श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्लेश भोग करे यथा, आमरा तेमन। कृष्णकथा विश्वासिया पायेछि वेदन॥ कृष्णनखस्पर्श पीड़ा सुतीव्र मदन। जारितेछे मोरे, बल अपर वचन॥ 8॥ [ओहे दूत, मूर्ख पक्षी व्याधके सङ्गीतपर विश्वास करके अर्थात् उससे आकर्षित होकर जिस प्रकार हृदयमें उसके बाणसे वेधित होकर कष्ट भोग करता है, उसी प्रकार हम भी कृष्णकी बातोंपर विश्वास करके वेदना अनुभव कर रही हैं। कृष्णके नख-स्पर्श जनित सुतीव्र काम-व्याधि मुझे जला रही है, इसलिये तुम कोई अन्य चर्चा करो।] “प्रियसख पुनरागाः प्रेयसा प्रेषितः किं वरय किमनुरुन्धे माननीयोऽसि मेऽङ्ग। नयसि कथमहास्मान् दुस्त्यजद्वन्द्वपार्श्वं सततमुरसि सौम्य श्रीर्वधूः साकमास्ते॥” 9॥ “भ्रमरके प्रस्थान करके पुनः आनेपर श्रीराधा कहने लगीं, - हे प्रिय कृष्णबन्धो! तुम क्या पुनः प्रियतमके द्वारा प्रेरित करनेपर आये हो? हे दूत, तुम हमारे माननीय हो, इसलिये अपनी इच्छाको प्रकाशित करो। यदि तुम चाहते हो कि हम मधुपुरीमें गमन करें, तो देखो कि लक्ष्मीदेवी सदा जिनकी सहचरीरूपमें उनके वक्षपर विराजमान रहती हैं, वैसे दुस्तज्य युगलभावको प्राप्त पुरुषके निकट हमें किसलिये ले जाना चाहते हो?॥” 9॥ एइ सब कथा शुनि' भ्रमरे फिरिते। देखिया गोपिका कहे विचारिया चिते॥ तुमि-प्रियकृष्ण-सखा, कृष्णेर आज्ञाय। तथा ह'ते आसियाछ एथा पुनराय॥ तुमि तबे पूजनीय मम, दूतवर। प्रार्थना बलह मोरे, - किवा इच्छा धर॥ श्रीकृष्ण युगल-भाव कभु ना छाड़िबे। गोपीकाय तुमि एबे केन वा लइबे? श्रीकृष्णेर वधू लक्ष्मी प्रभुवक्षे रहि'। सतत सेविछे एबे, तव पाशे कहि॥ 9॥ [गोपीकी यह सब बातोंको सुनकर भ्रमर वहाँसे चला गया और पुनः लौट आया। ऐसा देखकर गोपीने मनमें कुछ विचार करके कहा, - हे भ्रमर ! तुम कृष्णके प्रिय सखा हो। तुम कृष्णकी आज्ञासे वहाँसे पुनः यहाँ लौटकर आ गये हो। हे दूतवर! तुम मेरे पूजनीय हो। तुम मुझे अपनी प्रार्थनाके विषयमें बतलाओ, तुम्हारी क्या इच्छा है? श्रीकृष्ण कभी भी युगल-भावका परित्याग नहीं करेंगे। श्रीकृष्णकी वधू लक्ष्मी उनके वक्षःस्थलपर रहकर जब निरन्तर उनकी सेवा कर रही हैं, तब तुम अब गोपियोंको किसलिये अपने साथ ले जाना चाहते हो? - उनसे ऐसा जाकर कहना।] “अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनास्ते स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान्। क्वचिदपि स कथा नः किङ्करीणां गृणीते भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध््न्यधास्यत् कदा नु॥” 10॥ “हे सौम्य, आर्यपुत्र श्रीकृष्ण गुरुकुलसे लौटकर क्या मथुरामें आ गये हैं? वे क्या अब नन्दालय और गोपोंको स्मरण करते हैं? वे क्या कभी हम दासियोंकी चर्चा करते हैं? वे कब पुनः अगुरुके समान सुगन्धित अपनी भुजाओंको हमारे मस्तकपर रखेंगे?॥” 10॥ 'सौम्य' सम्बोधिया बोले गोपी हर्षभरे। गुरुकुल ह'ते एबे मथुरा-नगरे॥ सुखे बसे आर्यपुत्र भूलि' व्रजाङ्गना। पितार आवास-कथा मने कि पड़े ना?? किङ्करी छिलाम मोरा, आमादेर कथा। मुखे आने कभु किवा भुलिया सर्वथा?? क्षेमास्पद मोरे जानि' कब परशिबे? अगुरु-सुगन्धि-कर गोपीशिर दिबे?? 10॥ [(भ्रमरको) 'हे सौम्य !' सम्बोधित करके गोपी प्रसन्नतापूर्वक कहने लगी, - गुरुकुलसे लौटकर अब आर्यपुत्र (कृष्ण) मथुरामें व्रजाङ्गनाओंको भुलाकर क्या सुखपूर्वक रह रहे हैं? क्या उनके मनमें उनके अपने पिता श्रीनन्दके आवासकी बातें स्मरण नहीं आती? हम कृष्णकी दासियाँ थीं, क्या कभी वे हमारी बात अपने मुखपर लाते हैं, अथवा हमें सम्पूर्ण रूपसे भूल गये हैं? मुझे क्षमाका पात्र जानकर वे कब मुझे स्पर्श करेंगे? कब अपने अगुरुके समान सुगन्धित हस्तको गोपीके सिरपर रखेंगे?] ॥ 107 ॥