भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2482, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2482

[ 19/107 ] उन्तीसवाँ अध्याय 465 अनुभाष्य—(क) 'श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते',— भाः 10/47/12-21 श्लोक देखें ; जैसे— “मधुप कितव-बन्धो मा स्पृशाङ्घ्रिं सपत्नयाः कुच-विलुलितमाला-कुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः। वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं यदु सदसि विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक्॥” 1 ॥ श्रीराधाने कहा,—“हे धूर्त्तबन्धु, भ्रमर, तुम मेरे चरणोंको स्पर्श मत करना। मेरी सौतनोंके वक्षसे श्रीकृष्णकी वनमाला मर्दित हुई है, तुम्हारी मूँछोंमें उसके चिह्न दिखायी दे रहे हैं। मधुपति उन सब मानिनियोंके सन्तोषका विधान करें। तुमने जिसके दूत होकर भी इस प्रकार सुरत-चिह्नको धारण कर रखा है, उन श्रीकृष्णका इस प्रकारका आचरण निश्चय ही यादवोंकी सभामें उपहासका विषय होगा॥1॥” उद्धवेर आगमने व्रजे व्रजबाला। कृष्णकथा गाहि' काँदि' त्यजे अश्रुमाला॥ सेइकाले गोपी एक भृङ्गे लक्ष्य करि'। उद्धवेरे 'दूत'ज्ञाने बले प्रिय स्मरि'॥ गोपी कहे,—हे भ्रमर, तुमि धूर्त्तमित्र। पदस्पर्श-कार्य तव बड़इ विचित्र॥ तव नमस्कारे कभु ना हब प्रसन्न। तव श्मश्रुप्रान्ते देखि कुङ्कुमेर चिह्न॥ पत्नीर वक्षोद्वये कृष्ण-वनमाला। मर्दित-कुङ्कुम देखि' हय मम ज्वाला॥ मानिनीर प्रसन्नता-संग्रहे माधव। व्यस्त आछे सेइ कार्ये माथुर-बान्धव॥ व्रजजने यार कभु नाइ प्रयोजन। गोपीतुष्टि-तरे ताँर नाहिक कारण॥ तुमि-यदुपति-दूत, तोमार कि काय? तोमा' तरे सभामध्ये कृष्ण पाबे लाज॥1॥ [उद्धवके व्रजमें आनेपर व्रजकी बालाओंने कृष्णकी बातोंको कह-कहकर क्रन्दन करते हुए अश्रुओंकी माला प्रवाहित की थी। उस समय एक गोपी एक भ्रमरको देखकर और उद्धवको कृष्णका 'दूत' जानकर प्रिय कृष्णका स्मरण करते हुए कहने लगी,—हे भ्रमर, तुम धूर्त्त व्यक्तिके मित्र हो। तुम्हारे द्वारा मेरे चरण-स्पर्श करना बहुत विचित्र है। मैं तुम्हारे नमस्कारसे कभी भी प्रसन्न नहीं होऊँगी। मैं तुम्हारी मूँछोंपर कुङ्कुमका चिह्न देख रही हूँ। सपत्नियोंके दोनों वक्षोंके द्वारा कृष्णकी मर्दित वनमालापर लगे कुङ्कुमको देखकर मुझे जलन होती है। माथुर रमणियोंके बन्धु माधव उन मानिनी प्रियाओंको प्रसन्न करनेमें बहुत व्यस्त हैं। व्रजजनोंकी जिन्हें कोई आवश्यकता नहीं है, उनके द्वारा गोपियोंको सन्तुष्ट करनेका भी कोई कारण नहीं है। तुम यदुपतिके दूत हो, तुम्हारा यहाँ क्या कार्य है? तुम्हारे कारण कृष्णको सभामें लज्जित होना पड़ेगा।] “सकृदधर-सुधां स्वां मोहिनीं पाययित्वा सुमनस इव सद्यस्तत्यजेऽस्मान् भवादृक्। परिचरति कथं तत्पादपद्मं नु पद्मा ह्यपि बत हतचेता ह्युत्तमःश्लोकजल्पैः॥” 2॥ “तुम जिस प्रकार एक पुष्पका त्याग करके दूसरे पुष्पपर चले जाते हो, उसी प्रकार श्रीकृष्णने भी हमें एकबार मात्र लालसा वर्धनकारी अपने अधरामृतका पान करवाकर उसी समय हमारा परित्याग किया है। [हे भ्रमर यदि तुम कहो]—'लक्ष्मीदेवी किस कारणसे ऐसे व्यक्तिके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं?' तो मेरा मानना है कि निश्चय ही श्रीकृष्णके मिथ्या वचनोंसे उनका चित्त आकृष्ट हुआ है, परन्तु हम लक्ष्मीके जैसी अविवेकी नहीं हैं॥”2॥ गोपीस्थाने करे कृष्ण किवा अपराध? याहा लागि गोपीचित्ते हय एइ बाध?? हेतु शुन,—कृष्णचन्द्र स्वकीय मोहिनी। अधरेर सुधा पान कराइया यिनि॥ सद्य त्याग करि' हरि' गोपीकार मन। येरूप तोमार मत अर्वाचीन जन॥ सुकुसुम त्याग करि' याय अन्य-मने। तद्रूप कृष्णेर कार्य आमादेर सने॥ अचतुरा पद्मा कृष्णपादपद्म केन। त्याग नाहि करि' एबे यतने सेवेन?? कृष्ण-मिथ्यावाक्ये पद्मा करेछे प्रत्यय। पद्मासम अविदग्धा गोपी कभु नय॥2॥

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 2482, कुल 2549 में से · BharatKosha