भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2473

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456 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/46-50 ] श्लोकार्थ ; चित्रजल्पोक्ति :- यथा राग- “ना जानिस् प्रेम-मर्म, व्यर्थ करिस् परिश्रम, तोर-चेष्टा-बालक-समान। तोर यदि लाग् पाइये, तबे तोरे शिक्षा दिये, एमन येन ना करिस् विधान ॥ 46 ॥ अनुवाद-“हे विधाता! तुम प्रेमके मर्मको नहीं जानते हो, तथापि सृष्टि-कार्य आदि करते हो। तुम्हारे ये कार्य निर्बोध बालककी भाँति हैं। यदि तुम हमारी पकड़में आ जाओ, तब हम तुम्हें ऐसा पाठ पढ़ायेंगीं कि तुम पुनः ऐसा कार्य नहीं करोगे ॥ 46 ॥ अनुभाष्य - 'परिश्रम', -सृष्टि-कार्य आदि ॥ 46 ॥ अरे विधि, तुइ बड़इ निष्ठुर। अन्योऽन्य दुर्लभ जन, प्रेमे कराञा सम्मिलन, अकृतार्था केने करिस दूर ? ? 47 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद-हे विधाता! तुम बहुत ही निष्ठुर हो! जिनका परस्पर मिलन दुर्लभ है, प्रेमके द्वारा उनका मिलन करवा देते हो, परन्तु फिर उनको अतृप्त अवस्थामें ही एक-दूसरेसे दूर क्यों कर देते हो ? 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- [हे विधाता !] जिनका परस्पर मिलन दुर्लभ है, प्रेमके द्वारा उनका मिलन करवाकर, मिलन करवानेका जो तात्पर्य है, वह सिद्ध नहीं होनेसे पहले ही पुनः उनको एक-दूसरेसे दूर क्यों कर देते हो ? 47 ॥ अरे विधि अकरुण, देखाञा कृष्णानन, नेत्र-मन लोभाइला मोर। क्षणेके करिते पान, काड़ि' निला अन्यस्थान, पाप कैलि 'दत्त-अपहार' ॥ 48 ॥ अनुवाद-हे निर्दयी विधाता ! तुमने मुझे कृष्णके मुखका दर्शन करवाकर मेरे नेत्रों और मनको उनके प्रति लुब्ध करवा दिया। अभी मैंने एक क्षणमात्रके लिये ही उनके मुखामृतका पान किया था, किन्तु तुम उन्हें मुझसे दूर करके अन्य किसी स्थानपर ले गये। तुमने दान देकर उसे पुनः लौटा लेनेका पाप किया है ॥ 48 ॥ अनुभाष्य - 'दत्त-अपहार', - कोई द्रव्य किसीको देकर पुनः उसे ले लेनेसे दत्तापहार होता है; यह प्रायश्चित योग्य पापमें-से एक है ॥ 48 ॥ 'अक्रूर करे तोर दोष, आमाय केने कर रोष', इहा यदि कह 'दुराचार'। तुइ अक्रूर-मूर्त्ति धरि', कृष्ण निलि चुरि करि', अन्येरे नहे ऐछे व्यवहार ॥ 49 ॥ अनुवाद-हे दुराचारी विधाता ! यदि तुम कहो कि 'यह तो अक्रूरका दोष है, तब तुम मेरे प्रति क्यों रोष कर रही हो?', तो मेरा कहना है कि तुम ही अक्रूरका रूप धारण करके कृष्णको चुराकर ले गये हो, अन्यथा अन्य कोई ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता ॥ 49 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ओहे दुराचार विधाते, तुम यदि यह कहो कि, 'अक्रूरने दोष किया है, मेरे प्रति क्यों क्रोध कर रही हो?' तब मैं कहती हूँ ॥ 49 ॥ अपने भाग्यको धिक्कार (चित्रजल्प) :- आपणार कर्मदोष, तोरे किबा करि रोष, तोर आमार सम्बन्ध विदूर। ये-आमार प्राणनाथ, एकत्र रहि यार साथ, सेइ कृष्ण हइला निष्ठुर ! ! 50 ॥ अनुवाद-हे विधाता! वास्तवमें यह मेरे अपने ही कर्मोंका दोष है, तब फिर मैं तुम्हारे प्रति रोष क्यों करूँ, तुम्हारा और मेरा तो बहुत दूरका सम्बन्ध है। जो मेरे प्राणनाथ हैं, मैं जिनके साथमें ही रहती थी, वे कृष्ण ही तो मेरे प्रति निष्ठुर हो गये हैं ॥ 50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'विदूर', -अति दूर ॥ 50 ॥