भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2477

460 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला [19/74-81 ] उनकी उपस्थितिके कारण महाप्रभुके उन्मादका विराम (शान्त होना) :- ताँर भये नारेन प्रभु बाहिरे याइते। ताँर भये नारेन भित्त्ये मुखाब्ज घषिते ॥ 74 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीशङ्कर पण्डितके भयसे गम्भीरासे बाहर नहीं जा पाते थे और उनके भयसे गम्भीराकी दीवारोंसे अपने मुखकमलको भी नहीं घिस पाते थे॥ 74 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा स्वरचित ग्रन्थमें महाप्रभुकी उन्माद दशाका वर्णन :- एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथ दास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश ॥ 75 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी इस लीलाको श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित श्रीचैतन्यस्तवकल्पवृक्षमें प्रकाशित किया है ॥ 75 ॥ श्रीकृष्णके विरहमें प्रलापोन्मादमय महाप्रभु :- स्तावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका छठा श्लोक- स्वकीयस्य प्राणार्बुदसदृश-गोष्ठस्य विरहात् प्रलापानुन्मादात् सततमतिकुर्वन् विकलधीः। दधद्भित्तौ शश्वद्वदनविधुघर्षेण रुधिरं क्षतोत्थं गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ 76 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अपने असंख्य प्राणोंके समान व्रजके विरहमें प्रलापरूपी उन्मादके उत्पन्न होनेपर सर्वदा उस चेष्टाके अधिक वृद्धि प्राप्त करनेपर व्यग्र-बुद्धि गौरचन्द्र प्रतिदिन अपने मुखचन्द्रको दीवारमें घिसकर चोटसे निकले रक्तको धारण करते। ऐसे गौराङ्गदेव मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मादित कर रहे हैं ॥ 76 ॥ अनुभाष्य- स्वकीयस्य (आत्मनः) प्राणार्बुदसदृश-गोष्ठस्य (प्राणार्बुदसदृशस्य असंख्यप्राणतुल्यस्य गोष्ठस्य व्रजस्य) विरहात् (उन्मादात् दिव्योन्मादात् हेतोः) सततं (निरन्तरम्) अतिप्रलापान् कुर्वन् विकलधीः (व्यग्रमतिः सन्) भित्तौ शश्वत् (निरन्तरं) वदनविधुघर्षेण (मुखचन्द्रसङ्घर्षणेन) क्षतोत्थं रुधिरं दधत् (धारयन्) गौराङ्गः हृदये उदयन् मां मदयति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ विप्रलम्भ-प्रेमरसास्वादक महाप्रभु :- एइमत महाप्रभु रात्रि-दिवसे। प्रेमसिन्धु-मग्न रहे, कभु डुबे, भासे ॥ 77 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु रात-दिन प्रेमके सिन्धुमें निमग्न रहते थे। कभी तो वे उसमें डूब जाते और कभी उसकी तरङ्गोंपर तैरने लगते ॥ 77 ॥ एकदिन जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें महाप्रभुके महाभावके आवेशमें दस प्रकारके चित्रजल्पका वर्णन :- एककाले वैशाखेर पौर्णमासी-दिने। रात्रिकाले महाप्रभु चलिला उद्याने ॥ 78 ॥ अनुवाद-एक समय वैशाखकी पूर्णिमाके दिन, रात्रिकालमें महाप्रभु उद्यानकी ओर चल दिये ॥ 78 ॥ 'जगन्नाथवल्लभ' नाम उद्यान-प्रधाने। प्रवेश करिला प्रभु लञा भक्तगणे ॥ 79 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर 'जगन्नाथवल्लभ' नामक प्रधान उद्यानमें प्रवेश कर गये ॥ 79 ॥ प्रफुल्लित वृक्षवल्ली-येन वृन्दावन। शुक, शारी, पिक, भृङ्ग करे आलापन ॥ 80 ॥ अनुवाद-उस उद्यानमें वृक्ष-लताएँ ऐसे प्रफुल्लित हो रही थी, मानो वह वृन्दावन हो। वहाँपर तोता, मैना, मयूर और भ्रमर आदि परस्पर आलाप कर रहे थे ॥ 80 ॥ पुष्पगन्ध लञा बहे मलय-पवन। 'गुरु' हञा तरुलताय शिखाय नाचन ॥ 81 ॥ अनुवाद-मलय-पवन उद्यानके पुष्पोंकी सुगन्धको