भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2470, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2470

[ 19/33-37 ] उन्नीसवाँ अध्याय 453

सखी समझकर कुछ पूछने लगे ॥ ३३ ॥ पूर्वे येन विशाखारे राधिका पुछिला। सेइ श्लोक पड़ि' प्रलाप करिते लागिला ॥ ३४ ॥ अनुवाद—पहले श्रीराधिकाने श्रीविशाखा सखीसे जो पूछा था, महाप्रभु उसी श्लोकको पढ़कर प्रलाप करने लगे॥ ३४ ॥ श्रीराधाकी श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णके विषयमें जिज्ञासा (चित्रजल्प) :— ललितमाधव (3/25)में विशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व शिखिचन्द्रकालङ्कृतिः क्व मन्दमुरलीरवः क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युतिः। क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि- र्निधिर्मम सुहृत्तमः क्व बत हा हन्त धिग्विधिम् ॥ ३५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ३५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, वे नन्दकुलचन्द्रमा कहाँ हैं? वे शिखिचन्द्रके (मयूर-पंखके) द्वारा (अलंकृति अथवा अलंकृत कृष्ण) कहाँ हैं? वे मन्दमुरलीधर (ध्वनि करनेवाले कृष्ण) कहाँ हैं? इन्द्रनीलमणि कृष्ण अथवा इन्द्रद्युति कहाँ हैं? रासरसमें नृत्य करनेवाले वे कहाँ हैं? मेरी जीवन-रक्षाकी औषधि (स्वरूप श्याम) कहाँ हैं? मेरी वह सर्वोत्तम सुहृदरूपी निधि कहाँ है? हाय ! हाय ! विधाताको धिक्कार है ॥ ३५ ॥ अनुभाष्य— हे सखि (विशाखे,) नन्दकुलचन्द्रमाः (नन्दयति इति नन्दः क्षीरसिन्धुः इव तत्तस्मिन् कुले जातः चन्द्रमाः नन्दवंशशशधरः) क्व (कुत्र वर्त्तते)? शिखिचन्द्रकालङ्कृतिः (शिखिचन्द्रकं मयूरपिच्छकम् अलङ्कृतिः भूषणं यस्य सः) क्व तिष्ठति? मन्दमुरलीरवः (मन्दः अनुच्चः अस्फुटः मुरलीरवः यस्य सः) क्व वर्त्तते? सुरेन्द्रनीलद्युतिः (सुरेन्द्र इव इन्द्रनीलमणिरिव नीला द्युतिः कान्तिः यस्य सः) क्व? रासरसताण्डवी (रासे क्रीड़ायां रसेन ताण्डवं नृत्यं यस्य सः) क्व? जीवरक्षौषधिः (जीवस्य जीवनस्य रक्षायैः परित्राणाय औषधिस্বরূপः यः सः) क्व? मम सुहृत्तमः (परम प्रियतमः) निधिः (सर्वसम्पत्प्रसूः) क्व? बत (खेदे) हा हन्त, विधिं (विधातारं) धिक्। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि विशाखे, (क्षीरसिन्धुसे उत्पन्न चन्द्रमाकी भाँति) नन्दवंशमें उत्पन्न वे चन्द्रमा कहाँ हैं? मयूरपंखरूपी भूषणसे अलङ्कृत वे कहाँ हैं? मन्द अस्फुट मुरलीध्वनि करनेवाले कहाँ हैं? इन्द्रनीलमणिके समान नीलकान्ति है जिनकी, वे कहाँ हैं? रासरसमें ताण्डव नृत्य करनेवाले कहाँ हैं? जीवनका परित्राण करनेवाले औषधिस्वरूप वे कहाँ हैं? मेरे परम प्रियतम, मेरी समस्त सम्पत्तिस्वरूप वे कहाँ हैं? (खेदसे) हा हन्त, विधाताको धिक्कार है॥ ३५ ॥ श्लोकका अर्थ; श्रीकृष्णविरहमें विधुरा श्रीराधाका ब्रजवासियोंके जीवन स्वरूप श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन :— यथा राग— “व्रजेन्द्रकुल-दुग्धसिन्धु, कृष्ण—ताहे पूर्ण इन्दु, जन्मि' कैला जगत् उजोर। कान्त्यमृत येबा पिये, निरन्तर पिया जिये, व्रज-जनेर नयन-चकोर ॥ ३६ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ३६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—"श्रीनन्दका कुल—क्षीर समुद्रके समान है, उसमें पूर्णचन्द्ररूपी कृष्णने उत्पन्न होकर जगत्‌को आलोकित किया है। जो व्रजवासियोंके नयन-चकोरके द्वारा प्राप्त होनेवाले कृष्णकान्तिरूप अमृतका निरन्तर पान करते हैं, वे ही जीवित रहते हैं। 'उजोर',—आलोकित (उज्ज्वल) ॥ ३६ ॥ श्रीकृष्णदर्शनकी तृष्णामें आर्त्त श्रीराधा :— सखि हे, कोथा कृष्ण, कराह दरशन। क्षणके याहार मुख, ना देखिले फाटे बुक, शीघ्र देखाह, ना रहे जीवन ॥ ३७ ॥ ध्रु ॥ अनुवाद—हे सखि! कृष्ण कहाँ हैं? मुझे उनके दर्शन कराओ। जिनका मुख क्षणमात्रके लिये भी नहीं देखनेपर मेरा हृदय फटने लगता है, मुझे शीघ्र ही