श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें458 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/58–68 ] मुखे, गण्डे, नाके क्षत हइल अपार। भावावेशे ना जानेन प्रभु, पड़े रक्तधार ॥ ५९॥ अनुवाद—विरहमें व्याकुल महाप्रभु उद्वेगमें उठ खड़े हुए और गम्भीराकी दीवारोंपर अपने मुखको घिसने लगे। उनके मुख, गालों और नाकपर अनेक घाव बन गये और उनसे रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी, किन्तु उन्हें भावावेशके कारण इसका अनुभव तक ही नहीं हुआ ॥ 58-59 ॥ सर्वरात्रि करेन भावे मुख सङ्घर्षण। गोँ-गोँ शब्द करेन, —स्वरूप शुनिला तखन ॥ 60 ॥ अनुवाद—भावमें आविष्ट होकर महाप्रभु पूरी रात अपना मुख दीवारोंपर घिसते रहे। जब वे अपने मुखसे गोँ-गोँ-शब्द करने लगे, तब श्रीस्वरूप दामोदरने उसे सुना ॥ 60 ॥ श्रीस्वरूपका महाप्रभुके कक्षमें आना :- दीप ज्वालि' घर गेला, देखि' प्रभुर मुख। स्वरूप, गोविन्द दुँहार हैल बड़ दुःख ॥ 61 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुकी अवस्थाके विषयमें पूछना, महाप्रभुका उत्तर :- प्रभुरे शय्याते आनि' शयन कराइला। “काँहे कैला एइ तुमि?” —स्वरूप पुछिला ॥ 62 ॥ अनुवाद—दीपक जलाकर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द गम्भीराके भीतर गये और महाप्रभुके मुखकी अवस्थाको देखकर वे दोनों बहुत दुःखी हुए। महाप्रभुको लाकर शय्यापर लिटाकर श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे पूछा, – “आपने ऐसा क्यों किया?” 61-62 ॥ प्रभु कहेन, – “उद्वेगे घरे ना पारि रहिते। द्वार चाहि' फिरि' शीघ्र बाहिर हइते ॥ 63 ॥ द्वार नाहि पाञा मुख लागे चारिभिते। क्षत हय, रक्त पड़े, ना पाइ याइते ॥” 64 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, –‘मैं उद्वेगके कारण कमरेके भीतर नहीं रह पा रहा था। मैं शीघ्र ही बाहर जानेके लिये द्वारको ढूँढ़ते हुए इधर-उधर घूमता रहा। किन्तु अन्धकारके कारण द्वारको नहीं ढूँढ़ पाया, मेरा मुख बार-बार चारों ओर दीवारोंसे टकराता रहा। मेरे मुखपर चोट लग गयी, रक्त प्रवाहित होने लगा, किन्तु मैं बाहर नहीं निकल पाया ॥’ 63-64 ॥ महाप्रभुके दिव्योन्मादके लक्षण :- उन्माद-दशाय प्रभुर स्थिर नहे मन। येइ करे, येइ बोले, —उन्माद-लक्षण ॥ 65 ॥ अनुवाद—उन्माद-ग्रस्त दशामें महाप्रभुका मन स्थिर नहीं था। वे जो भी करते थे, जो भी बोलते थे, –सब उन्मादके लक्षण होते थे ॥ 65 ॥ भक्तोंके साथ परामर्श करनेके बाद श्रीस्वरूपका महाप्रभुके चरणकमलोंके तकियेके रूपमें श्रीशङ्कर-पण्डितका निर्वाचन :- स्वरूप गोसाञि तबे चिन्ता पाइला मने। भक्तगण लञा विचार कैला आर दिने ॥ 66 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुकी ऐसी अवस्थाको देखकर मनमें बहुत चिन्तित हुए। अगले दिन उन्होंने भक्तोंके साथ बैठकर विचार-विमर्श किया ॥ 66 ॥ सब भक्त मेलि' तबे प्रभुरे साधिल। शङ्कर-पण्डिते प्रभुर सङ्गे शोयाइल ॥ 67 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने मिलकर महाप्रभुसे अनुनय-विनय करके उनकी सहमति ले ली कि श्रीशङ्कर पण्डित उनके कमरेमें उनके साथ लेटेंगे ॥ 67 ॥ प्रभु-पादतले शङ्कर करेन शयन। प्रभु ताँर ऊपर करेन पाद प्रसारण ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित महाप्रभुके चरणोंके नीचे लेटते थे और महाप्रभु अपने चरणोंको उनके ऊपर पसार देते थे ॥ 68 ॥