भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2483

466 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/107 ] [(भ्रमर यदि पूछे—) 'गोपियोंके प्रति कृष्णने ऐसा [गोपीकी सन्तुष्टिके लिये भ्रमर कृष्णका गुणगान क्या अपराध किया है जिसके कारण गोपियोंके चित्तमें करने लगा। ऐसा जानकर और उसकी सुमधुर तानको यह अप्रसन्नता है?' तो हे भ्रमर, उसका कारण सुनो, सुनकर गोपीने उससे कहा,—'हे भ्रमर, सुनो! कृष्ण कृष्णचन्द्र अपनी मोहिनी अधरसुधाका पान करवाकर अब गोकुलवासी नहीं हैं, (किन्तु) हम उन यदुपतिसे गोपियोंके मनको हरण करके शीघ्र ही उन्हें त्यागकर चिर-परिचित हैं। हमने उनकी कथाएँ बहुत बार सुनी चले गये। जिस प्रकार तुम्हारे जैसा अज्ञानी व्यक्ति एक हैं। हम उन्हें भली-भाँति जान गयी हैं, इसलिये अब सुन्दर मकरन्दसे पूर्ण कुसुमके मधुका पानकर उसका उनका गुणगान और नहीं सुनेंगी। कृष्णकी जो अब त्यागकर अन्य मनवाला होकर चला जाता है, कृष्णने निजप्रिय सखियाँ हैं, तुम उनके पास जाकर ही भी हमारे साथ वैसा ही किया। (भ्रमर यदि कहे—) कृष्णका गुणगान करो। कृष्णके आलिङ्गनके द्वारा जिन 'अचतुरा लक्ष्मी किसलिये कृष्णके चरणकमलोंका त्याग कृष्णप्रेमवती रमणियोंको सुमतिकी प्राप्ति हुई है और नहीं करती और प्रीतिपूर्वक उनकी सेवा करती हैं?' उसके द्वारा उनकी वक्ष-रोगकी पीड़ा शान्त हो गयी है, तो इसका कारण यह है कि लक्ष्मीने कृष्णके मिथ्या उन (कृष्णरूपी धनसे) धनी कृष्णकी सर्वाधिक प्रियाओंके वचनोंपर विश्वास कर लिया है, किन्तु हम गोपियाँ सामने कृष्णका गुणगान करो जिसे सुनकर वे तुम्हें कदापि लक्ष्मीकी भाँति अचतुर (सरल) नहीं हैं।] सम्मान प्रदान करेंगी।] “किमिह बहु षडङ्घ्रे गायसि त्वं यदूना- “दिवि भुवि च रसायां काः स्त्रियस्तदुरापाः मधिपतिमगृहाणामग्रतो नः पुराणम्। कपटरुचिर-हास-भ्रूविजृम्भस्य याः स्युः। विजयसख-सखीनां गीयतां तत्प्रसङ्गः चरण-रज उपास्ते यस्य भूतिर्वयं का क्षपितकुचरुजस्ते कल्पयन्तीष्टमिष्टाः ॥” 3 ॥ अपि च कृपण-पक्षे ह्युत्तमःश्लोकशब्दः ॥” 4 ॥ “हे भ्रमर, तुम हम व्रजवासिनियोंके सामने किसलिये “(हे कृष्णप्रेयसी शिरोमणे! आप इस प्रकार मत कृष्णकी पुरानी बातोंका बार-बार गान कर रहे हो? बोलिये। आपको स्मरण करके श्रीकृष्णकी काम विडम्बना श्रीकृष्णकी नवीन सखियोंके पास जाकर कृष्ण-प्रसङ्गका उपस्थित होते ही उन्होंने तुम्हारी प्रसन्नता उत्पादन गान करो। श्रीकृष्णके आलिङ्गनके द्वारा जिनकी करनेके लिये मुझे आदेश किया है, इस प्रकार भ्रमर स्तन-पीड़ाकी शान्ति हुई है, वैसी कृष्णप्रिया कामिनियाँ कह रहा है, ऐसी कल्पना करके श्रीराधा कहने तुम्हारे अभीष्टको पूर्ण करेंगी॥” 3 ॥ लगीं)—स्वर्ग, मर्त्य और रसातलमें वास करनेवाली कामनियोंमें-से उनके लिये कौन दुर्लभ है? स्वयं गोपीतुष्टि-हेतु भृङ्ग करे कृष्णगान। लक्ष्मीदेवी कपट-मनोहर हास्यके साथ भृकुटिका सञ्चालन एइ बुझि’ कहे गोपी शुनिया सुतान॥ करनेवाले श्रीकृष्णकी चरणधूलिकी सेवा करती हैं, ऐसी शुन हे भ्रमर, कृष्ण-भवनरहित। परिस्थितिमें हम किस प्रकारसे उनके योग्य हो सकती यदुपति आमादेर चिरपरिचित॥ हैं? कृपण लोग ही अनुकम्पाशील वैसे पुरुषको शुन्याछि तार कथा मोरा बहुबार। उत्तमःश्लोक कहकर उनका गुणगान कर सकते हैं, मेरे ताँरे जानियाछि, गान शुनिब ना आर॥ समान गोपियाँ वैसा नहीं कर सकतीं॥” 4 ॥ कृष्ण-निजप्रिय जन याँहारा एखन। ताँदेर निकटे गिया करह गायन॥ हे मधुप, कृष्णचन्द्र गोपीके स्मरिया। कृष्ण-आलिङ्गन याँरा लभेछे सुमति। अनङ्ग-वेदनाखिन्न व्याकुल हइया॥ वक्षोरोग ह’ते मुक्त कृष्णप्रेमवती॥ पाठायेछे दूतरूपे मम तुष्टि तरे। सेइ धनी प्रियवरा तब कृष्णगान। बलिओ ना एइ कथा आमार गोचरे॥ शुनिया आदर करि’ दिबे तब मान॥ 3 ॥