श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2480, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/96-100 उन्नीसवाँ अध्याय 463 गोपियोंके चित्तको उन्मादित करनेवाली श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्ध :- हरे नारीर तनु-मन, नासा करे घूर्णन, खसाय नीवि, छुटाय केशबन्ध। करिया आगे बाउरी, नाचाय जगत्-नारी, हेन डाकातिया कृष्णाङ्गगन्ध ॥ 96 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी देहकी सुगन्ध नारियोंके तन और मनका हरण कर लेती है। वह उनकी नाकको भ्रमित कर देती है, उनके नाड़ेके बन्धनको ढीला कर देती है और उनके केशोंके बन्धनको खुलवा देती है। वह सुगन्ध जगत्की नारियोंको उन्मत्त बनाकर उन्हें नचाती है। वह सुगन्ध ऐसी डकैत है ॥ 96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'बाउरी', —उन्मत्त ॥ 96 ॥ श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके आस्वादनके लिये आर्त गोपियोंका चित्त :- सेइ गन्धवश नासा, सदा करे गन्धेर आशा, कभु पाय, कभु नाहि पाय। पाइले पिया पेट भरे, पिङ पिङ तबु करे, ना पाइले तृष्णाय मरि' याय ॥ 97 ॥ अनुवाद—उस सुगन्धके वशीभूत होकर नाक सदा उसी सुगन्धकी आशा करती है, किन्तु कभी तो उसे वह सुगन्ध प्राप्त होती है और कभी नहीं। उस सुगन्धको प्राप्त करनेपर नाक पेट भरकर उसे पी लेती है, तथापि और पीनेकी अभिलाषा करती है। किन्तु सुगन्धके नहीं मिलनेपर नाक प्याससे मृतप्रायः हो जाती है ॥ 97 ॥ चित्रजल्प-उक्ति :- मदनमोहन-नाट, पसारि चाँदेर हाट, जगन्नारी-ग्राहके लोभाय। बिना-मूल्ये देय गन्ध, गन्ध दिया करे अन्ध, घर याइते पथ नाहि पाय ॥ "98 ॥ अनुवाद—मदनमोहन-नाटकिया सुगन्धके हाटको लगाकर जगत्की नारियोंको आकर्षित करके अपना ग्राहक बनाता है। वह बिना किसी मूल्यके ही सुगन्धका वितरण करता है और वह सुगन्ध नारियोंको ऐसा अन्धा बना देती है कि वे अपने घर जानेका मार्ग तक भी नहीं देख पातीं ॥ "98 ॥ अनुभाष्य— 'जगन्नारी-ग्राहके लोभाय', —जगत्में व्रजनारी गोपियोंको ग्राहकके रूपमें प्रलोभित करता है ॥ 98 ॥ महाप्रभुकी उन्माद अवस्था :- एइमत गौरहरि, गन्धे कैल मन चुरि, भृङ्गप्राय इति-उति धाय। याय वृक्षलता-पाशे, कृष्ण स्फुरे सेइ आशे, कृष्ण ना पाय, गन्धमात्र पाय ॥ 99 ॥ अनुवाद—इसी प्रकार श्रीगौरहरिके मनको भी श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धने चुरा लिया, इसलिये वे भ्रमरकी भाँति इधर-उधर दौड़ रहे थे। श्रीगौरहरि श्रीकृष्णकी स्फूर्तिकी आशासे वृक्ष-लताओंके निकट जा रहे थे, किन्तु उन्हें श्रीकृष्ण तो नहीं मिल रहे थे, केवलमात्र उनके अङ्गोंकी सुगन्ध प्राप्त हो रही थी ॥ 99 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीरायकी चेष्टासे महाप्रभुका बाह्यदशामें आगमन :- स्वरूप-रामानन्द गाय, प्रभु नाचे, सुख पाय, एइमते प्रातःकाल हैल। स्वरूप-रामानन्दराय, करि नाना उपाय, महाप्रभुर बाह्यस्फूर्त्ति कैल ॥ 100 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द राय गान कर रहे थे, महाप्रभु नृत्य कर रहे थे और उस आनन्दमें डूब रहे थे। इस प्रकार होते-होते प्रातःकाल हो गया। श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायने अनेक उपाय करके महाप्रभुको बाह्य जगत्की स्फूर्त्ति करवायी ॥ 100 ॥