श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 19/107 उन्नीसवाँ अध्याय 467 स्वर्ग-मरत-तले आछे यत नारी। भ्रमरे देखिया गोपी निज-पादमूले। सबेइ कृष्णेर प्राप्य, ता' बलिते पारि॥ क्षमाइछे अपराध पशि' पदाङ्गुले॥ कपट रुचिर हास्य कृष्णेर भ्रूद्वय। त्यज' शिर पद ह'ते भ्रमर कुशल। विराजित देखि' लक्ष्मी सदाइ सेवय॥ मुकुन्द कि शिखायेछे, मोरे ताहा बल॥ लक्ष्मीदेवी-तुलनाय आमरा-सामान्य। मिष्टवाक्य-प्रार्थनाय आर दौत्य-धर्मे। कपट ह'लेओ कृष्ण सहसा वदान्य॥ चतुरता आछे, भृङ्ग, जानिलाम मर्मे॥ बोलो ताँरे, दीनप्रति अनुग्रह याँर। मुकुन्देर अपराध किवा आछे बल? 'उत्तमःश्लोकाख्य'-शब्दे परिचय ताँर॥4॥ बलिओ ना एड् कथा, तुमि भृङ्ग-खल॥ [हे भ्रमर! कृष्णचन्द्रने गोपीको स्मरण करके पतिपुत्र छाड़ि' आर परलोक-धर्म। और काम-वेदनासे दुःखी और व्याकुल होकर तुम्हें कृष्णसेवा बिना मोर नाहि कोन कर्म॥ मेरी सन्तुष्टिके लिये दूत बनाकर भेजा है-तुम यह असंयत चित्त कृष्ण अनायासे भूलि'। बात मेरे सामने मत बोलना। स्वर्ग, पृथ्वी और पातालमें काय नाइ कथा तार, सन्धान ना तुलि॥5॥ जितनी भी नारियाँ हैं, सभीको कृष्ण प्राप्त कर सकते [भ्रमरको अपने चरणोंपर मँडराते देखकर गोपीने हैं, यह मैं निश्चित रूपसे कह सकती हूँ। कृष्णकी सोचा कि यह मेरे चरणोंकी अँगुलियोंको स्पर्श करके दोनों भौहोंपर कपट-रुचिके हास्यको विराजित देखकर अपने अपराधके लिये क्षमा माँग रहा है, इसलिये ही लक्ष्मी उसकी सदा सेवा करती हैं। लक्ष्मीदेवीकी गोपीने भ्रमरसे कहा,-हे कुशल भ्रमर! अपने सिरको तुलनामें हम तो साधारण स्त्रियाँ हैं, कृष्ण कपटी होनेपर मेरे चरणोंसे हटा लो। तुम मुझे यह बताओ कि भी सहसा वदान्य भी बन जाते हैं। तुम कृष्णसे कहना मुकुन्दने तुम्हें क्या सिखाकर भेजा है। मैंने तुम्हारा मर्म कि दीनोंके प्रति जो कृपा करता है, वही 'उत्तम-श्लोक'के जान लिया है कि तुममें मधुर वचनोंके द्वारा प्रार्थना रूपमें जाना जाता है।] करने और दूतका धर्म निभानेकी चतुरता है। किन्तु “विसृज शिरसि पादं वेद्म्यहं चाटुकारै- हे दुष्ट भ्रमर! मुझसे ऐसी बात मत कहना कि रनुनयविदुषस्तेऽभ्येत्य दौत्यैर्मुकुन्दात्। 'बताओ मुकुन्दका अपराध क्या है?' कृष्णसेवाके स्वकृत इह विसृष्टापत्यपत्यन्यलोका अतिरिक्त मेरा अन्य कोई कार्य ही नहीं था, उसके व्यसृजदकृतचेताः किं नु सन्धेयमस्मिन्॥”5॥ लिये मैंने पति-पुत्र और परलोक-धर्म तकका परित्याग “तदनन्तर भ्रमर उनके चरणकमलोंको स्पर्श करके कर दिया था। किन्तु असंयत-चित्त कृष्ण इस बातको क्षमा प्रार्थना कर रहा है, ऐसा मनमें विचार करके गोपी अनायास ही भूल गये। इसलिये ऐसे व्यक्तिकी बातोंसे कहने लगीं,-हे भ्रमर! तुम मेरे चरणोंसे अपने मुझे क्या काम? उनके साथ सन्धि कैसे सम्भवपर मस्तकको हटा लो, (तथापि वह भ्रमर उनके चरणोंको है?] नहीं छोड़ रहा है, ऐसा मानकर कहने लगीं) तुम “मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा श्रीकृष्णसे शिक्षा प्राप्त करके दूतोचित प्रिय वाक्यके स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्। द्वारा अनुनय-विषयमें पण्डित हो गये हो, तुम्हारे बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद् ध्वाङ्क्षवद् य- विषयमें मैं सब कुछ जानती हूँ। हमने उनके लिये स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः॥6॥” अपने पति, पुत्र, परलोक सभीका परित्याग किया था, “इस नृशंस-प्रकृतिके श्रीकृष्णने रामावतारमें व्याधके ऐसी परिस्थितिमें वे असंयतचित्त पुरुष हमारा परित्याग समान वानरराज बालिका वध किया था और स्त्रीके करके चले गये, इस प्रकारके व्यक्तिके साथ कैसे वशीभूत होकर कामसे पीड़ित होकर आयी शूर्पनखाके हमारी सन्धि हो सकती है?॥”5॥ नाक और कान काट दिये थे। पूजोपहारको खाकर