भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2472, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2472

[ 19/42-45 उन्नीसवाँ अध्याय 455 श्रीकृष्णकान्तिका वर्णन :- काँहा से मुरलीध्वनि, नवाम्बुद-गर्जित जिनि', जगत् आकर्षे श्रवणे याहार। उठि' धाय व्रज-जन, तृषित चातकगण, आसि' पिये कान्त्यमृत-धार ॥ 42 ॥ अनुवाद-वह मुरलीकी ध्वनि कहाँ है, जो नवमेघकी गर्जनको भी परास्त करती है, जो जगत्के समस्त प्राणियोंके कानोंको आकर्षित करती है। उसे सुनकर व्रजवासी उठकर दौड़ना आरम्भ कर देते हैं और कृष्णके निकट पहुँचकर प्यासे चातकके समान (अपने नेत्रोंसे) उनकी कान्तिकी अमृत-धाराका पान करते हैं ॥ 42 ॥ अनुभाष्य- 'नवाम्बुद',-नवीन मेघ ॥ 42 ॥ मोर सेइ कलानिधि, प्राणरक्षा महौषधि, सखि, मोर तँ हो सुहृत्तम। देह जीये ताँहा बिने, धिक् एइ जीवने, विधि करे एत विड़म्बन !!" 43 ॥ अनुवाद-यद्यपि कृष्ण मेरे लिये कलाके आश्रय हैं, वे मेरे प्राणोंकी रक्षाके लिये महान् औषधि स्वरूप हैं, वे मेरे सर्वाधिक सुहृद हैं, तथापि उन्हें छोड़कर देह जो अब तक जीवित है, मेरे ऐसे जीवनको धिक्कार है! विधाता मुझसे इतना छल कर रहा है॥" 43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'देह जीये ताँहा बिने',-उन्हें छोड़कर देह जो अब तक जीवित है (उसके लिये) ॥ 43 ॥ अनुभाष्य- 'कलानिधि',-चौंसठ कलाओंके आधार; पक्षान्तरमें,-सोलह कलाओंसे पूर्ण; 'विड़म्बन',-छलना, वञ्चना ॥ 43 ॥ विधिकी निन्दा :- 'ये-जन जीते नाहि चाय, तारे केने जीयाय', विधिप्रति उठे क्रोध-शोक। विधिरे करे भर्त्सन, कृष्णे देन ओलाहन, पड़ि' भागवतेर एक श्लोक ॥ 44 ॥ अनुवाद-'जो व्यक्ति जीवित नहीं रहना चाहता, वह उसे क्यों जीवित रखता है?' ऐसा विचार करके श्रीराधा-भावमें विभावित महाप्रभुका विधाताके प्रति क्रोध और अपनी अवस्थापर शोक उत्पन्न होता है। महाप्रभु श्रीमद्भागवतका एक श्लोक पढ़कर विधाताकी भर्त्सना करके श्रीकृष्णको उलाहना देते हैं ॥ 44 ॥ श्रीकृष्णविरह-संघटक विधिकी निन्दा :- श्रीमद्भागवत (10/39/19) में- अहो विधातस्तव न क्वचिद्दया संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः। तांश्चाकृतार्थान् वियुनङ्क्ष्यपार्थकं विचेष्टितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा ॥ 45 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे विधाता, तुममें दया नहीं है! तुम मैत्री और प्रणयके द्वारा देहधारियोंको मिलाकर उनकी अतृप्त अवस्थामें ही उन्हें पुनः पृथक् कर देते हो। तुम्हारी ऐसी चेष्टाओंको बालककी चेष्टाकी भाँति ही कहना पड़ेगा ॥ 45 ॥ अनुभाष्य-कृष्णमें समर्पित प्राणवाली कृष्णवल्लभा व्रजगोपियोंने जब सुना कि श्रीअक्रूर राम और कृष्णको मथुरा ले जानेके लिये ही व्रजमें आये हैं, तब वे कृष्णके भावी-विरहकी आशङ्कासे अतिशय शोक-कातर होकर क्रन्दन और विलाप कर रही हैं- अहो (खेदे) विधातः, तव क्वचित् दया न [अस्ति, यतः] मैत्र्या (हिताचरणेन) प्रणयेन (स्नेहेन) देहिनः (शरीरधारिणः जीवस्य) [अन्योन्यान्] संयोज्य अकृतार्थान् (अप्राप्तभोगान् अपि) तान् च वियुनङ्क्षि (वियोगं विघटयसि); ते (तव) विचेष्टितं (कर्म) अर्भक-चेष्टितं (मौढ्यात् बालकेहितं) यथा (तथा) अपार्थकं (हेतुरहितम्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥