भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2476, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2476

[ 19/69-73 उन्तीसवाँ अध्याय 459 द्वापरयुगके श्रीविदुरकी भाँति श्रीशङ्करके द्वारा भगवान्‌की सेवा :- 'प्रभु-पादोपाधान' बलि' ताँर नाम हइल। पूर्वे विदूरे येन श्रीशुक वर्णिल ॥ 69 ॥ अनुवाद—इस कारण श्रीशङ्कर पण्डितका नाम 'महाप्रभुके चरणोंका तकिया' पड़ गया। श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकदेव गोस्वामीने पहले श्रीविदुरका भी इसी रूपमें वर्णन किया है॥ 69 ॥ श्रीकृष्णके चरणोंके तकियेरूपी श्रीविदुरके प्रति श्रीमैत्रेयका कीर्तन :- श्रीमद्भागवत (3/13/5)में - इति ब्रुवाणं विदुरं विनीतं सहस्रशीर्ष्णश्चरणोपाधानम्। प्रहृष्टरोमा भगवत्कथायां प्रणीयमानो मुनिरभ्यचष्ट ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सहस्रशीर्षपुरुष श्रीकृष्णके चरणोंके तकिये-स्वरूप विनीत श्रीविदुर जब यह बात पूछ रहे थे, तब मैत्रेयमुनि भगवत्कथामें आनन्दवशतः रोमाञ्चित होकर कहने लगे ॥ 70 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत मैत्रेय ऋषिसे महात्मा विदुरके द्वारा हरिभक्त-श्रेष्ठ स्वायम्भुव मनु और शतरूपाके कार्य-कलापोंकी जिज्ञासा करनेपर, श्रीशुकदेव परीक्षितको श्रीविदुरके प्रश्नोत्तरमें मैत्रेयके द्वारा कही गयी हरिकथाका वर्णन कर रहे हैं— (श्रीशुक उवाच,—) भगवत्कथायां (श्रीहरिगुणानुवर्णने) प्रणीयमानः (विदुरेण प्रवर्त्तमानः) प्रहृष्टरोमा (प्रहृष्टानि रोमाणि यस्य सः) मुनिः (मैत्रेयः) इति ब्रुवाणं पृच्छन्तं सहस्रशीर्ष्णाः (सहस्रशीर्षा श्रीकृष्णः तस्य) चरणोपाधानं (चरणौ उपाधीयेते यस्मिन् तं—श्रीकृष्णः प्रीत्या यस्योत्सङ्गे चरणौ प्रसारयतीत्यर्थः) विनीतं (विनयान्वितम्) विदुरम् अभ्यचष्ट (अभ्यभाषत)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। भगवान् श्रीकृष्ण विदुरके घरमें आकर उनकी गोदमें अपने चरणयुगल रखकर सोये थे, ऐसा कहा जाता है (उपरोक्त श्लोककी सारार्थदर्शिनी टीका देखें) ॥ 70 ॥ अमृतानुकणिका—विदुरकी शङ्काकी निवृत्तिके लिये उनके घरमें श्रीकृष्णने सहस्रशीर्ष विग्रह धारण किया था। महाभारतमें प्रसिद्ध है कि विदुरके घरमें भोजन करनेके उपरान्त भगवान् श्रीकृष्णने उनकी गोदमें अपने चरणकमलयुगल रखकर शयन किया था—“उपरोक्त श्लोककी श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती-कृत सारार्थदर्शिनी टीका ॥” 70 ॥ श्रीशङ्करके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- शङ्कर करेन प्रभुर पाद-सम्वाहन। घुमाञा पड़ेन, तैछे करेन शयन ॥ 71 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित महाप्रभुके चरणोंको दबाते थे। जब महाप्रभुको नींद आ जाती, तब श्रीशङ्कर पण्डित जिस अवस्थामें होते उसी अवस्थामें सो जाते थे ॥ 71 ॥ उघाड़-अङ्गे पड़िया शङ्कर निद्रा याय। प्रभु उठि' आपन-काँथा ताहारे जड़ाय ॥ 72 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित अपने शरीरपर ओढ़नेके लिये कुछ भी नहीं लेकर सो जाते और बादमें जब महाप्रभु जागकर उन्हें देखते तो वे अपने काँथेको (पुराने फटे हुए वस्त्रोंको सिलकर बनाये गये कम्बलको) ही उनके ऊपर डाल देते ॥ 72 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उघाड़-अङ्गे',—अनावृत शरीरपर ॥ 72 ॥ निरन्तर घुमाय शङ्कर शीघ्र-चेतन। बसि' पाद चापि' करे रात्रि-जागरण ॥ 73 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित प्रतिदिन महाप्रभुके साथ गम्भीरामें ही सोते। जैसे ही कुछ शब्द होता, तो वे शीघ्रतासे उठ जाते और फिरसे बैठकर महाप्रभुके चरणोंको दबाते हुए पूरी रात बिता देते॥ 73 ॥

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