श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें468 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/107 ] कौवेके आचरणके समान वामनावतारमें बलिराजके द्वारा प्रदत्त समस्त राज्यको ग्रहण करके भी बलिको बाँध दिया था। ऐसे कृष्णके साथ बन्धुत्वसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, किन्तु उनके कथारूपी धनका त्याग करना हमारे लिये अति दुष्कर है॥” 6॥ कृष्ण-पूर्वजन्मकथा यबे उठे मने। ओहे भृङ्ग, भय हय गोपीकार गणे॥ राम-अवतारे यबे व्याधवत् हरि। अविचारे क्रूर हइ’ बालि वध करि’॥ कामपरा शूर्पनखा यबे राम-स्थाने। याय, तबे सीता-बाध्य काटे नाक-काणे॥ बलिराज ह’ते हरि वामनमूर्त्तिते। पूजा-उपहार लभि’ ताहाके वञ्चिते॥ काकवत् बान्धिलेन सेइ गुणधर। तार सह सख्य भाल नय, हे भ्रमर॥ तार कथारूप अर्थ सुदुस्त्यज जानि’। से-कारणे त्याग-कार्ये बलहीन मानि॥6॥ [हे भ्रमर, कृष्णके पूर्व-जन्मोंकी कथाएँ जब भी हृदयमें उदित होती हैं, तब गोपियाँ भयभीत हो जाती हैं। राम-अवतारमें हरिने व्याधकी भाँति बिना कोई विचार किये क्रूरतापूर्वक बालिका वध किया था। काममें आसक्त होकर जब शूर्पनखा रामके पास आयी थी, तब सीताके वशीभूत होनेके कारण रामने उसके नाक और कानोंको काट दिया था। हरिने वामनरूप धारण करके महाराज बलिसे छल करके उससे पूजा और उपहारोंको प्राप्त किया और बादमें कौवेके गुणको धारण करके बलिको बाँध भी दिया। इसलिये हे भ्रमर! उनके (कृष्णके) साथ मित्रता रखना अच्छा नहीं है। किन्तु उनकी कथारूपी धनको छोड़ पाना अति कठिन है, इसलिये मैं उसे त्याग करनेमें स्वयंको असमर्थ पाती हूँ।] ‘यदुनुचरितलीला-कर्णपीयूष-विप्रुट् सकृददन-विधूत-द्वन्द्वधर्मा विनष्टाः। सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सृज्यदीना बहव इह विहङ्गा भिक्षुचर्यां चरन्ति॥” 7॥ “हंसके समान सार-असारको जाननेवाले जो लोग जिनके चरित्र लीलाकथामृतकी कणिकामात्रको कानोंरूपी दोनोंमें भरकर आस्वादन करते हैं, वे रागादि द्वन्द्वसे रहित और भोगोंकी अभिलाषासे शून्य होकर दुःखपूर्ण गृह-परिजनोंका त्याग करके प्राण धारण करनेके लिये भिक्षा-वृत्तिको ग्रहण करते हैं, वैसी कृष्णकथाका हम त्याग नहीं कर सकतीं॥”7॥ धर्म-अर्थ-काम-लता-त्रिवर्ग-नाशिनी। कृष्णकथा एत बल धरे मोरा जानि॥ कृष्णलीलामृतकण कर्णे पान करि’। रागद्वेषमुक्तधर्मी सर्व परिहरि’॥ भोगहीन पक्षितुल्य भिक्षाजीवि-जन। दुःखमय गृह आर कुटुम्ब-भवन॥ सहसा सकल त्यजि’ सर्वतोभावेते। उचित हइलेओ मोरा असमर्थ ताते॥7॥ [मैं जानती हूँ कि कृष्णकथा धर्म-अर्थ-कामरूपी त्रिवर्गका नाश करनेका बल रखती है। कृष्ण-लीलामृतके कणमात्रका कानोंके द्वारा पान करके धर्मज्ञ व्यक्ति राग-द्वेष आदिसे मुक्त होकर सर्वस्व त्याग देता है। वह व्यक्ति भोगहीन पक्षीकी भाँति भिक्षा-जीवी बनकर दुःखमय गृह एवं परिवारजनों आदि सभीको सहसा सभी प्रकारसे त्याग देता है। ऐसी कृष्णकथाका त्याग करना उचित होनेपर भी मैं वैसा करनेमें असमर्थ हूँ।] “वयमृतमिव जिह्म-व्याहृतं श्रद्दधानाः कुलिक-रुतमिवाज्ञाः कृष्णवध्वो हरिण्यः। ददृशुरसकृदेतत् तन्नखस्पर्शतीव्र- स्मररुज उपमन्त्रिन् भण्यतामन्यवार्त्ता॥” 8॥ “हे दूत, मुग्ध कृष्णसारकी पत्नी हिरनियाँ जिस प्रकार व्याधके गीतमें आसक्त होकर बादमें बाणके प्रहारसे जनित व्यथाको अनुभव करती हैं, उसी प्रकार हमने भी कुटिल श्रीकृष्णके वाक्योंको सत्य मानकर अनेक बार उनके नखस्पर्शजनित तीव्र कामवेदनाको अनुभव किया है, इसलिये तुम किसी और विषयकी चर्चा करो॥”8॥ ओहे दूत, मूढ़पक्षी व्याधेर सङ्गीते। येरूप विश्वास करि’ बाण-विद्ध-चिते॥