श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 19/81–91 उन्नीसवाँ अध्याय 461
वहन करके प्रवाहित हो रहा था और वह गुरु बनकर वृक्ष-लताओंको नृत्यकी शिक्षा प्रदान कर रहा था॥81॥ अनुभाष्य—मलय पवन स्वयं पुष्पोंकी गन्धको वहन करके पुनः नटन-गुरुके (नृत्य-शिक्षकके) रूपमें वृक्ष-लताओंको नृत्यकी शिक्षा प्रदान कर रहा था॥81॥ पूर्णचन्द्र-चन्द्रिकाय परम उज्ज्वल। तरुलतादि ज्योत्स्नाय करे झलमल॥82॥ अनुवाद—पूर्णचन्द्रकी परम-उज्ज्वल चन्द्रिकामें वृक्ष-लताएँ उस ज्योत्स्नासे झलमल कर रहे थे॥82॥ छय ऋतुगण याँहा वसन्त प्रधान। देखि' आनन्दित हैला गौर भगवान्॥83॥ अनुवाद—जगन्नाथ-वल्लभ उद्यानमें छह ऋतुओंके विद्यमान होनेपर भी वसन्त ऋतु ही प्रधान रूपमें थी। उस उद्यानको देखकर भगवान् श्रीगौरसुन्दर अत्यन्त आनन्दित हुए॥83॥ “ललित लवङ्गलता” पद गाओयाञा। नृत्य करि' बुलेन प्रभु निजगण लञा॥84॥ अनुवाद—महाप्रभु 'ललित लवङ्गलता' पदका गान करवाकर नृत्य करते हुए अपने परिकरों सहित जगन्नाथ-वल्लभ उद्यानमें भ्रमण करने लगे॥84॥ प्रतिवृक्षवल्ली ऐछे भ्रमिते भ्रमिते। अशोकेर तले कृष्णे देखेन आचम्बिते॥85॥ अनुवाद—इस प्रकार प्रत्येक वृक्ष और लताके निकट भ्रमण करते-करते महाप्रभुने अचानक एक अशोक वृक्षके नीचे श्रीकृष्णको देखा॥85॥ कृष्ण देखि' महाप्रभु धाञा चलिला। आगे देखि' हासि' कृष्ण अन्तर्धान हइला॥86॥ अनुवाद—श्रीकृष्णको देखकर महाप्रभु दौड़कर उस ओर चल दिये और श्रीकृष्ण महाप्रभुको आगे आते देखकर हँसते हुए अन्तर्धान हो गये॥86॥ आगे पाइला कृष्णे, ताँरे पुनः हाराञा। भूमेते पड़िला प्रभु मूर्च्छित हञा॥87॥ अनुवाद—पहले तो श्रीकृष्णको पाकर और बादमें उन्हें पुनः गँवानेके कारण महाप्रभु मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े॥87॥ कृष्णेर अङ्गगन्धे भरिछे उद्याने। सेइ गन्ध पाञा प्रभु हैला अचेतने॥88॥ अनुवाद—जगन्नाथ-वल्लभ उद्यान श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धसे भर गया था, उस सुगन्धको पाकर ही महाप्रभु अचेतन हो गये॥88॥ निरन्तर नासाय पशे कृष्ण-परिमल। गन्ध आस्वादिते प्रभु हइला पागल॥89॥ अनुवाद—महाप्रभुके नाकमें निरन्तर श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध प्रविष्ट हो रही थी, जिसका आस्वादन करके महाप्रभु पागल हो उठे॥89॥ महाप्रभुका चित्रजल्प :- कृष्णगन्ध-लुब्धा राधा सखीरे ये कहिला। सेइ श्लोक पड़ि' प्रभु अर्थ करिला॥90॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धसे लुब्ध श्रीराधाने अपनी सखीसे जो कहा था, महाप्रभुने उसी श्लोकका उच्चारण करके उसका अर्थ बतलाया॥90॥ श्रीकृष्णगन्धसे आकृष्ट श्रीराधाकी उक्ति :- गोविन्दलीलामृत (8/6)में विशाखाके प्रति श्रीराधिकाके वचन— कुरङ्गमदजिद्वपुः परिमलोर्मिकृष्टाङ्गनः स्वकाङ्गनलिनाष्टके शशियुताब्जगन्धप्रथः। मदेन्दुवरचन्दनागुरुसुगन्धिवर्चार्चितः स मे मदनमोहनः सखि तनोति नासास्पृहाम्॥91॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥91॥