श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2474, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/51-58 उन्नीसवाँ अध्याय 457
श्रीकृष्णके प्रति प्रणयरोषपूर्वक दोषारोपण :- सब त्यजि' भजि याँरे, सेइ आपना-हाते मारे, नारीवधे कृष्णेर नाहि भय। ताँर लागि' आमि मरि, उलटि' ना चाहे हरि, क्षणमात्रे भाङ्गिल प्रणय॥51॥ अनुवाद-मैं सबकुछ त्यागकर जिनका भजन करती हूँ, वे ही अपने हाथोंसे मेरा वध कर रहे हैं। कृष्णको नारीवधरूपी पाप करनेमें कोई भय नहीं है। मैं उनके लिये मरी जा रही हूँ और वे मुड़कर भी मेरी ओर देखते तक नहीं हैं। उन्होंने क्षणमात्रमें ही हमारे प्रेमके बन्धनको तोड़ दिया है॥51॥
भावके उपयोगी गानके द्वारा श्रीस्वरूपका महाप्रभुको आश्वासन :- तबे स्वरूप रामराय, करि' नाना उपाय, महाप्रभुर करे आश्वासन। गायेन मङ्गलगीत, प्रभुर फिराइला चित, प्रभुर किछु स्थिर हैल मन॥54॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराम force? श्रीराम force? 'श्रीरामानन्द' रायने अनेक प्रकारके उपायोंसे महाप्रभुको शान्त किया। उन्होंने जयदेव गोस्वामीके द्वारा रचित मङ्गल-गीतका गायन करके महाप्रभुके चित्तका रूपान्तर कर दिया जिससे महाप्रभुका मन कुछ शान्त हो गया॥54॥
गम्भीरामें महाप्रभुका शयन :- एइमत प्रलापिते अर्द्धरात्रि गेल। गम्भीराते स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे शोयाइल॥55॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा इस प्रकार प्रलाप करते हुए आधी रात व्यतीत हो गयी। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको गम्भीरामें लिटा दिया॥55॥
पुनः अपने भाग्यको धिक्कार :- कृष्णे केने करि रोष, आपन दुर्दैव-दोष, पाकिल मोर एइ पापफल। ये कृष्ण-मोर प्रेमाधीन, तारे कैल उदासीन, एइ मोर अभाग्य प्रबल॥”52॥ अनुवाद-तो मैं कृष्णके प्रति भी रोष क्यों करूँ? वास्तवमें यह मेरे अपने ही दुर्भाग्यका दोष है। कृष्ण मेरे प्रेमके अधीन थे, किन्तु मेरे ही पापोंके पके हुए फलने उन्हें मेरे प्रति उदासीन बना दिया है। मेरा यह दुर्भाग्य ही प्रबल है॥”52॥
प्रभुरे शोयाञा रामानन्द गेला घरे। स्वरूप, गोविन्द शुइला गम्भीरार द्वारे॥56॥ अनुवाद-महाप्रभुके लेट जानेपर श्रीरायरामानन्द भी अपने घर लौट गये। श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द प्रभु गम्भीराके द्वारपर ही लेट गये॥56॥
नामकीर्त्तनमें रात्रि व्यतीत :- प्रेमावेशे महाप्रभुर गरगर मन। नामसङ्कीर्त्तन करि' करेन जागरण॥57॥ अनुवाद-किन्तु महाप्रभु सोये नहीं, वे नाम-सङ्कीर्त्तन करते हुए जागरण करने लगे। उनका मन प्रेमावेशमें विह्वल हो रहा था॥57॥
गोपीभावमें दिव्योन्मादग्रस्त महाप्रभु :- एइमत गौर-राय, विषादे करे हाय हाय, “हाहा कृष्ण, तुमि गेला कति?” गोपीभाव हृदये, तार वाक्य विलापये, 'गोविन्द दामोदर माधवेति॥'53॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीगौरराय हाय-हाय करते हुए विषादमें कहने लगे,-“हा-हा कृष्ण! आप कहाँ चले गये?” हृदयमें गोपीभावमें विभावित होकर श्रीगौरराय विलाप करते हुए गोपियोंके ही वाक्य 'गोविन्द, दामोदर, माधवेति'का गान करने लगे॥53॥
महाप्रभुका मुखघर्षणरूपी दिव्योन्माद (उद्घूर्णा) :- विरहे व्याकुल प्रभु उद्वेगे उठिला। गम्भीरा-भितरे मुख घषिते लागिला॥58॥