान्‌के एक श्रेष्ठ पूजक हैं। वे आगम-शास्त्रोंके विधि-विधानमें कुशल हैं। वे उपासनाके लिये देवताका आह्वान करते हैं और पूजाके लिये कुछ समयके लिये देवताको रोककर भी रखते हैं॥ 25-26॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आवाहन',-पूजा करनेसे पहले देवताका आह्वान; 'निरोधन',-जब तक पूजा होती रहती है, तब तक देवताको रोके रखना॥ 26॥ पूजा-निर्वाहण हैले पाछे करेन विसर्जन। तरजार ना जानि अर्थ, किवा ताँर मन॥ 27॥ महायोगैश्वर्यशाली श्रीअद्वैतप्रभु :- महायोगेश्वर आचार्य-तरजाते समर्थ। आमिह बुझिते नारि तरजार अर्थ॥” 28॥ अनुवाद-पूजाके सम्पूर्ण होनेके पश्चात् वे देवताका विसर्जन कर देते हैं। मैं इस पहेलीका अर्थ नहीं जानता हूँ और मैं यह भी नहीं जानता कि उनके मनमें क्या है? श्रीअद्वैताचार्य महायोगेश्वर हैं, वे पहेलियाँ लिखनेमें निपुण हैं, किन्तु मैं भी उनकी इस पहेलीका अर्थ नहीं समझ पा रहा हूँ॥” 27-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'विसर्जन',-पूजाकी समाप्ति होनेपर देवताको स्थानान्तरित करना॥ 27॥ भक्तोंमें विस्मय, श्रीस्वरूपका विमर्ष (दुःख) :- शुनिया विस्मित हइला सब भक्तगण। स्वरूप-गोसाञि किछु हइला विमन॥ 29॥ अनुवाद-यह सुनकर सभी भक्त आश्चर्यचकित हुए और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीका मन कुछ खिन्न हो गया॥ 29॥ महाप्रभुकी श्रीकृष्णविरह-दशाकी वृद्धि :- सेइ दिन हैते प्रभुर आर दशा हइल। कृष्णेर विरह-दशा द्विगुण बाड़िल॥ 30॥ उन्माद-प्रलाप-चेष्टा करे रात्रि-दिने। राधा-भावावेशे विरह बाड़े अनुक्षणे॥ 31॥ अनुवाद-उस दिनसे महाप्रभुकी दशा बहुत परिवर्तित हो गयी। उनकी श्रीकृष्णविरह-दशा दो गुणा बढ़ गयी। श्रीराधाके भावावेशमें उनका कृष्णविरह प्रतिक्षण बढ़ने लगा और रात-दिन उनके सभी कार्यकलाप उन्माद-प्रलापमय होते॥ 30-31॥ महाप्रभुकी उद्घूर्णा और प्रलाप :- आचम्बिते स्फुरे कृष्णेर मथुरा-गमन। उद्घूर्णा दशा हैल उन्माद-लक्षण॥ 32॥ अनुवाद-महाप्रभुको अकस्मात् ही स्फूर्ति हुई कि श्रीकृष्ण मथुरा चले गये हैं और उन्मादमें उनकी उद्घूर्णा-दशा उपस्थित हो गयी॥ 32॥ रामानन्देर गला धरि' करेन प्रलापन। स्वरूपे पुछेन जानि' निज-सखीगण॥ 33॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द रायके कण्ठको पकड़कर प्रलाप करने लगे और श्रीस्वरूप दामोदरको अपनी

[ 19/33-37 ] उन्नीसवाँ अध्याय 453

सखी समझकर कुछ पूछने लगे ॥ ३३ ॥ पूर्वे येन विशाखारे राधिका पुछिला। सेइ श्लोक पड़ि' प्रलाप करिते लागिला ॥ ३४ ॥ अनुवाद—पहले श्रीराधिकाने श्रीविशाखा सखीसे जो पूछा था, महाप्रभु उसी श्लोकको पढ़कर प्रलाप करने लगे॥ ३४ ॥ श्रीराधाकी श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णके विषयमें जिज्ञासा (चित्रजल्प) :— ललितमाधव (3/25)में विशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व शिखिचन्द्रकालङ्कृतिः क्व मन्दमुरलीरवः क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युतिः। क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि- र्निधिर्मम सुहृत्तमः क्व बत हा हन्त धिग्विधिम् ॥ ३५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ३५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, वे नन्दकुलचन्द्रमा कहाँ हैं? वे शिखिचन्द्रके (मयूर-पंखके) द्वारा (अलंकृति अथवा अलंकृत कृष्ण) कहाँ हैं? वे मन्दमुरलीधर (ध्वनि करनेवाले कृष्ण) कहाँ हैं? इन्द्रनीलमणि कृष्ण अथवा इन्द्रद्युति कहाँ हैं? रासरसमें नृत्य करनेवाले वे कहाँ हैं? मेरी जीवन-रक्षाकी औषधि (स्वरूप श्याम) कहाँ हैं? मेरी वह सर्वोत्तम सुहृदरूपी निधि कहाँ है? हाय ! हाय ! विधाताको धिक्कार है ॥ ३५ ॥ अनुभाष्य— हे सखि (विशाखे,) नन्दकुलचन्द्रमाः (नन्दयति इति नन्दः क्षीरसिन्धुः इव तत्तस्मिन् कुले जातः चन्द्रमाः नन्दवंशशशधरः) क्व (कुत्र वर्त्तते)? शिखिचन्द्रकालङ्कृतिः (शिखिचन्द्रकं मयूरपिच्छकम् अलङ्कृतिः भूषणं यस्य सः) क्व तिष्ठति? मन्दमुरलीरवः (मन्दः अनुच्चः अस्फुटः मुरलीरवः यस्य सः) क्व वर्त्तते? सुरेन्द्रनीलद्युतिः (सुरेन्द्र इव इन्द्रनीलमणिरिव नीला द्युतिः कान्तिः यस्य सः) क्व? रासरसताण्डवी (रासे क्रीड़ायां रसेन ताण्डवं नृत्यं यस्य सः) क्व? जीवरक्षौषधिः (जीवस्य जीवनस्य रक्षायैः परित्राणाय औषधिस্বরূপः यः सः) क्व? मम सुहृत्तमः (परम प्रियतमः) निधिः (सर्वसम्पत्प्रसूः) क्व? बत (खेदे) हा हन्त, विधिं (विधातारं) धिक्। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि विशाखे, (क्षीरसिन्धुसे उत्पन्न चन्द्रमाकी भाँति) नन्दवंशमें उत्पन्न वे चन्द्रमा कहाँ हैं? मयूरपंखरूपी भूषणसे अलङ्कृत वे कहाँ हैं? मन्द अस्फुट मुरलीध्वनि करनेवाले कहाँ हैं? इन्द्रनीलमणिके समान नीलकान्ति है जिनकी, वे कहाँ हैं? रासरसमें ताण्डव नृत्य करनेवाले कहाँ हैं? जीवनका परित्राण करनेवाले औषधिस्वरूप वे कहाँ हैं? मेरे परम प्रियतम, मेरी समस्त सम्पत्तिस्वरूप वे कहाँ हैं? (खेदसे) हा हन्त, विधाताको धिक्कार है॥ ३५ ॥ श्लोकका अर्थ; श्रीकृष्णविरहमें विधुरा श्रीराधाका ब्रजवासियोंके जीवन स्वरूप श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन :— यथा राग— “व्रजेन्द्रकुल-दुग्धसिन्धु, कृष्ण—ताहे पूर्ण इन्दु, जन्मि' कैला जगत् उजोर। कान्त्यमृत येबा पिये, निरन्तर पिया जिये, व्रज-जनेर नयन-चकोर ॥ ३६ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ३६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—"श्रीनन्दका कुल—क्षीर समुद्रके समान है, उसमें पूर्णचन्द्ररूपी कृष्णने उत्पन्न होकर जगत्‌को आलोकित किया है। जो व्रजवासियोंके नयन-चकोरके द्वारा प्राप्त होनेवाले कृष्णकान्तिरूप अमृतका निरन्तर पान करते हैं, वे ही जीवित रहते हैं। 'उजोर',—आलोकित (उज्ज्वल) ॥ ३६ ॥ श्रीकृष्णदर्शनकी तृष्णामें आर्त्त श्रीराधा :— सखि हे, कोथा कृष्ण, कराह दरशन। क्षणके याहार मुख, ना देखिले फाटे बुक, शीघ्र देखाह, ना रहे जीवन ॥ ३७ ॥ ध्रु ॥ अनुवाद—हे सखि! कृष्ण कहाँ हैं? मुझे उनके दर्शन कराओ। जिनका मुख क्षणमात्रके लिये भी नहीं देखनेपर मेरा हृदय फटने लगता है, मुझे शीघ्र ही

454 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/37-41 ] उनके दर्शन कराओ, अन्यथा मैं जीवित नहीं रह पाऊँगी ॥ 37 ॥ गोपीप्राणधन श्रीकृष्णचन्द्र :- एइ व्रजेर रमणी, कामार्कतप्त-कुमुदिनी, निज-करामृत दिया दान। प्रफुल्लित करे येह, काँहा मोर चन्द्र सेइ, देखाह, सखि, राख मोर प्राण ॥ 38 ॥ अनुवाद-इस व्रजकी रमणियाँ कामरूपी सूर्यसे तप्त कुमुदिनीकी भाँति हैं। किन्तु अपने हस्तरूपी अमृतको (किरणामृतको) प्रदान करके जो उन्हें प्रफुल्लित करते हैं, वे मेरे चन्द्र (श्रीकृष्ण) कहाँ हैं? हे सखि! मुझे उनके दर्शन करवाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा करो ॥ 38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कामरूपी सूर्यके द्वारा तप्त कुमुदिनीरूपी व्रजरमणयोंको अपना हस्तरूपी अमृत अर्थात् किरणामृत देकर ॥ 38 ॥ अनुभाष्य-गोपियोंका काम-सूर्यकी भाँति है; गोपियोंका हृदय-कुमुदिनीके समान है; कृष्णकामसे तप्त गोपी-हृदय- सूर्यकी किरणसे तप्त कुमुदिनी स्वरूप है। 'निज'-शब्दका अर्थ कृष्णका 'कर' अर्थात् किरण, अथवा हस्त, उस अमृतके समान किरण अथवा हस्तप्रदाता कृष्णचन्द्र (चन्द्रकी उपमायुक्त कृष्ण) ॥ 38 ॥ श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णके रूपका वर्णन :- काँहा से चूड़ार ठाम, शिखीपिच्छेर उड़ाम, नव-मेघे येन इन्द्रधनु। पीताम्बर-तड़िद्द्युति, मुक्तामाला-बकपाँति, नवाम्बुद जिनि' श्यामतनु ॥ 39 ॥ अनुवाद-इन्द्रधनुषसे शोभित नवमेघके सदृश अत्यन्त सुन्दर मयूरपंखसे बने मुकुटको मस्तकपर धारण करनेवाले कृष्ण कहाँ हैं? विद्युत जैसी कान्तिसे युक्त पीताम्बर धारण करनेवाले, उड़ते हुए सारसकी पंक्ति के समान मुक्ताकी मालाको धारण करनेवाले और नवमेघकी शोभाको भी तिरस्कृत करनेवाले श्याम देहधारी श्रीकृष्ण कहाँ हैं? 39 ॥ अनुभाष्य—'बकपाँति',—सारस-पंक्ति अथवा श्रेणी ॥ 39 ॥ एकबार यार नयने लागे, सदा तार हृदये जागे, कृष्णतनु-येन आम्र-आठा। नारी-मने पशि' याय, यत्ने नाहि बाहिराय, तनु नहे-सेयाकुलेर काँटा ॥ 40 ॥ अनुवाद-आमके वृक्षकी चिपचिपी गोंदकी भाँति श्रीकृष्णकी देह एकबार भी जिसके नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित हो जाती है, वह उस व्यक्तिके हृदयमें सदा ही उदित रहती है। श्रीकृष्णकी अत्यन्त सुशोभित देह नारियोंके हृदयमें ऐसे प्रवेश कर जाती है कि अनेक प्रयास करनेपर भी बाहर नहीं निकलती, मानो वह देह नहीं अपितु सेया-बेरीका काँटा हो ॥ 40 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'तनु नहे सेयाकुलेर काँटा',-कृष्णकी देहकी सेया-बेरीके काँटेके साथ तुलना की जा सकती है; इसका धर्म यह है कि उसके एकबार चुभनेपर उसे छुड़ाना दुष्कर होता है ॥ 40 ॥ अनुभाष्य-'आम्र-आठा',—आमके वृक्षकी गोंदके एकबार कहीं भी लग जानेपर उसे छुड़ाना कठिन होता है; वह जिस स्थानपर लगती है, वहाँपर घाव होने तककी सम्भावना होती है ॥ 40 ॥ जिनिया तमाल-द्युति, इन्द्रनीलसम कान्ति, से कान्तिते जगत् माताय। शृङ्गार रससार छानि', ताते चन्द्र-ज्योत्स्ना छानि', जानि' विधि निरमिला ताय ॥ 41 ॥ अनुवाद-तमालकी कान्तिको पराजित करनेवाली श्रीकृष्णकी इन्द्रनीलके समान कान्ति जगत्को मतवाला बना देती है, क्योंकि विधिने शृङ्गार-रसके सारको छानकर उसमें चन्द्रकी ज्योत्स्नाको मिलाकर श्रीकृष्णकी कान्तिको निर्मल बनाया है ॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'छानि',—मिलाकर, (निचोड़ना) ॥ 41 ॥

[ 19/42-45 उन्नीसवाँ अध्याय 455 श्रीकृष्णकान्तिका वर्णन :- काँहा से मुरलीध्वनि, नवाम्बुद-गर्जित जिनि', जगत् आकर्षे श्रवणे याहार। उठि' धाय व्रज-जन, तृषित चातकगण, आसि' पिये कान्त्यमृत-धार ॥ 42 ॥ अनुवाद-वह मुरलीकी ध्वनि कहाँ है, जो नवमेघकी गर्जनको भी परास्त करती है, जो जगत्के समस्त प्राणियोंके कानोंको आकर्षित करती है। उसे सुनकर व्रजवासी उठकर दौड़ना आरम्भ कर देते हैं और कृष्णके निकट पहुँचकर प्यासे चातकके समान (अपने नेत्रोंसे) उनकी कान्तिकी अमृत-धाराका पान करते हैं ॥ 42 ॥ अनुभाष्य- 'नवाम्बुद',-नवीन मेघ ॥ 42 ॥ मोर सेइ कलानिधि, प्राणरक्षा महौषधि, सखि, मोर तँ हो सुहृत्तम। देह जीये ताँहा बिने, धिक् एइ जीवने, विधि करे एत विड़म्बन !!" 43 ॥ अनुवाद-यद्यपि कृष्ण मेरे लिये कलाके आश्रय हैं, वे मेरे प्राणोंकी रक्षाके लिये महान् औषधि स्वरूप हैं, वे मेरे सर्वाधिक सुहृद हैं, तथापि उन्हें छोड़कर देह जो अब तक जीवित है, मेरे ऐसे जीवनको धिक्कार है! विधाता मुझसे इतना छल कर रहा है॥" 43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'देह जीये ताँहा बिने',-उन्हें छोड़कर देह जो अब तक जीवित है (उसके लिये) ॥ 43 ॥ अनुभाष्य- 'कलानिधि',-चौंसठ कलाओंके आधार; पक्षान्तरमें,-सोलह कलाओंसे पूर्ण; 'विड़म्बन',-छलना, वञ्चना ॥ 43 ॥ विधिकी निन्दा :- 'ये-जन जीते नाहि चाय, तारे केने जीयाय', विधिप्रति उठे क्रोध-शोक। विधिरे करे भर्त्सन, कृष्णे देन ओलाहन, पड़ि' भागवतेर एक श्लोक ॥ 44 ॥ अनुवाद-'जो व्यक्ति जीवित नहीं रहना चाहता, वह उसे क्यों जीवित रखता है?' ऐसा विचार करके श्रीराधा-भावमें विभावित महाप्रभुका विधाताके प्रति क्रोध और अपनी अवस्थापर शोक उत्पन्न होता है। महाप्रभु श्रीमद्भागवतका एक श्लोक पढ़कर विधाताकी भर्त्सना करके श्रीकृष्णको उलाहना देते हैं ॥ 44 ॥ श्रीकृष्णविरह-संघटक विधिकी निन्दा :- श्रीमद्भागवत (10/39/19) में- अहो विधातस्तव न क्वचिद्दया संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः। तांश्चाकृतार्थान् वियुनङ्क्ष्यपार्थकं विचेष्टितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा ॥ 45 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे विधाता, तुममें दया नहीं है! तुम मैत्री और प्रणयके द्वारा देहधारियोंको मिलाकर उनकी अतृप्त अवस्थामें ही उन्हें पुनः पृथक् कर देते हो। तुम्हारी ऐसी चेष्टाओंको बालककी चेष्टाकी भाँति ही कहना पड़ेगा ॥ 45 ॥ अनुभाष्य-कृष्णमें समर्पित प्राणवाली कृष्णवल्लभा व्रजगोपियोंने जब सुना कि श्रीअक्रूर राम और कृष्णको मथुरा ले जानेके लिये ही व्रजमें आये हैं, तब वे कृष्णके भावी-विरहकी आशङ्कासे अतिशय शोक-कातर होकर क्रन्दन और विलाप कर रही हैं- अहो (खेदे) विधातः, तव क्वचित् दया न [अस्ति, यतः] मैत्र्या (हिताचरणेन) प्रणयेन (स्नेहेन) देहिनः (शरीरधारिणः जीवस्य) [अन्योन्यान्] संयोज्य अकृतार्थान् (अप्राप्तभोगान् अपि) तान् च वियुनङ्क्षि (वियोगं विघटयसि); ते (तव) विचेष्टितं (कर्म) अर्भक-चेष्टितं (मौढ्यात् बालकेहितं) यथा (तथा) अपार्थकं (हेतुरहितम्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥

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456 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/46-50 ] श्लोकार्थ ; चित्रजल्पोक्ति :- यथा राग- “ना जानिस् प्रेम-मर्म, व्यर्थ करिस् परिश्रम, तोर-चेष्टा-बालक-समान। तोर यदि लाग् पाइये, तबे तोरे शिक्षा दिये, एमन येन ना करिस् विधान ॥ 46 ॥ अनुवाद-“हे विधाता! तुम प्रेमके मर्मको नहीं जानते हो, तथापि सृष्टि-कार्य आदि करते हो। तुम्हारे ये कार्य निर्बोध बालककी भाँति हैं। यदि तुम हमारी पकड़में आ जाओ, तब हम तुम्हें ऐसा पाठ पढ़ायेंगीं कि तुम पुनः ऐसा कार्य नहीं करोगे ॥ 46 ॥ अनुभाष्य - 'परिश्रम', -सृष्टि-कार्य आदि ॥ 46 ॥ अरे विधि, तुइ बड़इ निष्ठुर। अन्योऽन्य दुर्लभ जन, प्रेमे कराञा सम्मिलन, अकृतार्था केने करिस दूर ? ? 47 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद-हे विधाता! तुम बहुत ही निष्ठुर हो! जिनका परस्पर मिलन दुर्लभ है, प्रेमके द्वारा उनका मिलन करवा देते हो, परन्तु फिर उनको अतृप्त अवस्थामें ही एक-दूसरेसे दूर क्यों कर देते हो ? 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- [हे विधाता !] जिनका परस्पर मिलन दुर्लभ है, प्रेमके द्वारा उनका मिलन करवाकर, मिलन करवानेका जो तात्पर्य है, वह सिद्ध नहीं होनेसे पहले ही पुनः उनको एक-दूसरेसे दूर क्यों कर देते हो ? 47 ॥ अरे विधि अकरुण, देखाञा कृष्णानन, नेत्र-मन लोभाइला मोर। क्षणेके करिते पान, काड़ि' निला अन्यस्थान, पाप कैलि 'दत्त-अपहार' ॥ 48 ॥ अनुवाद-हे निर्दयी विधाता ! तुमने मुझे कृष्णके मुखका दर्शन करवाकर मेरे नेत्रों और मनको उनके प्रति लुब्ध करवा दिया। अभी मैंने एक क्षणमात्रके लिये ही उनके मुखामृतका पान किया था, किन्तु तुम उन्हें मुझसे दूर करके अन्य किसी स्थानपर ले गये। तुमने दान देकर उसे पुनः लौटा लेनेका पाप किया है ॥ 48 ॥ अनुभाष्य - 'दत्त-अपहार', - कोई द्रव्य किसीको देकर पुनः उसे ले लेनेसे दत्तापहार होता है; यह प्रायश्चित योग्य पापमें-से एक है ॥ 48 ॥ 'अक्रूर करे तोर दोष, आमाय केने कर रोष', इहा यदि कह 'दुराचार'। तुइ अक्रूर-मूर्त्ति धरि', कृष्ण निलि चुरि करि', अन्येरे नहे ऐछे व्यवहार ॥ 49 ॥ अनुवाद-हे दुराचारी विधाता ! यदि तुम कहो कि 'यह तो अक्रूरका दोष है, तब तुम मेरे प्रति क्यों रोष कर रही हो?', तो मेरा कहना है कि तुम ही अक्रूरका रूप धारण करके कृष्णको चुराकर ले गये हो, अन्यथा अन्य कोई ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता ॥ 49 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ओहे दुराचार विधाते, तुम यदि यह कहो कि, 'अक्रूरने दोष किया है, मेरे प्रति क्यों क्रोध कर रही हो?' तब मैं कहती हूँ ॥ 49 ॥ अपने भाग्यको धिक्कार (चित्रजल्प) :- आपणार कर्मदोष, तोरे किबा करि रोष, तोर आमार सम्बन्ध विदूर। ये-आमार प्राणनाथ, एकत्र रहि यार साथ, सेइ कृष्ण हइला निष्ठुर ! ! 50 ॥ अनुवाद-हे विधाता! वास्तवमें यह मेरे अपने ही कर्मोंका दोष है, तब फिर मैं तुम्हारे प्रति रोष क्यों करूँ, तुम्हारा और मेरा तो बहुत दूरका सम्बन्ध है। जो मेरे प्राणनाथ हैं, मैं जिनके साथमें ही रहती थी, वे कृष्ण ही तो मेरे प्रति निष्ठुर हो गये हैं ॥ 50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'विदूर', -अति दूर ॥ 50 ॥

[ 19/51-58 उन्नीसवाँ अध्याय 457

श्रीकृष्णके प्रति प्रणयरोषपूर्वक दोषारोपण :- सब त्यजि' भजि याँरे, सेइ आपना-हाते मारे, नारीवधे कृष्णेर नाहि भय। ताँर लागि' आमि मरि, उलटि' ना चाहे हरि, क्षणमात्रे भाङ्गिल प्रणय॥51॥ अनुवाद-मैं सबकुछ त्यागकर जिनका भजन करती हूँ, वे ही अपने हाथोंसे मेरा वध कर रहे हैं। कृष्णको नारीवधरूपी पाप करनेमें कोई भय नहीं है। मैं उनके लिये मरी जा रही हूँ और वे मुड़कर भी मेरी ओर देखते तक नहीं हैं। उन्होंने क्षणमात्रमें ही हमारे प्रेमके बन्धनको तोड़ दिया है॥51॥

भावके उपयोगी गानके द्वारा श्रीस्वरूपका महाप्रभुको आश्वासन :- तबे स्वरूप रामराय, करि' नाना उपाय, महाप्रभुर करे आश्वासन। गायेन मङ्गलगीत, प्रभुर फिराइला चित, प्रभुर किछु स्थिर हैल मन॥54॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराम force? श्रीराम force? 'श्रीरामानन्द' रायने अनेक प्रकारके उपायोंसे महाप्रभुको शान्त किया। उन्होंने जयदेव गोस्वामीके द्वारा रचित मङ्गल-गीतका गायन करके महाप्रभुके चित्तका रूपान्तर कर दिया जिससे महाप्रभुका मन कुछ शान्त हो गया॥54॥

गम्भीरामें महाप्रभुका शयन :- एइमत प्रलापिते अर्द्धरात्रि गेल। गम्भीराते स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे शोयाइल॥55॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा इस प्रकार प्रलाप करते हुए आधी रात व्यतीत हो गयी। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको गम्भीरामें लिटा दिया॥55॥

पुनः अपने भाग्यको धिक्कार :- कृष्णे केने करि रोष, आपन दुर्दैव-दोष, पाकिल मोर एइ पापफल। ये कृष्ण-मोर प्रेमाधीन, तारे कैल उदासीन, एइ मोर अभाग्य प्रबल॥”52॥ अनुवाद-तो मैं कृष्णके प्रति भी रोष क्यों करूँ? वास्तवमें यह मेरे अपने ही दुर्भाग्यका दोष है। कृष्ण मेरे प्रेमके अधीन थे, किन्तु मेरे ही पापोंके पके हुए फलने उन्हें मेरे प्रति उदासीन बना दिया है। मेरा यह दुर्भाग्य ही प्रबल है॥”52॥

प्रभुरे शोयाञा रामानन्द गेला घरे। स्वरूप, गोविन्द शुइला गम्भीरार द्वारे॥56॥ अनुवाद-महाप्रभुके लेट जानेपर श्रीरायरामानन्द भी अपने घर लौट गये। श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द प्रभु गम्भीराके द्वारपर ही लेट गये॥56॥

नामकीर्त्तनमें रात्रि व्यतीत :- प्रेमावेशे महाप्रभुर गरगर मन। नामसङ्कीर्त्तन करि' करेन जागरण॥57॥ अनुवाद-किन्तु महाप्रभु सोये नहीं, वे नाम-सङ्कीर्त्तन करते हुए जागरण करने लगे। उनका मन प्रेमावेशमें विह्वल हो रहा था॥57॥

गोपीभावमें दिव्योन्मादग्रस्त महाप्रभु :- एइमत गौर-राय, विषादे करे हाय हाय, “हाहा कृष्ण, तुमि गेला कति?” गोपीभाव हृदये, तार वाक्य विलापये, 'गोविन्द दामोदर माधवेति॥'53॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीगौरराय हाय-हाय करते हुए विषादमें कहने लगे,-“हा-हा कृष्ण! आप कहाँ चले गये?” हृदयमें गोपीभावमें विभावित होकर श्रीगौरराय विलाप करते हुए गोपियोंके ही वाक्य 'गोविन्द, दामोदर, माधवेति'का गान करने लगे॥53॥

महाप्रभुका मुखघर्षणरूपी दिव्योन्माद (उद्घूर्णा) :- विरहे व्याकुल प्रभु उद्वेगे उठिला। गम्भीरा-भितरे मुख घषिते लागिला॥58॥

458 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/58–68 ] मुखे, गण्डे, नाके क्षत हइल अपार। भावावेशे ना जानेन प्रभु, पड़े रक्तधार ॥ ५९॥ अनुवाद—विरहमें व्याकुल महाप्रभु उद्वेगमें उठ खड़े हुए और गम्भीराकी दीवारोंपर अपने मुखको घिसने लगे। उनके मुख, गालों और नाकपर अनेक घाव बन गये और उनसे रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी, किन्तु उन्हें भावावेशके कारण इसका अनुभव तक ही नहीं हुआ ॥ 58-59 ॥ सर्वरात्रि करेन भावे मुख सङ्घर्षण। गोँ-गोँ शब्द करेन, —स्वरूप शुनिला तखन ॥ 60 ॥ अनुवाद—भावमें आविष्ट होकर महाप्रभु पूरी रात अपना मुख दीवारोंपर घिसते रहे। जब वे अपने मुखसे गोँ-गोँ-शब्द करने लगे, तब श्रीस्वरूप दामोदरने उसे सुना ॥ 60 ॥ श्रीस्वरूपका महाप्रभुके कक्षमें आना :- दीप ज्वालि' घर गेला, देखि' प्रभुर मुख। स्वरूप, गोविन्द दुँहार हैल बड़ दुःख ॥ 61 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुकी अवस्थाके विषयमें पूछना, महाप्रभुका उत्तर :- प्रभुरे शय्याते आनि' शयन कराइला। “काँहे कैला एइ तुमि?” —स्वरूप पुछिला ॥ 62 ॥ अनुवाद—दीपक जलाकर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द गम्भीराके भीतर गये और महाप्रभुके मुखकी अवस्थाको देखकर वे दोनों बहुत दुःखी हुए। महाप्रभुको लाकर शय्यापर लिटाकर श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे पूछा, – “आपने ऐसा क्यों किया?” 61-62 ॥ प्रभु कहेन, – “उद्वेगे घरे ना पारि रहिते। द्वार चाहि' फिरि' शीघ्र बाहिर हइते ॥ 63 ॥ द्वार नाहि पाञा मुख लागे चारिभिते। क्षत हय, रक्त पड़े, ना पाइ याइते ॥” 64 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, –‘मैं उद्वेगके कारण कमरेके भीतर नहीं रह पा रहा था। मैं शीघ्र ही बाहर जानेके लिये द्वारको ढूँढ़ते हुए इधर-उधर घूमता रहा। किन्तु अन्धकारके कारण द्वारको नहीं ढूँढ़ पाया, मेरा मुख बार-बार चारों ओर दीवारोंसे टकराता रहा। मेरे मुखपर चोट लग गयी, रक्त प्रवाहित होने लगा, किन्तु मैं बाहर नहीं निकल पाया ॥’ 63-64 ॥ महाप्रभुके दिव्योन्मादके लक्षण :- उन्माद-दशाय प्रभुर स्थिर नहे मन। येइ करे, येइ बोले, —उन्माद-लक्षण ॥ 65 ॥ अनुवाद—उन्माद-ग्रस्त दशामें महाप्रभुका मन स्थिर नहीं था। वे जो भी करते थे, जो भी बोलते थे, –सब उन्मादके लक्षण होते थे ॥ 65 ॥ भक्तोंके साथ परामर्श करनेके बाद श्रीस्वरूपका महाप्रभुके चरणकमलोंके तकियेके रूपमें श्रीशङ्कर-पण्डितका निर्वाचन :- स्वरूप गोसाञि तबे चिन्ता पाइला मने। भक्तगण लञा विचार कैला आर दिने ॥ 66 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुकी ऐसी अवस्थाको देखकर मनमें बहुत चिन्तित हुए। अगले दिन उन्होंने भक्तोंके साथ बैठकर विचार-विमर्श किया ॥ 66 ॥ सब भक्त मेलि' तबे प्रभुरे साधिल। शङ्कर-पण्डिते प्रभुर सङ्गे शोयाइल ॥ 67 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने मिलकर महाप्रभुसे अनुनय-विनय करके उनकी सहमति ले ली कि श्रीशङ्कर पण्डित उनके कमरेमें उनके साथ लेटेंगे ॥ 67 ॥ प्रभु-पादतले शङ्कर करेन शयन। प्रभु ताँर ऊपर करेन पाद प्रसारण ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित महाप्रभुके चरणोंके नीचे लेटते थे और महाप्रभु अपने चरणोंको उनके ऊपर पसार देते थे ॥ 68 ॥

[ 19/69-73 उन्तीसवाँ अध्याय 459 द्वापरयुगके श्रीविदुरकी भाँति श्रीशङ्करके द्वारा भगवान्‌की सेवा :- 'प्रभु-पादोपाधान' बलि' ताँर नाम हइल। पूर्वे विदूरे येन श्रीशुक वर्णिल ॥ 69 ॥ अनुवाद—इस कारण श्रीशङ्कर पण्डितका नाम 'महाप्रभुके चरणोंका तकिया' पड़ गया। श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकदेव गोस्वामीने पहले श्रीविदुरका भी इसी रूपमें वर्णन किया है॥ 69 ॥ श्रीकृष्णके चरणोंके तकियेरूपी श्रीविदुरके प्रति श्रीमैत्रेयका कीर्तन :- श्रीमद्भागवत (3/13/5)में - इति ब्रुवाणं विदुरं विनीतं सहस्रशीर्ष्णश्चरणोपाधानम्। प्रहृष्टरोमा भगवत्कथायां प्रणीयमानो मुनिरभ्यचष्ट ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सहस्रशीर्षपुरुष श्रीकृष्णके चरणोंके तकिये-स्वरूप विनीत श्रीविदुर जब यह बात पूछ रहे थे, तब मैत्रेयमुनि भगवत्कथामें आनन्दवशतः रोमाञ्चित होकर कहने लगे ॥ 70 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत मैत्रेय ऋषिसे महात्मा विदुरके द्वारा हरिभक्त-श्रेष्ठ स्वायम्भुव मनु और शतरूपाके कार्य-कलापोंकी जिज्ञासा करनेपर, श्रीशुकदेव परीक्षितको श्रीविदुरके प्रश्नोत्तरमें मैत्रेयके द्वारा कही गयी हरिकथाका वर्णन कर रहे हैं— (श्रीशुक उवाच,—) भगवत्कथायां (श्रीहरिगुणानुवर्णने) प्रणीयमानः (विदुरेण प्रवर्त्तमानः) प्रहृष्टरोमा (प्रहृष्टानि रोमाणि यस्य सः) मुनिः (मैत्रेयः) इति ब्रुवाणं पृच्छन्तं सहस्रशीर्ष्णाः (सहस्रशीर्षा श्रीकृष्णः तस्य) चरणोपाधानं (चरणौ उपाधीयेते यस्मिन् तं—श्रीकृष्णः प्रीत्या यस्योत्सङ्गे चरणौ प्रसारयतीत्यर्थः) विनीतं (विनयान्वितम्) विदुरम् अभ्यचष्ट (अभ्यभाषत)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। भगवान् श्रीकृष्ण विदुरके घरमें आकर उनकी गोदमें अपने चरणयुगल रखकर सोये थे, ऐसा कहा जाता है (उपरोक्त श्लोककी सारार्थदर्शिनी टीका देखें) ॥ 70 ॥ अमृतानुकणिका—विदुरकी शङ्काकी निवृत्तिके लिये उनके घरमें श्रीकृष्णने सहस्रशीर्ष विग्रह धारण किया था। महाभारतमें प्रसिद्ध है कि विदुरके घरमें भोजन करनेके उपरान्त भगवान् श्रीकृष्णने उनकी गोदमें अपने चरणकमलयुगल रखकर शयन किया था—“उपरोक्त श्लोककी श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती-कृत सारार्थदर्शिनी टीका ॥” 70 ॥ श्रीशङ्करके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- शङ्कर करेन प्रभुर पाद-सम्वाहन। घुमाञा पड़ेन, तैछे करेन शयन ॥ 71 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित महाप्रभुके चरणोंको दबाते थे। जब महाप्रभुको नींद आ जाती, तब श्रीशङ्कर पण्डित जिस अवस्थामें होते उसी अवस्थामें सो जाते थे ॥ 71 ॥ उघाड़-अङ्गे पड़िया शङ्कर निद्रा याय। प्रभु उठि' आपन-काँथा ताहारे जड़ाय ॥ 72 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित अपने शरीरपर ओढ़नेके लिये कुछ भी नहीं लेकर सो जाते और बादमें जब महाप्रभु जागकर उन्हें देखते तो वे अपने काँथेको (पुराने फटे हुए वस्त्रोंको सिलकर बनाये गये कम्बलको) ही उनके ऊपर डाल देते ॥ 72 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उघाड़-अङ्गे',—अनावृत शरीरपर ॥ 72 ॥ निरन्तर घुमाय शङ्कर शीघ्र-चेतन। बसि' पाद चापि' करे रात्रि-जागरण ॥ 73 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित प्रतिदिन महाप्रभुके साथ गम्भीरामें ही सोते। जैसे ही कुछ शब्द होता, तो वे शीघ्रतासे उठ जाते और फिरसे बैठकर महाप्रभुके चरणोंको दबाते हुए पूरी रात बिता देते॥ 73 ॥

460 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला [19/74-81 ] उनकी उपस्थितिके कारण महाप्रभुके उन्मादका विराम (शान्त होना) :- ताँर भये नारेन प्रभु बाहिरे याइते। ताँर भये नारेन भित्त्ये मुखाब्ज घषिते ॥ 74 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीशङ्कर पण्डितके भयसे गम्भीरासे बाहर नहीं जा पाते थे और उनके भयसे गम्भीराकी दीवारोंसे अपने मुखकमलको भी नहीं घिस पाते थे॥ 74 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा स्वरचित ग्रन्थमें महाप्रभुकी उन्माद दशाका वर्णन :- एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथ दास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश ॥ 75 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी इस लीलाको श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित श्रीचैतन्यस्तवकल्पवृक्षमें प्रकाशित किया है ॥ 75 ॥ श्रीकृष्णके विरहमें प्रलापोन्मादमय महाप्रभु :- स्तावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका छठा श्लोक- स्वकीयस्य प्राणार्बुदसदृश-गोष्ठस्य विरहात् प्रलापानुन्मादात् सततमतिकुर्वन् विकलधीः। दधद्भित्तौ शश्वद्वदनविधुघर्षेण रुधिरं क्षतोत्थं गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ 76 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अपने असंख्य प्राणोंके समान व्रजके विरहमें प्रलापरूपी उन्मादके उत्पन्न होनेपर सर्वदा उस चेष्टाके अधिक वृद्धि प्राप्त करनेपर व्यग्र-बुद्धि गौरचन्द्र प्रतिदिन अपने मुखचन्द्रको दीवारमें घिसकर चोटसे निकले रक्तको धारण करते। ऐसे गौराङ्गदेव मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मादित कर रहे हैं ॥ 76 ॥ अनुभाष्य- स्वकीयस्य (आत्मनः) प्राणार्बुदसदृश-गोष्ठस्य (प्राणार्बुदसदृशस्य असंख्यप्राणतुल्यस्य गोष्ठस्य व्रजस्य) विरहात् (उन्मादात् दिव्योन्मादात् हेतोः) सततं (निरन्तरम्) अतिप्रलापान् कुर्वन् विकलधीः (व्यग्रमतिः सन्) भित्तौ शश्वत् (निरन्तरं) वदनविधुघर्षेण (मुखचन्द्रसङ्घर्षणेन) क्षतोत्थं रुधिरं दधत् (धारयन्) गौराङ्गः हृदये उदयन् मां मदयति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ विप्रलम्भ-प्रेमरसास्वादक महाप्रभु :- एइमत महाप्रभु रात्रि-दिवसे। प्रेमसिन्धु-मग्न रहे, कभु डुबे, भासे ॥ 77 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु रात-दिन प्रेमके सिन्धुमें निमग्न रहते थे। कभी तो वे उसमें डूब जाते और कभी उसकी तरङ्गोंपर तैरने लगते ॥ 77 ॥ एकदिन जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें महाप्रभुके महाभावके आवेशमें दस प्रकारके चित्रजल्पका वर्णन :- एककाले वैशाखेर पौर्णमासी-दिने। रात्रिकाले महाप्रभु चलिला उद्याने ॥ 78 ॥ अनुवाद-एक समय वैशाखकी पूर्णिमाके दिन, रात्रिकालमें महाप्रभु उद्यानकी ओर चल दिये ॥ 78 ॥ 'जगन्नाथवल्लभ' नाम उद्यान-प्रधाने। प्रवेश करिला प्रभु लञा भक्तगणे ॥ 79 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर 'जगन्नाथवल्लभ' नामक प्रधान उद्यानमें प्रवेश कर गये ॥ 79 ॥ प्रफुल्लित वृक्षवल्ली-येन वृन्दावन। शुक, शारी, पिक, भृङ्ग करे आलापन ॥ 80 ॥ अनुवाद-उस उद्यानमें वृक्ष-लताएँ ऐसे प्रफुल्लित हो रही थी, मानो वह वृन्दावन हो। वहाँपर तोता, मैना, मयूर और भ्रमर आदि परस्पर आलाप कर रहे थे ॥ 80 ॥ पुष्पगन्ध लञा बहे मलय-पवन। 'गुरु' हञा तरुलताय शिखाय नाचन ॥ 81 ॥ अनुवाद-मलय-पवन उद्यानके पुष्पोंकी सुगन्धको

[ 19/81–91 उन्नीसवाँ अध्याय 461

वहन करके प्रवाहित हो रहा था और वह गुरु बनकर वृक्ष-लताओंको नृत्यकी शिक्षा प्रदान कर रहा था॥81॥ अनुभाष्य—मलय पवन स्वयं पुष्पोंकी गन्धको वहन करके पुनः नटन-गुरुके (नृत्य-शिक्षकके) रूपमें वृक्ष-लताओंको नृत्यकी शिक्षा प्रदान कर रहा था॥81॥ पूर्णचन्द्र-चन्द्रिकाय परम उज्ज्वल। तरुलतादि ज्योत्स्नाय करे झलमल॥82॥ अनुवाद—पूर्णचन्द्रकी परम-उज्ज्वल चन्द्रिकामें वृक्ष-लताएँ उस ज्योत्स्नासे झलमल कर रहे थे॥82॥ छय ऋतुगण याँहा वसन्त प्रधान। देखि' आनन्दित हैला गौर भगवान्॥83॥ अनुवाद—जगन्नाथ-वल्लभ उद्यानमें छह ऋतुओंके विद्यमान होनेपर भी वसन्त ऋतु ही प्रधान रूपमें थी। उस उद्यानको देखकर भगवान् श्रीगौरसुन्दर अत्यन्त आनन्दित हुए॥83॥ “ललित लवङ्गलता” पद गाओयाञा। नृत्य करि' बुलेन प्रभु निजगण लञा॥84॥ अनुवाद—महाप्रभु 'ललित लवङ्गलता' पदका गान करवाकर नृत्य करते हुए अपने परिकरों सहित जगन्नाथ-वल्लभ उद्यानमें भ्रमण करने लगे॥84॥ प्रतिवृक्षवल्ली ऐछे भ्रमिते भ्रमिते। अशोकेर तले कृष्णे देखेन आचम्बिते॥85॥ अनुवाद—इस प्रकार प्रत्येक वृक्ष और लताके निकट भ्रमण करते-करते महाप्रभुने अचानक एक अशोक वृक्षके नीचे श्रीकृष्णको देखा॥85॥ कृष्ण देखि' महाप्रभु धाञा चलिला। आगे देखि' हासि' कृष्ण अन्तर्धान हइला॥86॥ अनुवाद—श्रीकृष्णको देखकर महाप्रभु दौड़कर उस ओर चल दिये और श्रीकृष्ण महाप्रभुको आगे आते देखकर हँसते हुए अन्तर्धान हो गये॥86॥ आगे पाइला कृष्णे, ताँरे पुनः हाराञा। भूमेते पड़िला प्रभु मूर्च्छित हञा॥87॥ अनुवाद—पहले तो श्रीकृष्णको पाकर और बादमें उन्हें पुनः गँवानेके कारण महाप्रभु मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े॥87॥ कृष्णेर अङ्गगन्धे भरिछे उद्याने। सेइ गन्ध पाञा प्रभु हैला अचेतने॥88॥ अनुवाद—जगन्नाथ-वल्लभ उद्यान श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धसे भर गया था, उस सुगन्धको पाकर ही महाप्रभु अचेतन हो गये॥88॥ निरन्तर नासाय पशे कृष्ण-परिमल। गन्ध आस्वादिते प्रभु हइला पागल॥89॥ अनुवाद—महाप्रभुके नाकमें निरन्तर श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध प्रविष्ट हो रही थी, जिसका आस्वादन करके महाप्रभु पागल हो उठे॥89॥ महाप्रभुका चित्रजल्प :- कृष्णगन्ध-लुब्धा राधा सखीरे ये कहिला। सेइ श्लोक पड़ि' प्रभु अर्थ करिला॥90॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धसे लुब्ध श्रीराधाने अपनी सखीसे जो कहा था, महाप्रभुने उसी श्लोकका उच्चारण करके उसका अर्थ बतलाया॥90॥ श्रीकृष्णगन्धसे आकृष्ट श्रीराधाकी उक्ति :- गोविन्दलीलामृत (8/6)में विशाखाके प्रति श्रीराधिकाके वचन— कुरङ्गमदजिद्वपुः परिमलोर्मिकृष्टाङ्गनः स्वकाङ्गनलिनाष्टके शशियुताब्जगन्धप्रथः। मदेन्दुवरचन्दनागुरुसुगन्धिवर्चार्चितः स मे मदनमोहनः सखि तनोति नासास्पृहाम्॥91॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥91॥

462 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/91-95 ] अमृतप्रवाह भाष्य—जो मृगमदको भी विजय करनेवाली अपनी देहकी गन्धकी तरङ्गोंके द्वारा स्त्रियोंके चित्तको आकर्षित करते हैं, जो अपने आठ अङ्गोंमें [मुख, नाभि, दो-दो नेत्र, हस्त और चरण] आठ कमलोंसे युक्त हैं और कर्पूरयुक्त कमलकी गन्धका प्रचार (विस्तार) करते हैं एवं जो कस्तूरी-कर्पूर-चन्दन-अगुरूकी सुगन्धके द्वारा सुवासित हैं, हे सखि, वे मदनमोहन मेरी नाककी स्पृहाका वर्धन कर रहे हैं॥91॥ अनुभाष्य— हे सखि, कुरङ्गमदजिद्वपुःपरिमलोर्मिकृष्टाङ्गनः (मृगमद- कस्तूरिकाविजयिवपुषः अङ्गस्य सुगन्धप्रवाहेण कृष्टा आकृष्टा अङ्गना व्रजाङ्गना येन सः) स्वकाङ्गनलिनाष्टके (स्वकानां अङ्गनलिनानां निजाङ्गपद्मनाम् अष्टके मुखनाभिनेत्रद्वयकरद्वयपद युगकमलाष्टके) शशियुताब्जगन्धप्रथः (कर्पूरयुतस्य पद्मगन्धस्य प्रथा विस्तारो यस्मिन् सः) मदेन्दुवरचन्दनागुरुसुगन्धचर्चर्चितः (कस्तूरीकर्पूरशुभ्रचन्दनानां सुगन्धचर्चाभिः अर्चितः विलेपितः सः) मदनमोहनः मे (मम) नासास्पृहां तनोति (वर्धयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥91॥ श्लोकार्थ; श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके माधुर्यबलका वर्णन :- यथा राग— “कस्तुरिका-नीलोत्पल, तार येइ परिमल, ताहा जिनि' कृष्ण-अङ्ग-गन्ध। व्यापे चौद्द-भुवने, करे सर्व आकर्षणे, नारीगणेर आँखि करे अन्ध॥92॥ अनुवाद—“कस्तूरी और नीलकमलकी जो सुगन्ध होती है, श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध उसे भी पराभूत करती है। श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध चौदह भुवनोंमें व्याप्त होकर सभीको अपनी ओर आकर्षित करती है और स्त्रियोंके नेत्रोंको तो अन्धा बना देती है॥92॥ गोपियोंको वशमें करनेवाली श्रीकृष्णकी अङ्ग-गन्ध :— सखि हे, कृष्णगन्ध जगत् माताय। नारीर नासाते पशे, सर्वकाल ताँहा बसे, कृष्णपाश धरि' लञा याय॥93॥ध्रु॥ अनुवाद—हे सखि, श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध समस्त जगत्को मतवाला बना देती है। वह सुगन्ध स्त्रियोंके नाकमें प्रवेश करके सदाके लिये वहीं वास करती है और उन्हें पकड़कर श्रीकृष्णके निकट ले जाती है॥93॥ कमल-सदृश श्रीकृष्णाइङ्गोंकी गन्धके माधुर्यका वर्णन :- नेत्र, नाभि, वदन, कर-युग-चरण, एइ अष्टपद्म कृष्ण-अङ्गे। कर्पूरलिप्त कमल, तार यैछे परिमल, सेइ गन्ध अष्टपद्म-सङ्गे॥94॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी देहमें दो नेत्र, एक नाभि, एक मुख, दो हाथ और दो चरण—कुल मिलाकर आठ कमल हैं। कर्पूरसे लिप्त कमलकी जैसी सुगन्ध होती है, वैसी सुगन्ध श्रीकृष्णकी देहमें विद्यमान आठ कमलोंमें है॥94॥ अनुभाष्य—दो चक्षु, नाभि, मुख, दो हाथ, दो चरण,—ये आठ अङ्ग॥94॥ हेम-कीलित चन्दन, ताहा करे घर्षण, ताहे अगुरु, कुङ्कुम, कस्तुरी। कर्पूर-सने चर्चा अङ्गे, पूर्वअङ्गेर गन्ध सङ्गे, मिलि' तारे येन कैल चुरि॥95॥ अनुवाद—स्वर्ण-जड़ित चन्दनको घिसकर और उसमें अगुरु, कुङ्कुम, कस्तूरी और कर्पूरको मिलाकर श्रीकृष्णके अङ्गोंपर किया लेपन श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धके साथ मिलनेपर ऐसा प्रतीत होता है मानो लेपकी सुगन्धने श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धको आच्छादित कर दिया है॥95॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'हेम-कीलित',—स्वर्णसे जड़ित; 'चुरि',—गोपन, (आच्छादन)॥95॥ अनुभाष्य—'चर्चा',—लेपन; पाठान्तरमें, 'मिलि डाका येन कैल चुरि' और 'कामदेवेर मन कैल चुरि'॥95॥

[ 19/96-100 उन्नीसवाँ अध्याय 463 गोपियोंके चित्तको उन्मादित करनेवाली श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्ध :- हरे नारीर तनु-मन, नासा करे घूर्णन, खसाय नीवि, छुटाय केशबन्ध। करिया आगे बाउरी, नाचाय जगत्-नारी, हेन डाकातिया कृष्णाङ्गगन्ध ॥ 96 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी देहकी सुगन्ध नारियोंके तन और मनका हरण कर लेती है। वह उनकी नाकको भ्रमित कर देती है, उनके नाड़ेके बन्धनको ढीला कर देती है और उनके केशोंके बन्धनको खुलवा देती है। वह सुगन्ध जगत्की नारियोंको उन्मत्त बनाकर उन्हें नचाती है। वह सुगन्ध ऐसी डकैत है ॥ 96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'बाउरी', —उन्मत्त ॥ 96 ॥ श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके आस्वादनके लिये आर्त गोपियोंका चित्त :- सेइ गन्धवश नासा, सदा करे गन्धेर आशा, कभु पाय, कभु नाहि पाय। पाइले पिया पेट भरे, पिङ पिङ तबु करे, ना पाइले तृष्णाय मरि' याय ॥ 97 ॥ अनुवाद—उस सुगन्धके वशीभूत होकर नाक सदा उसी सुगन्धकी आशा करती है, किन्तु कभी तो उसे वह सुगन्ध प्राप्त होती है और कभी नहीं। उस सुगन्धको प्राप्त करनेपर नाक पेट भरकर उसे पी लेती है, तथापि और पीनेकी अभिलाषा करती है। किन्तु सुगन्धके नहीं मिलनेपर नाक प्याससे मृतप्रायः हो जाती है ॥ 97 ॥ चित्रजल्प-उक्ति :- मदनमोहन-नाट, पसारि चाँदेर हाट, जगन्नारी-ग्राहके लोभाय। बिना-मूल्ये देय गन्ध, गन्ध दिया करे अन्ध, घर याइते पथ नाहि पाय ॥ "98 ॥ अनुवाद—मदनमोहन-नाटकिया सुगन्धके हाटको लगाकर जगत्की नारियोंको आकर्षित करके अपना ग्राहक बनाता है। वह बिना किसी मूल्यके ही सुगन्धका वितरण करता है और वह सुगन्ध नारियोंको ऐसा अन्धा बना देती है कि वे अपने घर जानेका मार्ग तक भी नहीं देख पातीं ॥ "98 ॥ अनुभाष्य— 'जगन्नारी-ग्राहके लोभाय', —जगत्में व्रजनारी गोपियोंको ग्राहकके रूपमें प्रलोभित करता है ॥ 98 ॥ महाप्रभुकी उन्माद अवस्था :- एइमत गौरहरि, गन्धे कैल मन चुरि, भृङ्गप्राय इति-उति धाय। याय वृक्षलता-पाशे, कृष्ण स्फुरे सेइ आशे, कृष्ण ना पाय, गन्धमात्र पाय ॥ 99 ॥ अनुवाद—इसी प्रकार श्रीगौरहरिके मनको भी श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धने चुरा लिया, इसलिये वे भ्रमरकी भाँति इधर-उधर दौड़ रहे थे। श्रीगौरहरि श्रीकृष्णकी स्फूर्तिकी आशासे वृक्ष-लताओंके निकट जा रहे थे, किन्तु उन्हें श्रीकृष्ण तो नहीं मिल रहे थे, केवलमात्र उनके अङ्गोंकी सुगन्ध प्राप्त हो रही थी ॥ 99 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीरायकी चेष्टासे महाप्रभुका बाह्यदशामें आगमन :- स्वरूप-रामानन्द गाय, प्रभु नाचे, सुख पाय, एइमते प्रातःकाल हैल। स्वरूप-रामानन्दराय, करि नाना उपाय, महाप्रभुर बाह्यस्फूर्त्ति कैल ॥ 100 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द राय गान कर रहे थे, महाप्रभु नृत्य कर रहे थे और उस आनन्दमें डूब रहे थे। इस प्रकार होते-होते प्रातःकाल हो गया। श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायने अनेक उपाय करके महाप्रभुको बाह्य जगत्की स्फूर्त्ति करवायी ॥ 100 ॥

464 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/101-107 ] महाप्रभुके द्वारा मातृभक्तिका प्रदर्शन, श्रीकृष्णविरहमें उद्घूर्णा-चित्रजल्प वर्णित :- मातृभक्ति, प्रलापन, भित्त्ये मुख-घर्षण, कृष्णगन्ध-स्फूर्त्ये दिव्यनृत्य। एइ चारिलीला-भेदे, गाइल एइ परिच्छेदे, कृष्णदास रूपगोसाञि-भृत्य ॥ 101 ॥ अनुवाद-श्रीरूपगोस्वामीके दास कृष्णदासने इस अध्यायमें महाप्रभुकी मातृभक्ति, उनके द्वारा किया गया प्रलाप, उनके द्वारा दीवारमें अपने मुखको घिसना और श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके स्फुरित होनेपर दिव्य नृत्य-इन चार लीलाओंका गान किया गया है॥ 101 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृष्णदास रूपगोसाञि-भृत्य',-इस पद्यको पाठ करके अनेक व्यक्तियोंके मनमें यह विचार आता है कि श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी श्रीरूपगोस्वामीके मन्त्र-शिष्य हैं। किन्तु अन्यान्य स्थानोंपर पढ़नेसे ऐसा सिद्धान्त स्थिर करना दुष्कर है। इस स्थानपर श्रीरूपके द्वारा रचित भक्तिरसामृतसिन्धुकी शिक्षाका आश्रय करके श्रील कविराज-प्रभु रसका विस्तार कर रहे हैं, इसलिये वे श्रीरूपका केवलमात्र नाम उल्लेख कर सकते हैं; अथवा गोस्वामियोंके दास कृष्णदासरूप इस लेखकने इस पद्यकी रचना की है,-यह अर्थ भी हो सकता है॥ 101 ॥ उन्नीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। एइमत महाप्रभु पाञा चेतन। स्नान करि' कैल जगन्नाथ-दरशन ॥ 102 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुको बाह्य चेतना आयी। तब उन्होंने स्नान किया और भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये गये॥ 102 ॥ अप्राकृत अधोक्षज श्रीकृष्ण और कार्ष्णलीला-अक्षजज्ञानी जड़विद्या-मत्त पण्डिताभिमानी तर्कपन्थीके लिये अगम्य :- अलौकिक कृष्णलीला, दिव्य शक्ति तार। तर्केर गोचर नहे चरित्र याहार ॥ 103 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकी लीला अलौकिक है, उसकी शक्ति दिव्य है, उसके क्रिया-कलाप तर्कके गोचर नहीं हैं॥ 103 ॥ एइ प्रेम सदा जागे याहार अन्तरे। पण्डितेह तार चेष्टा बुझिते ना पारे ॥ 104 ॥ अनुवाद-यह प्रेम जिनके हृदयमें सदा जाग्रत रहता है, उनकी चेष्टाओंको परम विद्वान व्यक्ति भी समझ नहीं पाता॥ 104 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/17)- धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि। अन्तर्वाणीभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा ॥ 105 ॥ अनुवाद-जिस धन्य व्यक्तिके चित्तमें नवप्रेम उदित होता है, उसकी समस्त क्रियाएँ और भावभङ्गिमा अर्थात् समस्त लक्षण शास्त्रोंको जाननेवाले पुरुष भी नहीं समझ सकते॥ 105 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 23/36 संख्या देखें ॥ 105 ॥ अप्राकृत श्रद्धाके साथ महाप्रभुकी अधोक्षज-लीलामें विश्वास संस्थापित करनेका अनुरोध :- अलौकिक प्रभुर 'चेष्टा', 'प्रलाप' शुनिया। तर्क ना करिह, शुन, विश्वास करिया ॥ 106 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी अलौकिक 'चेष्टाएँ' और 'प्रलाप'को सुनकर किसी प्रकारका कोई तर्क मत करना, अपितु उसे विश्वासपूर्वक सुनो॥ 106 ॥ भ्रमरगीतामें श्रीराधाके प्रलाप और महिषियोंके गीतमें दस प्रकारकी चित्रजल्पकी उक्ति :- इहार सत्यत्वे प्रमाण श्रीभागवते। श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते ॥ 107 ॥ अनुवाद-इसकी सत्यताका प्रमाण श्रीमद्भागवतमें मिलता है। 'भ्रमर-गीता'में श्रीराधाके प्रलापका वर्णन है॥ 107 ॥

[ 19/107 ] उन्तीसवाँ अध्याय 465 अनुभाष्य—(क) 'श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते',— भाः 10/47/12-21 श्लोक देखें ; जैसे— “मधुप कितव-बन्धो मा स्पृशाङ्घ्रिं सपत्नयाः कुच-विलुलितमाला-कुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः। वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं यदु सदसि विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक्॥” 1 ॥ श्रीराधाने कहा,—“हे धूर्त्तबन्धु, भ्रमर, तुम मेरे चरणोंको स्पर्श मत करना। मेरी सौतनोंके वक्षसे श्रीकृष्णकी वनमाला मर्दित हुई है, तुम्हारी मूँछोंमें उसके चिह्न दिखायी दे रहे हैं। मधुपति उन सब मानिनियोंके सन्तोषका विधान करें। तुमने जिसके दूत होकर भी इस प्रकार सुरत-चिह्नको धारण कर रखा है, उन श्रीकृष्णका इस प्रकारका आचरण निश्चय ही यादवोंकी सभामें उपहासका विषय होगा॥1॥” उद्धवेर आगमने व्रजे व्रजबाला। कृष्णकथा गाहि' काँदि' त्यजे अश्रुमाला॥ सेइकाले गोपी एक भृङ्गे लक्ष्य करि'। उद्धवेरे 'दूत'ज्ञाने बले प्रिय स्मरि'॥ गोपी कहे,—हे भ्रमर, तुमि धूर्त्तमित्र। पदस्पर्श-कार्य तव बड़इ विचित्र॥ तव नमस्कारे कभु ना हब प्रसन्न। तव श्मश्रुप्रान्ते देखि कुङ्कुमेर चिह्न॥ पत्नीर वक्षोद्वये कृष्ण-वनमाला। मर्दित-कुङ्कुम देखि' हय मम ज्वाला॥ मानिनीर प्रसन्नता-संग्रहे माधव। व्यस्त आछे सेइ कार्ये माथुर-बान्धव॥ व्रजजने यार कभु नाइ प्रयोजन। गोपीतुष्टि-तरे ताँर नाहिक कारण॥ तुमि-यदुपति-दूत, तोमार कि काय? तोमा' तरे सभामध्ये कृष्ण पाबे लाज॥1॥ [उद्धवके व्रजमें आनेपर व्रजकी बालाओंने कृष्णकी बातोंको कह-कहकर क्रन्दन करते हुए अश्रुओंकी माला प्रवाहित की थी। उस समय एक गोपी एक भ्रमरको देखकर और उद्धवको कृष्णका 'दूत' जानकर प्रिय कृष्णका स्मरण करते हुए कहने लगी,—हे भ्रमर, तुम धूर्त्त व्यक्तिके मित्र हो। तुम्हारे द्वारा मेरे चरण-स्पर्श करना बहुत विचित्र है। मैं तुम्हारे नमस्कारसे कभी भी प्रसन्न नहीं होऊँगी। मैं तुम्हारी मूँछोंपर कुङ्कुमका चिह्न देख रही हूँ। सपत्नियोंके दोनों वक्षोंके द्वारा कृष्णकी मर्दित वनमालापर लगे कुङ्कुमको देखकर मुझे जलन होती है। माथुर रमणियोंके बन्धु माधव उन मानिनी प्रियाओंको प्रसन्न करनेमें बहुत व्यस्त हैं। व्रजजनोंकी जिन्हें कोई आवश्यकता नहीं है, उनके द्वारा गोपियोंको सन्तुष्ट करनेका भी कोई कारण नहीं है। तुम यदुपतिके दूत हो, तुम्हारा यहाँ क्या कार्य है? तुम्हारे कारण कृष्णको सभामें लज्जित होना पड़ेगा।] “सकृदधर-सुधां स्वां मोहिनीं पाययित्वा सुमनस इव सद्यस्तत्यजेऽस्मान् भवादृक्। परिचरति कथं तत्पादपद्मं नु पद्मा ह्यपि बत हतचेता ह्युत्तमःश्लोकजल्पैः॥” 2॥ “तुम जिस प्रकार एक पुष्पका त्याग करके दूसरे पुष्पपर चले जाते हो, उसी प्रकार श्रीकृष्णने भी हमें एकबार मात्र लालसा वर्धनकारी अपने अधरामृतका पान करवाकर उसी समय हमारा परित्याग किया है। [हे भ्रमर यदि तुम कहो]—'लक्ष्मीदेवी किस कारणसे ऐसे व्यक्तिके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं?' तो मेरा मानना है कि निश्चय ही श्रीकृष्णके मिथ्या वचनोंसे उनका चित्त आकृष्ट हुआ है, परन्तु हम लक्ष्मीके जैसी अविवेकी नहीं हैं॥”2॥ गोपीस्थाने करे कृष्ण किवा अपराध? याहा लागि गोपीचित्ते हय एइ बाध?? हेतु शुन,—कृष्णचन्द्र स्वकीय मोहिनी। अधरेर सुधा पान कराइया यिनि॥ सद्य त्याग करि' हरि' गोपीकार मन। येरूप तोमार मत अर्वाचीन जन॥ सुकुसुम त्याग करि' याय अन्य-मने। तद्रूप कृष्णेर कार्य आमादेर सने॥ अचतुरा पद्मा कृष्णपादपद्म केन। त्याग नाहि करि' एबे यतने सेवेन?? कृष्ण-मिथ्यावाक्ये पद्मा करेछे प्रत्यय। पद्मासम अविदग्धा गोपी कभु नय॥2॥

466 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/107 ] [(भ्रमर यदि पूछे—) 'गोपियोंके प्रति कृष्णने ऐसा [गोपीकी सन्तुष्टिके लिये भ्रमर कृष्णका गुणगान क्या अपराध किया है जिसके कारण गोपियोंके चित्तमें करने लगा। ऐसा जानकर और उसकी सुमधुर तानको यह अप्रसन्नता है?' तो हे भ्रमर, उसका कारण सुनो, सुनकर गोपीने उससे कहा,—'हे भ्रमर, सुनो! कृष्ण कृष्णचन्द्र अपनी मोहिनी अधरसुधाका पान करवाकर अब गोकुलवासी नहीं हैं, (किन्तु) हम उन यदुपतिसे गोपियोंके मनको हरण करके शीघ्र ही उन्हें त्यागकर चिर-परिचित हैं। हमने उनकी कथाएँ बहुत बार सुनी चले गये। जिस प्रकार तुम्हारे जैसा अज्ञानी व्यक्ति एक हैं। हम उन्हें भली-भाँति जान गयी हैं, इसलिये अब सुन्दर मकरन्दसे पूर्ण कुसुमके मधुका पानकर उसका उनका गुणगान और नहीं सुनेंगी। कृष्णकी जो अब त्यागकर अन्य मनवाला होकर चला जाता है, कृष्णने निजप्रिय सखियाँ हैं, तुम उनके पास जाकर ही भी हमारे साथ वैसा ही किया। (भ्रमर यदि कहे—) कृष्णका गुणगान करो। कृष्णके आलिङ्गनके द्वारा जिन 'अचतुरा लक्ष्मी किसलिये कृष्णके चरणकमलोंका त्याग कृष्णप्रेमवती रमणियोंको सुमतिकी प्राप्ति हुई है और नहीं करती और प्रीतिपूर्वक उनकी सेवा करती हैं?' उसके द्वारा उनकी वक्ष-रोगकी पीड़ा शान्त हो गयी है, तो इसका कारण यह है कि लक्ष्मीने कृष्णके मिथ्या उन (कृष्णरूपी धनसे) धनी कृष्णकी सर्वाधिक प्रियाओंके वचनोंपर विश्वास कर लिया है, किन्तु हम गोपियाँ सामने कृष्णका गुणगान करो जिसे सुनकर वे तुम्हें कदापि लक्ष्मीकी भाँति अचतुर (सरल) नहीं हैं।] सम्मान प्रदान करेंगी।] “किमिह बहु षडङ्घ्रे गायसि त्वं यदूना- “दिवि भुवि च रसायां काः स्त्रियस्तदुरापाः मधिपतिमगृहाणामग्रतो नः पुराणम्। कपटरुचिर-हास-भ्रूविजृम्भस्य याः स्युः। विजयसख-सखीनां गीयतां तत्प्रसङ्गः चरण-रज उपास्ते यस्य भूतिर्वयं का क्षपितकुचरुजस्ते कल्पयन्तीष्टमिष्टाः ॥” 3 ॥ अपि च कृपण-पक्षे ह्युत्तमःश्लोकशब्दः ॥” 4 ॥ “हे भ्रमर, तुम हम व्रजवासिनियोंके सामने किसलिये “(हे कृष्णप्रेयसी शिरोमणे! आप इस प्रकार मत कृष्णकी पुरानी बातोंका बार-बार गान कर रहे हो? बोलिये। आपको स्मरण करके श्रीकृष्णकी काम विडम्बना श्रीकृष्णकी नवीन सखियोंके पास जाकर कृष्ण-प्रसङ्गका उपस्थित होते ही उन्होंने तुम्हारी प्रसन्नता उत्पादन गान करो। श्रीकृष्णके आलिङ्गनके द्वारा जिनकी करनेके लिये मुझे आदेश किया है, इस प्रकार भ्रमर स्तन-पीड़ाकी शान्ति हुई है, वैसी कृष्णप्रिया कामिनियाँ कह रहा है, ऐसी कल्पना करके श्रीराधा कहने तुम्हारे अभीष्टको पूर्ण करेंगी॥” 3 ॥ लगीं)—स्वर्ग, मर्त्य और रसातलमें वास करनेवाली कामनियोंमें-से उनके लिये कौन दुर्लभ है? स्वयं गोपीतुष्टि-हेतु भृङ्ग करे कृष्णगान। लक्ष्मीदेवी कपट-मनोहर हास्यके साथ भृकुटिका सञ्चालन एइ बुझि’ कहे गोपी शुनिया सुतान॥ करनेवाले श्रीकृष्णकी चरणधूलिकी सेवा करती हैं, ऐसी शुन हे भ्रमर, कृष्ण-भवनरहित। परिस्थितिमें हम किस प्रकारसे उनके योग्य हो सकती यदुपति आमादेर चिरपरिचित॥ हैं? कृपण लोग ही अनुकम्पाशील वैसे पुरुषको शुन्याछि तार कथा मोरा बहुबार। उत्तमःश्लोक कहकर उनका गुणगान कर सकते हैं, मेरे ताँरे जानियाछि, गान शुनिब ना आर॥ समान गोपियाँ वैसा नहीं कर सकतीं॥” 4 ॥ कृष्ण-निजप्रिय जन याँहारा एखन। ताँदेर निकटे गिया करह गायन॥ हे मधुप, कृष्णचन्द्र गोपीके स्मरिया। कृष्ण-आलिङ्गन याँरा लभेछे सुमति। अनङ्ग-वेदनाखिन्न व्याकुल हइया॥ वक्षोरोग ह’ते मुक्त कृष्णप्रेमवती॥ पाठायेछे दूतरूपे मम तुष्टि तरे। सेइ धनी प्रियवरा तब कृष्णगान। बलिओ ना एइ कथा आमार गोचरे॥ शुनिया आदर करि’ दिबे तब मान॥ 3 ॥

[ 19/107 उन्नीसवाँ अध्याय 467 स्वर्ग-मरत-तले आछे यत नारी। भ्रमरे देखिया गोपी निज-पादमूले। सबेइ कृष्णेर प्राप्य, ता' बलिते पारि॥ क्षमाइछे अपराध पशि' पदाङ्गुले॥ कपट रुचिर हास्य कृष्णेर भ्रूद्वय। त्यज' शिर पद ह'ते भ्रमर कुशल। विराजित देखि' लक्ष्मी सदाइ सेवय॥ मुकुन्द कि शिखायेछे, मोरे ताहा बल॥ लक्ष्मीदेवी-तुलनाय आमरा-सामान्य। मिष्टवाक्य-प्रार्थनाय आर दौत्य-धर्मे। कपट ह'लेओ कृष्ण सहसा वदान्य॥ चतुरता आछे, भृङ्ग, जानिलाम मर्मे॥ बोलो ताँरे, दीनप्रति अनुग्रह याँर। मुकुन्देर अपराध किवा आछे बल? 'उत्तमःश्लोकाख्य'-शब्दे परिचय ताँर॥4॥ बलिओ ना एड् कथा, तुमि भृङ्ग-खल॥ [हे भ्रमर! कृष्णचन्द्रने गोपीको स्मरण करके पतिपुत्र छाड़ि' आर परलोक-धर्म। और काम-वेदनासे दुःखी और व्याकुल होकर तुम्हें कृष्णसेवा बिना मोर नाहि कोन कर्म॥ मेरी सन्तुष्टिके लिये दूत बनाकर भेजा है-तुम यह असंयत चित्त कृष्ण अनायासे भूलि'। बात मेरे सामने मत बोलना। स्वर्ग, पृथ्वी और पातालमें काय नाइ कथा तार, सन्धान ना तुलि॥5॥ जितनी भी नारियाँ हैं, सभीको कृष्ण प्राप्त कर सकते [भ्रमरको अपने चरणोंपर मँडराते देखकर गोपीने हैं, यह मैं निश्चित रूपसे कह सकती हूँ। कृष्णकी सोचा कि यह मेरे चरणोंकी अँगुलियोंको स्पर्श करके दोनों भौहोंपर कपट-रुचिके हास्यको विराजित देखकर अपने अपराधके लिये क्षमा माँग रहा है, इसलिये ही लक्ष्मी उसकी सदा सेवा करती हैं। लक्ष्मीदेवीकी गोपीने भ्रमरसे कहा,-हे कुशल भ्रमर! अपने सिरको तुलनामें हम तो साधारण स्त्रियाँ हैं, कृष्ण कपटी होनेपर मेरे चरणोंसे हटा लो। तुम मुझे यह बताओ कि भी सहसा वदान्य भी बन जाते हैं। तुम कृष्णसे कहना मुकुन्दने तुम्हें क्या सिखाकर भेजा है। मैंने तुम्हारा मर्म कि दीनोंके प्रति जो कृपा करता है, वही 'उत्तम-श्लोक'के जान लिया है कि तुममें मधुर वचनोंके द्वारा प्रार्थना रूपमें जाना जाता है।] करने और दूतका धर्म निभानेकी चतुरता है। किन्तु “विसृज शिरसि पादं वेद्म्यहं चाटुकारै- हे दुष्ट भ्रमर! मुझसे ऐसी बात मत कहना कि रनुनयविदुषस्तेऽभ्येत्य दौत्यैर्मुकुन्दात्। 'बताओ मुकुन्दका अपराध क्या है?' कृष्णसेवाके स्वकृत इह विसृष्टापत्यपत्यन्यलोका अतिरिक्त मेरा अन्य कोई कार्य ही नहीं था, उसके व्यसृजदकृतचेताः किं नु सन्धेयमस्मिन्॥”5॥ लिये मैंने पति-पुत्र और परलोक-धर्म तकका परित्याग “तदनन्तर भ्रमर उनके चरणकमलोंको स्पर्श करके कर दिया था। किन्तु असंयत-चित्त कृष्ण इस बातको क्षमा प्रार्थना कर रहा है, ऐसा मनमें विचार करके गोपी अनायास ही भूल गये। इसलिये ऐसे व्यक्तिकी बातोंसे कहने लगीं,-हे भ्रमर! तुम मेरे चरणोंसे अपने मुझे क्या काम? उनके साथ सन्धि कैसे सम्भवपर मस्तकको हटा लो, (तथापि वह भ्रमर उनके चरणोंको है?] नहीं छोड़ रहा है, ऐसा मानकर कहने लगीं) तुम “मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा श्रीकृष्णसे शिक्षा प्राप्त करके दूतोचित प्रिय वाक्यके स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्। द्वारा अनुनय-विषयमें पण्डित हो गये हो, तुम्हारे बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद् ध्वाङ्क्षवद् य- विषयमें मैं सब कुछ जानती हूँ। हमने उनके लिये स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः॥6॥” अपने पति, पुत्र, परलोक सभीका परित्याग किया था, “इस नृशंस-प्रकृतिके श्रीकृष्णने रामावतारमें व्याधके ऐसी परिस्थितिमें वे असंयतचित्त पुरुष हमारा परित्याग समान वानरराज बालिका वध किया था और स्त्रीके करके चले गये, इस प्रकारके व्यक्तिके साथ कैसे वशीभूत होकर कामसे पीड़ित होकर आयी शूर्पनखाके हमारी सन्धि हो सकती है?॥”5॥ नाक और कान काट दिये थे। पूजोपहारको खाकर

468 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/107 ] कौवेके आचरणके समान वामनावतारमें बलिराजके द्वारा प्रदत्त समस्त राज्यको ग्रहण करके भी बलिको बाँध दिया था। ऐसे कृष्णके साथ बन्धुत्वसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, किन्तु उनके कथारूपी धनका त्याग करना हमारे लिये अति दुष्कर है॥” 6॥ कृष्ण-पूर्वजन्मकथा यबे उठे मने। ओहे भृङ्ग, भय हय गोपीकार गणे॥ राम-अवतारे यबे व्याधवत् हरि। अविचारे क्रूर हइ’ बालि वध करि’॥ कामपरा शूर्पनखा यबे राम-स्थाने। याय, तबे सीता-बाध्य काटे नाक-काणे॥ बलिराज ह’ते हरि वामनमूर्त्तिते। पूजा-उपहार लभि’ ताहाके वञ्चिते॥ काकवत् बान्धिलेन सेइ गुणधर। तार सह सख्य भाल नय, हे भ्रमर॥ तार कथारूप अर्थ सुदुस्त्यज जानि’। से-कारणे त्याग-कार्ये बलहीन मानि॥6॥ [हे भ्रमर, कृष्णके पूर्व-जन्मोंकी कथाएँ जब भी हृदयमें उदित होती हैं, तब गोपियाँ भयभीत हो जाती हैं। राम-अवतारमें हरिने व्याधकी भाँति बिना कोई विचार किये क्रूरतापूर्वक बालिका वध किया था। काममें आसक्त होकर जब शूर्पनखा रामके पास आयी थी, तब सीताके वशीभूत होनेके कारण रामने उसके नाक और कानोंको काट दिया था। हरिने वामनरूप धारण करके महाराज बलिसे छल करके उससे पूजा और उपहारोंको प्राप्त किया और बादमें कौवेके गुणको धारण करके बलिको बाँध भी दिया। इसलिये हे भ्रमर! उनके (कृष्णके) साथ मित्रता रखना अच्छा नहीं है। किन्तु उनकी कथारूपी धनको छोड़ पाना अति कठिन है, इसलिये मैं उसे त्याग करनेमें स्वयंको असमर्थ पाती हूँ।] ‘यदुनुचरितलीला-कर्णपीयूष-विप्रुट् सकृददन-विधूत-द्वन्द्वधर्मा विनष्टाः। सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सृज्यदीना बहव इह विहङ्गा भिक्षुचर्यां चरन्ति॥” 7॥ “हंसके समान सार-असारको जाननेवाले जो लोग जिनके चरित्र लीलाकथामृतकी कणिकामात्रको कानोंरूपी दोनोंमें भरकर आस्वादन करते हैं, वे रागादि द्वन्द्वसे रहित और भोगोंकी अभिलाषासे शून्य होकर दुःखपूर्ण गृह-परिजनोंका त्याग करके प्राण धारण करनेके लिये भिक्षा-वृत्तिको ग्रहण करते हैं, वैसी कृष्णकथाका हम त्याग नहीं कर सकतीं॥”7॥ धर्म-अर्थ-काम-लता-त्रिवर्ग-नाशिनी। कृष्णकथा एत बल धरे मोरा जानि॥ कृष्णलीलामृतकण कर्णे पान करि’। रागद्वेषमुक्तधर्मी सर्व परिहरि’॥ भोगहीन पक्षितुल्य भिक्षाजीवि-जन। दुःखमय गृह आर कुटुम्ब-भवन॥ सहसा सकल त्यजि’ सर्वतोभावेते। उचित हइलेओ मोरा असमर्थ ताते॥7॥ [मैं जानती हूँ कि कृष्णकथा धर्म-अर्थ-कामरूपी त्रिवर्गका नाश करनेका बल रखती है। कृष्ण-लीलामृतके कणमात्रका कानोंके द्वारा पान करके धर्मज्ञ व्यक्ति राग-द्वेष आदिसे मुक्त होकर सर्वस्व त्याग देता है। वह व्यक्ति भोगहीन पक्षीकी भाँति भिक्षा-जीवी बनकर दुःखमय गृह एवं परिवारजनों आदि सभीको सहसा सभी प्रकारसे त्याग देता है। ऐसी कृष्णकथाका त्याग करना उचित होनेपर भी मैं वैसा करनेमें असमर्थ हूँ।] “वयमृतमिव जिह्म-व्याहृतं श्रद्दधानाः कुलिक-रुतमिवाज्ञाः कृष्णवध्वो हरिण्यः। ददृशुरसकृदेतत् तन्नखस्पर्शतीव्र- स्मररुज उपमन्त्रिन् भण्यतामन्यवार्त्ता॥” 8॥ “हे दूत, मुग्ध कृष्णसारकी पत्नी हिरनियाँ जिस प्रकार व्याधके गीतमें आसक्त होकर बादमें बाणके प्रहारसे जनित व्यथाको अनुभव करती हैं, उसी प्रकार हमने भी कुटिल श्रीकृष्णके वाक्योंको सत्य मानकर अनेक बार उनके नखस्पर्शजनित तीव्र कामवेदनाको अनुभव किया है, इसलिये तुम किसी और विषयकी चर्चा करो॥”8॥ ओहे दूत, मूढ़पक्षी व्याधेर सङ्गीते। येरूप विश्वास करि’ बाण-विद्ध-चिते॥

क्लेश भोग करे यथा, आमरा तेमन। कृष्णकथा विश्वासिया पायेछि वेदन॥ कृष्णनखस्पर्श पीड़ा सुतीव्र मदन। जारितेछे मोरे, बल अपर वचन॥ 8॥ [ओहे दूत, मूर्ख पक्षी व्याधके सङ्गीतपर विश्वास करके अर्थात् उससे आकर्षित होकर जिस प्रकार हृदयमें उसके बाणसे वेधित होकर कष्ट भोग करता है, उसी प्रकार हम भी कृष्णकी बातोंपर विश्वास करके वेदना अनुभव कर रही हैं। कृष्णके नख-स्पर्श जनित सुतीव्र काम-व्याधि मुझे जला रही है, इसलिये तुम कोई अन्य चर्चा करो।] “प्रियसख पुनरागाः प्रेयसा प्रेषितः किं वरय किमनुरुन्धे माननीयोऽसि मेऽङ्ग। नयसि कथमहास्मान् दुस्त्यजद्वन्द्वपार्श्वं सततमुरसि सौम्य श्रीर्वधूः साकमास्ते॥” 9॥ “भ्रमरके प्रस्थान करके पुनः आनेपर श्रीराधा कहने लगीं, - हे प्रिय कृष्णबन्धो! तुम क्या पुनः प्रियतमके द्वारा प्रेरित करनेपर आये हो? हे दूत, तुम हमारे माननीय हो, इसलिये अपनी इच्छाको प्रकाशित करो। यदि तुम चाहते हो कि हम मधुपुरीमें गमन करें, तो देखो कि लक्ष्मीदेवी सदा जिनकी सहचरीरूपमें उनके वक्षपर विराजमान रहती हैं, वैसे दुस्तज्य युगलभावको प्राप्त पुरुषके निकट हमें किसलिये ले जाना चाहते हो?॥” 9॥ एइ सब कथा शुनि' भ्रमरे फिरिते। देखिया गोपिका कहे विचारिया चिते॥ तुमि-प्रियकृष्ण-सखा, कृष्णेर आज्ञाय। तथा ह'ते आसियाछ एथा पुनराय॥ तुमि तबे पूजनीय मम, दूतवर। प्रार्थना बलह मोरे, - किवा इच्छा धर॥ श्रीकृष्ण युगल-भाव कभु ना छाड़िबे। गोपीकाय तुमि एबे केन वा लइबे? श्रीकृष्णेर वधू लक्ष्मी प्रभुवक्षे रहि'। सतत सेविछे एबे, तव पाशे कहि॥ 9॥ [गोपीकी यह सब बातोंको सुनकर भ्रमर वहाँसे चला गया और पुनः लौट आया। ऐसा देखकर गोपीने मनमें कुछ विचार करके कहा, - हे भ्रमर ! तुम कृष्णके प्रिय सखा हो। तुम कृष्णकी आज्ञासे वहाँसे पुनः यहाँ लौटकर आ गये हो। हे दूतवर! तुम मेरे पूजनीय हो। तुम मुझे अपनी प्रार्थनाके विषयमें बतलाओ, तुम्हारी क्या इच्छा है? श्रीकृष्ण कभी भी युगल-भावका परित्याग नहीं करेंगे। श्रीकृष्णकी वधू लक्ष्मी उनके वक्षःस्थलपर रहकर जब निरन्तर उनकी सेवा कर रही हैं, तब तुम अब गोपियोंको किसलिये अपने साथ ले जाना चाहते हो? - उनसे ऐसा जाकर कहना।] “अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनास्ते स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान्। क्वचिदपि स कथा नः किङ्करीणां गृणीते भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध््न्यधास्यत् कदा नु॥” 10॥ “हे सौम्य, आर्यपुत्र श्रीकृष्ण गुरुकुलसे लौटकर क्या मथुरामें आ गये हैं? वे क्या अब नन्दालय और गोपोंको स्मरण करते हैं? वे क्या कभी हम दासियोंकी चर्चा करते हैं? वे कब पुनः अगुरुके समान सुगन्धित अपनी भुजाओंको हमारे मस्तकपर रखेंगे?॥” 10॥ 'सौम्य' सम्बोधिया बोले गोपी हर्षभरे। गुरुकुल ह'ते एबे मथुरा-नगरे॥ सुखे बसे आर्यपुत्र भूलि' व्रजाङ्गना। पितार आवास-कथा मने कि पड़े ना?? किङ्करी छिलाम मोरा, आमादेर कथा। मुखे आने कभु किवा भुलिया सर्वथा?? क्षेमास्पद मोरे जानि' कब परशिबे? अगुरु-सुगन्धि-कर गोपीशिर दिबे?? 10॥ [(भ्रमरको) 'हे सौम्य !' सम्बोधित करके गोपी प्रसन्नतापूर्वक कहने लगी, - गुरुकुलसे लौटकर अब आर्यपुत्र (कृष्ण) मथुरामें व्रजाङ्गनाओंको भुलाकर क्या सुखपूर्वक रह रहे हैं? क्या उनके मनमें उनके अपने पिता श्रीनन्दके आवासकी बातें स्मरण नहीं आती? हम कृष्णकी दासियाँ थीं, क्या कभी वे हमारी बात अपने मुखपर लाते हैं, अथवा हमें सम्पूर्ण रूपसे भूल गये हैं? मुझे क्षमाका पात्र जानकर वे कब मुझे स्पर्श करेंगे? कब अपने अगुरुके समान सुगन्धित हस्तको गोपीके सिरपर रखेंगे?] ॥ 107 ॥