भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2479

462 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/91-95 ] अमृतप्रवाह भाष्य—जो मृगमदको भी विजय करनेवाली अपनी देहकी गन्धकी तरङ्गोंके द्वारा स्त्रियोंके चित्तको आकर्षित करते हैं, जो अपने आठ अङ्गोंमें [मुख, नाभि, दो-दो नेत्र, हस्त और चरण] आठ कमलोंसे युक्त हैं और कर्पूरयुक्त कमलकी गन्धका प्रचार (विस्तार) करते हैं एवं जो कस्तूरी-कर्पूर-चन्दन-अगुरूकी सुगन्धके द्वारा सुवासित हैं, हे सखि, वे मदनमोहन मेरी नाककी स्पृहाका वर्धन कर रहे हैं॥91॥ अनुभाष्य— हे सखि, कुरङ्गमदजिद्वपुःपरिमलोर्मिकृष्टाङ्गनः (मृगमद- कस्तूरिकाविजयिवपुषः अङ्गस्य सुगन्धप्रवाहेण कृष्टा आकृष्टा अङ्गना व्रजाङ्गना येन सः) स्वकाङ्गनलिनाष्टके (स्वकानां अङ्गनलिनानां निजाङ्गपद्मनाम् अष्टके मुखनाभिनेत्रद्वयकरद्वयपद युगकमलाष्टके) शशियुताब्जगन्धप्रथः (कर्पूरयुतस्य पद्मगन्धस्य प्रथा विस्तारो यस्मिन् सः) मदेन्दुवरचन्दनागुरुसुगन्धचर्चर्चितः (कस्तूरीकर्पूरशुभ्रचन्दनानां सुगन्धचर्चाभिः अर्चितः विलेपितः सः) मदनमोहनः मे (मम) नासास्पृहां तनोति (वर्धयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥91॥ श्लोकार्थ; श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके माधुर्यबलका वर्णन :- यथा राग— “कस्तुरिका-नीलोत्पल, तार येइ परिमल, ताहा जिनि' कृष्ण-अङ्ग-गन्ध। व्यापे चौद्द-भुवने, करे सर्व आकर्षणे, नारीगणेर आँखि करे अन्ध॥92॥ अनुवाद—“कस्तूरी और नीलकमलकी जो सुगन्ध होती है, श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध उसे भी पराभूत करती है। श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध चौदह भुवनोंमें व्याप्त होकर सभीको अपनी ओर आकर्षित करती है और स्त्रियोंके नेत्रोंको तो अन्धा बना देती है॥92॥ गोपियोंको वशमें करनेवाली श्रीकृष्णकी अङ्ग-गन्ध :— सखि हे, कृष्णगन्ध जगत् माताय। नारीर नासाते पशे, सर्वकाल ताँहा बसे, कृष्णपाश धरि' लञा याय॥93॥ध्रु॥ अनुवाद—हे सखि, श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध समस्त जगत्को मतवाला बना देती है। वह सुगन्ध स्त्रियोंके नाकमें प्रवेश करके सदाके लिये वहीं वास करती है और उन्हें पकड़कर श्रीकृष्णके निकट ले जाती है॥93॥ कमल-सदृश श्रीकृष्णाइङ्गोंकी गन्धके माधुर्यका वर्णन :- नेत्र, नाभि, वदन, कर-युग-चरण, एइ अष्टपद्म कृष्ण-अङ्गे। कर्पूरलिप्त कमल, तार यैछे परिमल, सेइ गन्ध अष्टपद्म-सङ्गे॥94॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी देहमें दो नेत्र, एक नाभि, एक मुख, दो हाथ और दो चरण—कुल मिलाकर आठ कमल हैं। कर्पूरसे लिप्त कमलकी जैसी सुगन्ध होती है, वैसी सुगन्ध श्रीकृष्णकी देहमें विद्यमान आठ कमलोंमें है॥94॥ अनुभाष्य—दो चक्षु, नाभि, मुख, दो हाथ, दो चरण,—ये आठ अङ्ग॥94॥ हेम-कीलित चन्दन, ताहा करे घर्षण, ताहे अगुरु, कुङ्कुम, कस्तुरी। कर्पूर-सने चर्चा अङ्गे, पूर्वअङ्गेर गन्ध सङ्गे, मिलि' तारे येन कैल चुरि॥95॥ अनुवाद—स्वर्ण-जड़ित चन्दनको घिसकर और उसमें अगुरु, कुङ्कुम, कस्तूरी और कर्पूरको मिलाकर श्रीकृष्णके अङ्गोंपर किया लेपन श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धके साथ मिलनेपर ऐसा प्रतीत होता है मानो लेपकी सुगन्धने श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धको आच्छादित कर दिया है॥95॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'हेम-कीलित',—स्वर्णसे जड़ित; 'चुरि',—गोपन, (आच्छादन)॥95॥ अनुभाष्य—'चर्चा',—लेपन; पाठान्तरमें, 'मिलि डाका येन कैल चुरि' और 'कामदेवेर मन कैल चुरि'॥95॥