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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2471, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2471

454 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/37-41 ] उनके दर्शन कराओ, अन्यथा मैं जीवित नहीं रह पाऊँगी ॥ 37 ॥ गोपीप्राणधन श्रीकृष्णचन्द्र :- एइ व्रजेर रमणी, कामार्कतप्त-कुमुदिनी, निज-करामृत दिया दान। प्रफुल्लित करे येह, काँहा मोर चन्द्र सेइ, देखाह, सखि, राख मोर प्राण ॥ 38 ॥ अनुवाद-इस व्रजकी रमणियाँ कामरूपी सूर्यसे तप्त कुमुदिनीकी भाँति हैं। किन्तु अपने हस्तरूपी अमृतको (किरणामृतको) प्रदान करके जो उन्हें प्रफुल्लित करते हैं, वे मेरे चन्द्र (श्रीकृष्ण) कहाँ हैं? हे सखि! मुझे उनके दर्शन करवाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा करो ॥ 38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कामरूपी सूर्यके द्वारा तप्त कुमुदिनीरूपी व्रजरमणयोंको अपना हस्तरूपी अमृत अर्थात् किरणामृत देकर ॥ 38 ॥ अनुभाष्य-गोपियोंका काम-सूर्यकी भाँति है; गोपियोंका हृदय-कुमुदिनीके समान है; कृष्णकामसे तप्त गोपी-हृदय- सूर्यकी किरणसे तप्त कुमुदिनी स्वरूप है। 'निज'-शब्दका अर्थ कृष्णका 'कर' अर्थात् किरण, अथवा हस्त, उस अमृतके समान किरण अथवा हस्तप्रदाता कृष्णचन्द्र (चन्द्रकी उपमायुक्त कृष्ण) ॥ 38 ॥ श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णके रूपका वर्णन :- काँहा से चूड़ार ठाम, शिखीपिच्छेर उड़ाम, नव-मेघे येन इन्द्रधनु। पीताम्बर-तड़िद्द्युति, मुक्तामाला-बकपाँति, नवाम्बुद जिनि' श्यामतनु ॥ 39 ॥ अनुवाद-इन्द्रधनुषसे शोभित नवमेघके सदृश अत्यन्त सुन्दर मयूरपंखसे बने मुकुटको मस्तकपर धारण करनेवाले कृष्ण कहाँ हैं? विद्युत जैसी कान्तिसे युक्त पीताम्बर धारण करनेवाले, उड़ते हुए सारसकी पंक्ति के समान मुक्ताकी मालाको धारण करनेवाले और नवमेघकी शोभाको भी तिरस्कृत करनेवाले श्याम देहधारी श्रीकृष्ण कहाँ हैं? 39 ॥ अनुभाष्य—'बकपाँति',—सारस-पंक्ति अथवा श्रेणी ॥ 39 ॥ एकबार यार नयने लागे, सदा तार हृदये जागे, कृष्णतनु-येन आम्र-आठा। नारी-मने पशि' याय, यत्ने नाहि बाहिराय, तनु नहे-सेयाकुलेर काँटा ॥ 40 ॥ अनुवाद-आमके वृक्षकी चिपचिपी गोंदकी भाँति श्रीकृष्णकी देह एकबार भी जिसके नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित हो जाती है, वह उस व्यक्तिके हृदयमें सदा ही उदित रहती है। श्रीकृष्णकी अत्यन्त सुशोभित देह नारियोंके हृदयमें ऐसे प्रवेश कर जाती है कि अनेक प्रयास करनेपर भी बाहर नहीं निकलती, मानो वह देह नहीं अपितु सेया-बेरीका काँटा हो ॥ 40 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'तनु नहे सेयाकुलेर काँटा',-कृष्णकी देहकी सेया-बेरीके काँटेके साथ तुलना की जा सकती है; इसका धर्म यह है कि उसके एकबार चुभनेपर उसे छुड़ाना दुष्कर होता है ॥ 40 ॥ अनुभाष्य-'आम्र-आठा',—आमके वृक्षकी गोंदके एकबार कहीं भी लग जानेपर उसे छुड़ाना कठिन होता है; वह जिस स्थानपर लगती है, वहाँपर घाव होने तककी सम्भावना होती है ॥ 40 ॥ जिनिया तमाल-द्युति, इन्द्रनीलसम कान्ति, से कान्तिते जगत् माताय। शृङ्गार रससार छानि', ताते चन्द्र-ज्योत्स्ना छानि', जानि' विधि निरमिला ताय ॥ 41 ॥ अनुवाद-तमालकी कान्तिको पराजित करनेवाली श्रीकृष्णकी इन्द्रनीलके समान कान्ति जगत्को मतवाला बना देती है, क्योंकि विधिने शृङ्गार-रसके सारको छानकर उसमें चन्द्रकी ज्योत्स्नाको मिलाकर श्रीकृष्णकी कान्तिको निर्मल बनाया है ॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'छानि',—मिलाकर, (निचोड़ना) ॥ 41 ॥

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