श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें464 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/101-107 ] महाप्रभुके द्वारा मातृभक्तिका प्रदर्शन, श्रीकृष्णविरहमें उद्घूर्णा-चित्रजल्प वर्णित :- मातृभक्ति, प्रलापन, भित्त्ये मुख-घर्षण, कृष्णगन्ध-स्फूर्त्ये दिव्यनृत्य। एइ चारिलीला-भेदे, गाइल एइ परिच्छेदे, कृष्णदास रूपगोसाञि-भृत्य ॥ 101 ॥ अनुवाद-श्रीरूपगोस्वामीके दास कृष्णदासने इस अध्यायमें महाप्रभुकी मातृभक्ति, उनके द्वारा किया गया प्रलाप, उनके द्वारा दीवारमें अपने मुखको घिसना और श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके स्फुरित होनेपर दिव्य नृत्य-इन चार लीलाओंका गान किया गया है॥ 101 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृष्णदास रूपगोसाञि-भृत्य',-इस पद्यको पाठ करके अनेक व्यक्तियोंके मनमें यह विचार आता है कि श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी श्रीरूपगोस्वामीके मन्त्र-शिष्य हैं। किन्तु अन्यान्य स्थानोंपर पढ़नेसे ऐसा सिद्धान्त स्थिर करना दुष्कर है। इस स्थानपर श्रीरूपके द्वारा रचित भक्तिरसामृतसिन्धुकी शिक्षाका आश्रय करके श्रील कविराज-प्रभु रसका विस्तार कर रहे हैं, इसलिये वे श्रीरूपका केवलमात्र नाम उल्लेख कर सकते हैं; अथवा गोस्वामियोंके दास कृष्णदासरूप इस लेखकने इस पद्यकी रचना की है,-यह अर्थ भी हो सकता है॥ 101 ॥ उन्नीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। एइमत महाप्रभु पाञा चेतन। स्नान करि' कैल जगन्नाथ-दरशन ॥ 102 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुको बाह्य चेतना आयी। तब उन्होंने स्नान किया और भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये गये॥ 102 ॥ अप्राकृत अधोक्षज श्रीकृष्ण और कार्ष्णलीला-अक्षजज्ञानी जड़विद्या-मत्त पण्डिताभिमानी तर्कपन्थीके लिये अगम्य :- अलौकिक कृष्णलीला, दिव्य शक्ति तार। तर्केर गोचर नहे चरित्र याहार ॥ 103 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकी लीला अलौकिक है, उसकी शक्ति दिव्य है, उसके क्रिया-कलाप तर्कके गोचर नहीं हैं॥ 103 ॥ एइ प्रेम सदा जागे याहार अन्तरे। पण्डितेह तार चेष्टा बुझिते ना पारे ॥ 104 ॥ अनुवाद-यह प्रेम जिनके हृदयमें सदा जाग्रत रहता है, उनकी चेष्टाओंको परम विद्वान व्यक्ति भी समझ नहीं पाता॥ 104 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/17)- धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि। अन्तर्वाणीभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा ॥ 105 ॥ अनुवाद-जिस धन्य व्यक्तिके चित्तमें नवप्रेम उदित होता है, उसकी समस्त क्रियाएँ और भावभङ्गिमा अर्थात् समस्त लक्षण शास्त्रोंको जाननेवाले पुरुष भी नहीं समझ सकते॥ 105 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 23/36 संख्या देखें ॥ 105 ॥ अप्राकृत श्रद्धाके साथ महाप्रभुकी अधोक्षज-लीलामें विश्वास संस्थापित करनेका अनुरोध :- अलौकिक प्रभुर 'चेष्टा', 'प्रलाप' शुनिया। तर्क ना करिह, शुन, विश्वास करिया ॥ 106 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी अलौकिक 'चेष्टाएँ' और 'प्रलाप'को सुनकर किसी प्रकारका कोई तर्क मत करना, अपितु उसे विश्वासपूर्वक सुनो॥ 106 ॥ भ्रमरगीतामें श्रीराधाके प्रलाप और महिषियोंके गीतमें दस प्रकारकी चित्रजल्पकी उक्ति :- इहार सत्यत्वे प्रमाण श्रीभागवते। श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते ॥ 107 ॥ अनुवाद-इसकी सत्यताका प्रमाण श्रीमद्भागवतमें मिलता है। 'भ्रमर-गीता'में श्रीराधाके प्रलापका वर्णन है॥ 107 ॥