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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 19/96-100 उन्नीसवाँ अध्याय 463 गोपियोंके चित्तको उन्मादित करनेवाली श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्ध :- हरे नारीर तनु-मन, नासा करे घूर्णन, खसाय नीवि, छुटाय केशबन्ध। करिया आगे बाउरी, नाचाय जगत्-नारी, हेन डाकातिया कृष्णाङ्गगन्ध ॥ 96 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी देहकी सुगन्ध नारियोंके तन और मनका हरण कर लेती है। वह उनकी नाकको भ्रमित कर देती है, उनके नाड़ेके बन्धनको ढीला कर देती है और उनके केशोंके बन्धनको खुलवा देती है। वह सुगन्ध जगत्की नारियोंको उन्मत्त बनाकर उन्हें नचाती है। वह सुगन्ध ऐसी डकैत है ॥ 96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'बाउरी', —उन्मत्त ॥ 96 ॥ श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके आस्वादनके लिये आर्त गोपियोंका चित्त :- सेइ गन्धवश नासा, सदा करे गन्धेर आशा, कभु पाय, कभु नाहि पाय। पाइले पिया पेट भरे, पिङ पिङ तबु करे, ना पाइले तृष्णाय मरि' याय ॥ 97 ॥ अनुवाद—उस सुगन्धके वशीभूत होकर नाक सदा उसी सुगन्धकी आशा करती है, किन्तु कभी तो उसे वह सुगन्ध प्राप्त होती है और कभी नहीं। उस सुगन्धको प्राप्त करनेपर नाक पेट भरकर उसे पी लेती है, तथापि और पीनेकी अभिलाषा करती है। किन्तु सुगन्धके नहीं मिलनेपर नाक प्याससे मृतप्रायः हो जाती है ॥ 97 ॥ चित्रजल्प-उक्ति :- मदनमोहन-नाट, पसारि चाँदेर हाट, जगन्नारी-ग्राहके लोभाय। बिना-मूल्ये देय गन्ध, गन्ध दिया करे अन्ध, घर याइते पथ नाहि पाय ॥ "98 ॥ अनुवाद—मदनमोहन-नाटकिया सुगन्धके हाटको लगाकर जगत्की नारियोंको आकर्षित करके अपना ग्राहक बनाता है। वह बिना किसी मूल्यके ही सुगन्धका वितरण करता है और वह सुगन्ध नारियोंको ऐसा अन्धा बना देती है कि वे अपने घर जानेका मार्ग तक भी नहीं देख पातीं ॥ "98 ॥ अनुभाष्य— 'जगन्नारी-ग्राहके लोभाय', —जगत्में व्रजनारी गोपियोंको ग्राहकके रूपमें प्रलोभित करता है ॥ 98 ॥ महाप्रभुकी उन्माद अवस्था :- एइमत गौरहरि, गन्धे कैल मन चुरि, भृङ्गप्राय इति-उति धाय। याय वृक्षलता-पाशे, कृष्ण स्फुरे सेइ आशे, कृष्ण ना पाय, गन्धमात्र पाय ॥ 99 ॥ अनुवाद—इसी प्रकार श्रीगौरहरिके मनको भी श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धने चुरा लिया, इसलिये वे भ्रमरकी भाँति इधर-उधर दौड़ रहे थे। श्रीगौरहरि श्रीकृष्णकी स्फूर्तिकी आशासे वृक्ष-लताओंके निकट जा रहे थे, किन्तु उन्हें श्रीकृष्ण तो नहीं मिल रहे थे, केवलमात्र उनके अङ्गोंकी सुगन्ध प्राप्त हो रही थी ॥ 99 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीरायकी चेष्टासे महाप्रभुका बाह्यदशामें आगमन :- स्वरूप-रामानन्द गाय, प्रभु नाचे, सुख पाय, एइमते प्रातःकाल हैल। स्वरूप-रामानन्दराय, करि नाना उपाय, महाप्रभुर बाह्यस्फूर्त्ति कैल ॥ 100 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द राय गान कर रहे थे, महाप्रभु नृत्य कर रहे थे और उस आनन्दमें डूब रहे थे। इस प्रकार होते-होते प्रातःकाल हो गया। श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायने अनेक उपाय करके महाप्रभुको बाह्य जगत्की स्फूर्त्ति करवायी ॥ 100 ॥

464 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/101-107 ] महाप्रभुके द्वारा मातृभक्तिका प्रदर्शन, श्रीकृष्णविरहमें उद्घूर्णा-चित्रजल्प वर्णित :- मातृभक्ति, प्रलापन, भित्त्ये मुख-घर्षण, कृष्णगन्ध-स्फूर्त्ये दिव्यनृत्य। एइ चारिलीला-भेदे, गाइल एइ परिच्छेदे, कृष्णदास रूपगोसाञि-भृत्य ॥ 101 ॥ अनुवाद-श्रीरूपगोस्वामीके दास कृष्णदासने इस अध्यायमें महाप्रभुकी मातृभक्ति, उनके द्वारा किया गया प्रलाप, उनके द्वारा दीवारमें अपने मुखको घिसना और श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके स्फुरित होनेपर दिव्य नृत्य-इन चार लीलाओंका गान किया गया है॥ 101 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'कृष्णदास रूपगोसाञि-भृत्य',-इस पद्यको पाठ करके अनेक व्यक्तियोंके मनमें यह विचार आता है कि श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी श्रीरूपगोस्वामीके मन्त्र-शिष्य हैं। किन्तु अन्यान्य स्थानोंपर पढ़नेसे ऐसा सिद्धान्त स्थिर करना दुष्कर है। इस स्थानपर श्रीरूपके द्वारा रचित भक्तिरसामृतसिन्धुकी शिक्षाका आश्रय करके श्रील कविराज-प्रभु रसका विस्तार कर रहे हैं, इसलिये वे श्रीरूपका केवलमात्र नाम उल्लेख कर सकते हैं; अथवा गोस्वामियोंके दास कृष्णदासरूप इस लेखकने इस पद्यकी रचना की है,-यह अर्थ भी हो सकता है॥ 101 ॥ उन्नीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। एइमत महाप्रभु पाञा चेतन। स्नान करि' कैल जगन्नाथ-दरशन ॥ 102 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुको बाह्य चेतना आयी। तब उन्होंने स्नान किया और भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये गये॥ 102 ॥ अप्राकृत अधोक्षज श्रीकृष्ण और कार्ष्णलीला-अक्षजज्ञानी जड़विद्या-मत्त पण्डिताभिमानी तर्कपन्थीके लिये अगम्य :- अलौकिक कृष्णलीला, दिव्य शक्ति तार। तर्केर गोचर नहे चरित्र याहार ॥ 103 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकी लीला अलौकिक है, उसकी शक्ति दिव्य है, उसके क्रिया-कलाप तर्कके गोचर नहीं हैं॥ 103 ॥ एइ प्रेम सदा जागे याहार अन्तरे। पण्डितेह तार चेष्टा बुझिते ना पारे ॥ 104 ॥ अनुवाद-यह प्रेम जिनके हृदयमें सदा जाग्रत रहता है, उनकी चेष्टाओंको परम विद्वान व्यक्ति भी समझ नहीं पाता॥ 104 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/17)- धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि। अन्तर्वाणीभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा ॥ 105 ॥ अनुवाद-जिस धन्य व्यक्तिके चित्तमें नवप्रेम उदित होता है, उसकी समस्त क्रियाएँ और भावभङ्गिमा अर्थात् समस्त लक्षण शास्त्रोंको जाननेवाले पुरुष भी नहीं समझ सकते॥ 105 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 23/36 संख्या देखें ॥ 105 ॥ अप्राकृत श्रद्धाके साथ महाप्रभुकी अधोक्षज-लीलामें विश्वास संस्थापित करनेका अनुरोध :- अलौकिक प्रभुर 'चेष्टा', 'प्रलाप' शुनिया। तर्क ना करिह, शुन, विश्वास करिया ॥ 106 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी अलौकिक 'चेष्टाएँ' और 'प्रलाप'को सुनकर किसी प्रकारका कोई तर्क मत करना, अपितु उसे विश्वासपूर्वक सुनो॥ 106 ॥ भ्रमरगीतामें श्रीराधाके प्रलाप और महिषियोंके गीतमें दस प्रकारकी चित्रजल्पकी उक्ति :- इहार सत्यत्वे प्रमाण श्रीभागवते। श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते ॥ 107 ॥ अनुवाद-इसकी सत्यताका प्रमाण श्रीमद्भागवतमें मिलता है। 'भ्रमर-गीता'में श्रीराधाके प्रलापका वर्णन है॥ 107 ॥

[ 19/107 ] उन्तीसवाँ अध्याय 465 अनुभाष्य—(क) 'श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते',— भाः 10/47/12-21 श्लोक देखें ; जैसे— “मधुप कितव-बन्धो मा स्पृशाङ्घ्रिं सपत्नयाः कुच-विलुलितमाला-कुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः। वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं यदु सदसि विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक्॥” 1 ॥ श्रीराधाने कहा,—“हे धूर्त्तबन्धु, भ्रमर, तुम मेरे चरणोंको स्पर्श मत करना। मेरी सौतनोंके वक्षसे श्रीकृष्णकी वनमाला मर्दित हुई है, तुम्हारी मूँछोंमें उसके चिह्न दिखायी दे रहे हैं। मधुपति उन सब मानिनियोंके सन्तोषका विधान करें। तुमने जिसके दूत होकर भी इस प्रकार सुरत-चिह्नको धारण कर रखा है, उन श्रीकृष्णका इस प्रकारका आचरण निश्चय ही यादवोंकी सभामें उपहासका विषय होगा॥1॥” उद्धवेर आगमने व्रजे व्रजबाला। कृष्णकथा गाहि' काँदि' त्यजे अश्रुमाला॥ सेइकाले गोपी एक भृङ्गे लक्ष्य करि'। उद्धवेरे 'दूत'ज्ञाने बले प्रिय स्मरि'॥ गोपी कहे,—हे भ्रमर, तुमि धूर्त्तमित्र। पदस्पर्श-कार्य तव बड़इ विचित्र॥ तव नमस्कारे कभु ना हब प्रसन्न। तव श्मश्रुप्रान्ते देखि कुङ्कुमेर चिह्न॥ पत्नीर वक्षोद्वये कृष्ण-वनमाला। मर्दित-कुङ्कुम देखि' हय मम ज्वाला॥ मानिनीर प्रसन्नता-संग्रहे माधव। व्यस्त आछे सेइ कार्ये माथुर-बान्धव॥ व्रजजने यार कभु नाइ प्रयोजन। गोपीतुष्टि-तरे ताँर नाहिक कारण॥ तुमि-यदुपति-दूत, तोमार कि काय? तोमा' तरे सभामध्ये कृष्ण पाबे लाज॥1॥ [उद्धवके व्रजमें आनेपर व्रजकी बालाओंने कृष्णकी बातोंको कह-कहकर क्रन्दन करते हुए अश्रुओंकी माला प्रवाहित की थी। उस समय एक गोपी एक भ्रमरको देखकर और उद्धवको कृष्णका 'दूत' जानकर प्रिय कृष्णका स्मरण करते हुए कहने लगी,—हे भ्रमर, तुम धूर्त्त व्यक्तिके मित्र हो। तुम्हारे द्वारा मेरे चरण-स्पर्श करना बहुत विचित्र है। मैं तुम्हारे नमस्कारसे कभी भी प्रसन्न नहीं होऊँगी। मैं तुम्हारी मूँछोंपर कुङ्कुमका चिह्न देख रही हूँ। सपत्नियोंके दोनों वक्षोंके द्वारा कृष्णकी मर्दित वनमालापर लगे कुङ्कुमको देखकर मुझे जलन होती है। माथुर रमणियोंके बन्धु माधव उन मानिनी प्रियाओंको प्रसन्न करनेमें बहुत व्यस्त हैं। व्रजजनोंकी जिन्हें कोई आवश्यकता नहीं है, उनके द्वारा गोपियोंको सन्तुष्ट करनेका भी कोई कारण नहीं है। तुम यदुपतिके दूत हो, तुम्हारा यहाँ क्या कार्य है? तुम्हारे कारण कृष्णको सभामें लज्जित होना पड़ेगा।] “सकृदधर-सुधां स्वां मोहिनीं पाययित्वा सुमनस इव सद्यस्तत्यजेऽस्मान् भवादृक्। परिचरति कथं तत्पादपद्मं नु पद्मा ह्यपि बत हतचेता ह्युत्तमःश्लोकजल्पैः॥” 2॥ “तुम जिस प्रकार एक पुष्पका त्याग करके दूसरे पुष्पपर चले जाते हो, उसी प्रकार श्रीकृष्णने भी हमें एकबार मात्र लालसा वर्धनकारी अपने अधरामृतका पान करवाकर उसी समय हमारा परित्याग किया है। [हे भ्रमर यदि तुम कहो]—'लक्ष्मीदेवी किस कारणसे ऐसे व्यक्तिके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं?' तो मेरा मानना है कि निश्चय ही श्रीकृष्णके मिथ्या वचनोंसे उनका चित्त आकृष्ट हुआ है, परन्तु हम लक्ष्मीके जैसी अविवेकी नहीं हैं॥”2॥ गोपीस्थाने करे कृष्ण किवा अपराध? याहा लागि गोपीचित्ते हय एइ बाध?? हेतु शुन,—कृष्णचन्द्र स्वकीय मोहिनी। अधरेर सुधा पान कराइया यिनि॥ सद्य त्याग करि' हरि' गोपीकार मन। येरूप तोमार मत अर्वाचीन जन॥ सुकुसुम त्याग करि' याय अन्य-मने। तद्रूप कृष्णेर कार्य आमादेर सने॥ अचतुरा पद्मा कृष्णपादपद्म केन। त्याग नाहि करि' एबे यतने सेवेन?? कृष्ण-मिथ्यावाक्ये पद्मा करेछे प्रत्यय। पद्मासम अविदग्धा गोपी कभु नय॥2॥

466 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/107 ] [(भ्रमर यदि पूछे—) 'गोपियोंके प्रति कृष्णने ऐसा [गोपीकी सन्तुष्टिके लिये भ्रमर कृष्णका गुणगान क्या अपराध किया है जिसके कारण गोपियोंके चित्तमें करने लगा। ऐसा जानकर और उसकी सुमधुर तानको यह अप्रसन्नता है?' तो हे भ्रमर, उसका कारण सुनो, सुनकर गोपीने उससे कहा,—'हे भ्रमर, सुनो! कृष्ण कृष्णचन्द्र अपनी मोहिनी अधरसुधाका पान करवाकर अब गोकुलवासी नहीं हैं, (किन्तु) हम उन यदुपतिसे गोपियोंके मनको हरण करके शीघ्र ही उन्हें त्यागकर चिर-परिचित हैं। हमने उनकी कथाएँ बहुत बार सुनी चले गये। जिस प्रकार तुम्हारे जैसा अज्ञानी व्यक्ति एक हैं। हम उन्हें भली-भाँति जान गयी हैं, इसलिये अब सुन्दर मकरन्दसे पूर्ण कुसुमके मधुका पानकर उसका उनका गुणगान और नहीं सुनेंगी। कृष्णकी जो अब त्यागकर अन्य मनवाला होकर चला जाता है, कृष्णने निजप्रिय सखियाँ हैं, तुम उनके पास जाकर ही भी हमारे साथ वैसा ही किया। (भ्रमर यदि कहे—) कृष्णका गुणगान करो। कृष्णके आलिङ्गनके द्वारा जिन 'अचतुरा लक्ष्मी किसलिये कृष्णके चरणकमलोंका त्याग कृष्णप्रेमवती रमणियोंको सुमतिकी प्राप्ति हुई है और नहीं करती और प्रीतिपूर्वक उनकी सेवा करती हैं?' उसके द्वारा उनकी वक्ष-रोगकी पीड़ा शान्त हो गयी है, तो इसका कारण यह है कि लक्ष्मीने कृष्णके मिथ्या उन (कृष्णरूपी धनसे) धनी कृष्णकी सर्वाधिक प्रियाओंके वचनोंपर विश्वास कर लिया है, किन्तु हम गोपियाँ सामने कृष्णका गुणगान करो जिसे सुनकर वे तुम्हें कदापि लक्ष्मीकी भाँति अचतुर (सरल) नहीं हैं।] सम्मान प्रदान करेंगी।] “किमिह बहु षडङ्घ्रे गायसि त्वं यदूना- “दिवि भुवि च रसायां काः स्त्रियस्तदुरापाः मधिपतिमगृहाणामग्रतो नः पुराणम्। कपटरुचिर-हास-भ्रूविजृम्भस्य याः स्युः। विजयसख-सखीनां गीयतां तत्प्रसङ्गः चरण-रज उपास्ते यस्य भूतिर्वयं का क्षपितकुचरुजस्ते कल्पयन्तीष्टमिष्टाः ॥” 3 ॥ अपि च कृपण-पक्षे ह्युत्तमःश्लोकशब्दः ॥” 4 ॥ “हे भ्रमर, तुम हम व्रजवासिनियोंके सामने किसलिये “(हे कृष्णप्रेयसी शिरोमणे! आप इस प्रकार मत कृष्णकी पुरानी बातोंका बार-बार गान कर रहे हो? बोलिये। आपको स्मरण करके श्रीकृष्णकी काम विडम्बना श्रीकृष्णकी नवीन सखियोंके पास जाकर कृष्ण-प्रसङ्गका उपस्थित होते ही उन्होंने तुम्हारी प्रसन्नता उत्पादन गान करो। श्रीकृष्णके आलिङ्गनके द्वारा जिनकी करनेके लिये मुझे आदेश किया है, इस प्रकार भ्रमर स्तन-पीड़ाकी शान्ति हुई है, वैसी कृष्णप्रिया कामिनियाँ कह रहा है, ऐसी कल्पना करके श्रीराधा कहने तुम्हारे अभीष्टको पूर्ण करेंगी॥” 3 ॥ लगीं)—स्वर्ग, मर्त्य और रसातलमें वास करनेवाली कामनियोंमें-से उनके लिये कौन दुर्लभ है? स्वयं गोपीतुष्टि-हेतु भृङ्ग करे कृष्णगान। लक्ष्मीदेवी कपट-मनोहर हास्यके साथ भृकुटिका सञ्चालन एइ बुझि’ कहे गोपी शुनिया सुतान॥ करनेवाले श्रीकृष्णकी चरणधूलिकी सेवा करती हैं, ऐसी शुन हे भ्रमर, कृष्ण-भवनरहित। परिस्थितिमें हम किस प्रकारसे उनके योग्य हो सकती यदुपति आमादेर चिरपरिचित॥ हैं? कृपण लोग ही अनुकम्पाशील वैसे पुरुषको शुन्याछि तार कथा मोरा बहुबार। उत्तमःश्लोक कहकर उनका गुणगान कर सकते हैं, मेरे ताँरे जानियाछि, गान शुनिब ना आर॥ समान गोपियाँ वैसा नहीं कर सकतीं॥” 4 ॥ कृष्ण-निजप्रिय जन याँहारा एखन। ताँदेर निकटे गिया करह गायन॥ हे मधुप, कृष्णचन्द्र गोपीके स्मरिया। कृष्ण-आलिङ्गन याँरा लभेछे सुमति। अनङ्ग-वेदनाखिन्न व्याकुल हइया॥ वक्षोरोग ह’ते मुक्त कृष्णप्रेमवती॥ पाठायेछे दूतरूपे मम तुष्टि तरे। सेइ धनी प्रियवरा तब कृष्णगान। बलिओ ना एइ कथा आमार गोचरे॥ शुनिया आदर करि’ दिबे तब मान॥ 3 ॥

[ 19/107 उन्नीसवाँ अध्याय 467 स्वर्ग-मरत-तले आछे यत नारी। भ्रमरे देखिया गोपी निज-पादमूले। सबेइ कृष्णेर प्राप्य, ता' बलिते पारि॥ क्षमाइछे अपराध पशि' पदाङ्गुले॥ कपट रुचिर हास्य कृष्णेर भ्रूद्वय। त्यज' शिर पद ह'ते भ्रमर कुशल। विराजित देखि' लक्ष्मी सदाइ सेवय॥ मुकुन्द कि शिखायेछे, मोरे ताहा बल॥ लक्ष्मीदेवी-तुलनाय आमरा-सामान्य। मिष्टवाक्य-प्रार्थनाय आर दौत्य-धर्मे। कपट ह'लेओ कृष्ण सहसा वदान्य॥ चतुरता आछे, भृङ्ग, जानिलाम मर्मे॥ बोलो ताँरे, दीनप्रति अनुग्रह याँर। मुकुन्देर अपराध किवा आछे बल? 'उत्तमःश्लोकाख्य'-शब्दे परिचय ताँर॥4॥ बलिओ ना एड् कथा, तुमि भृङ्ग-खल॥ [हे भ्रमर! कृष्णचन्द्रने गोपीको स्मरण करके पतिपुत्र छाड़ि' आर परलोक-धर्म। और काम-वेदनासे दुःखी और व्याकुल होकर तुम्हें कृष्णसेवा बिना मोर नाहि कोन कर्म॥ मेरी सन्तुष्टिके लिये दूत बनाकर भेजा है-तुम यह असंयत चित्त कृष्ण अनायासे भूलि'। बात मेरे सामने मत बोलना। स्वर्ग, पृथ्वी और पातालमें काय नाइ कथा तार, सन्धान ना तुलि॥5॥ जितनी भी नारियाँ हैं, सभीको कृष्ण प्राप्त कर सकते [भ्रमरको अपने चरणोंपर मँडराते देखकर गोपीने हैं, यह मैं निश्चित रूपसे कह सकती हूँ। कृष्णकी सोचा कि यह मेरे चरणोंकी अँगुलियोंको स्पर्श करके दोनों भौहोंपर कपट-रुचिके हास्यको विराजित देखकर अपने अपराधके लिये क्षमा माँग रहा है, इसलिये ही लक्ष्मी उसकी सदा सेवा करती हैं। लक्ष्मीदेवीकी गोपीने भ्रमरसे कहा,-हे कुशल भ्रमर! अपने सिरको तुलनामें हम तो साधारण स्त्रियाँ हैं, कृष्ण कपटी होनेपर मेरे चरणोंसे हटा लो। तुम मुझे यह बताओ कि भी सहसा वदान्य भी बन जाते हैं। तुम कृष्णसे कहना मुकुन्दने तुम्हें क्या सिखाकर भेजा है। मैंने तुम्हारा मर्म कि दीनोंके प्रति जो कृपा करता है, वही 'उत्तम-श्लोक'के जान लिया है कि तुममें मधुर वचनोंके द्वारा प्रार्थना रूपमें जाना जाता है।] करने और दूतका धर्म निभानेकी चतुरता है। किन्तु “विसृज शिरसि पादं वेद्म्यहं चाटुकारै- हे दुष्ट भ्रमर! मुझसे ऐसी बात मत कहना कि रनुनयविदुषस्तेऽभ्येत्य दौत्यैर्मुकुन्दात्। 'बताओ मुकुन्दका अपराध क्या है?' कृष्णसेवाके स्वकृत इह विसृष्टापत्यपत्यन्यलोका अतिरिक्त मेरा अन्य कोई कार्य ही नहीं था, उसके व्यसृजदकृतचेताः किं नु सन्धेयमस्मिन्॥”5॥ लिये मैंने पति-पुत्र और परलोक-धर्म तकका परित्याग “तदनन्तर भ्रमर उनके चरणकमलोंको स्पर्श करके कर दिया था। किन्तु असंयत-चित्त कृष्ण इस बातको क्षमा प्रार्थना कर रहा है, ऐसा मनमें विचार करके गोपी अनायास ही भूल गये। इसलिये ऐसे व्यक्तिकी बातोंसे कहने लगीं,-हे भ्रमर! तुम मेरे चरणोंसे अपने मुझे क्या काम? उनके साथ सन्धि कैसे सम्भवपर मस्तकको हटा लो, (तथापि वह भ्रमर उनके चरणोंको है?] नहीं छोड़ रहा है, ऐसा मानकर कहने लगीं) तुम “मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा श्रीकृष्णसे शिक्षा प्राप्त करके दूतोचित प्रिय वाक्यके स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्। द्वारा अनुनय-विषयमें पण्डित हो गये हो, तुम्हारे बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद् ध्वाङ्क्षवद् य- विषयमें मैं सब कुछ जानती हूँ। हमने उनके लिये स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः॥6॥” अपने पति, पुत्र, परलोक सभीका परित्याग किया था, “इस नृशंस-प्रकृतिके श्रीकृष्णने रामावतारमें व्याधके ऐसी परिस्थितिमें वे असंयतचित्त पुरुष हमारा परित्याग समान वानरराज बालिका वध किया था और स्त्रीके करके चले गये, इस प्रकारके व्यक्तिके साथ कैसे वशीभूत होकर कामसे पीड़ित होकर आयी शूर्पनखाके हमारी सन्धि हो सकती है?॥”5॥ नाक और कान काट दिये थे। पूजोपहारको खाकर

468 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/107 ] कौवेके आचरणके समान वामनावतारमें बलिराजके द्वारा प्रदत्त समस्त राज्यको ग्रहण करके भी बलिको बाँध दिया था। ऐसे कृष्णके साथ बन्धुत्वसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, किन्तु उनके कथारूपी धनका त्याग करना हमारे लिये अति दुष्कर है॥” 6॥ कृष्ण-पूर्वजन्मकथा यबे उठे मने। ओहे भृङ्ग, भय हय गोपीकार गणे॥ राम-अवतारे यबे व्याधवत् हरि। अविचारे क्रूर हइ’ बालि वध करि’॥ कामपरा शूर्पनखा यबे राम-स्थाने। याय, तबे सीता-बाध्य काटे नाक-काणे॥ बलिराज ह’ते हरि वामनमूर्त्तिते। पूजा-उपहार लभि’ ताहाके वञ्चिते॥ काकवत् बान्धिलेन सेइ गुणधर। तार सह सख्य भाल नय, हे भ्रमर॥ तार कथारूप अर्थ सुदुस्त्यज जानि’। से-कारणे त्याग-कार्ये बलहीन मानि॥6॥ [हे भ्रमर, कृष्णके पूर्व-जन्मोंकी कथाएँ जब भी हृदयमें उदित होती हैं, तब गोपियाँ भयभीत हो जाती हैं। राम-अवतारमें हरिने व्याधकी भाँति बिना कोई विचार किये क्रूरतापूर्वक बालिका वध किया था। काममें आसक्त होकर जब शूर्पनखा रामके पास आयी थी, तब सीताके वशीभूत होनेके कारण रामने उसके नाक और कानोंको काट दिया था। हरिने वामनरूप धारण करके महाराज बलिसे छल करके उससे पूजा और उपहारोंको प्राप्त किया और बादमें कौवेके गुणको धारण करके बलिको बाँध भी दिया। इसलिये हे भ्रमर! उनके (कृष्णके) साथ मित्रता रखना अच्छा नहीं है। किन्तु उनकी कथारूपी धनको छोड़ पाना अति कठिन है, इसलिये मैं उसे त्याग करनेमें स्वयंको असमर्थ पाती हूँ।] ‘यदुनुचरितलीला-कर्णपीयूष-विप्रुट् सकृददन-विधूत-द्वन्द्वधर्मा विनष्टाः। सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सृज्यदीना बहव इह विहङ्गा भिक्षुचर्यां चरन्ति॥” 7॥ “हंसके समान सार-असारको जाननेवाले जो लोग जिनके चरित्र लीलाकथामृतकी कणिकामात्रको कानोंरूपी दोनोंमें भरकर आस्वादन करते हैं, वे रागादि द्वन्द्वसे रहित और भोगोंकी अभिलाषासे शून्य होकर दुःखपूर्ण गृह-परिजनोंका त्याग करके प्राण धारण करनेके लिये भिक्षा-वृत्तिको ग्रहण करते हैं, वैसी कृष्णकथाका हम त्याग नहीं कर सकतीं॥”7॥ धर्म-अर्थ-काम-लता-त्रिवर्ग-नाशिनी। कृष्णकथा एत बल धरे मोरा जानि॥ कृष्णलीलामृतकण कर्णे पान करि’। रागद्वेषमुक्तधर्मी सर्व परिहरि’॥ भोगहीन पक्षितुल्य भिक्षाजीवि-जन। दुःखमय गृह आर कुटुम्ब-भवन॥ सहसा सकल त्यजि’ सर्वतोभावेते। उचित हइलेओ मोरा असमर्थ ताते॥7॥ [मैं जानती हूँ कि कृष्णकथा धर्म-अर्थ-कामरूपी त्रिवर्गका नाश करनेका बल रखती है। कृष्ण-लीलामृतके कणमात्रका कानोंके द्वारा पान करके धर्मज्ञ व्यक्ति राग-द्वेष आदिसे मुक्त होकर सर्वस्व त्याग देता है। वह व्यक्ति भोगहीन पक्षीकी भाँति भिक्षा-जीवी बनकर दुःखमय गृह एवं परिवारजनों आदि सभीको सहसा सभी प्रकारसे त्याग देता है। ऐसी कृष्णकथाका त्याग करना उचित होनेपर भी मैं वैसा करनेमें असमर्थ हूँ।] “वयमृतमिव जिह्म-व्याहृतं श्रद्दधानाः कुलिक-रुतमिवाज्ञाः कृष्णवध्वो हरिण्यः। ददृशुरसकृदेतत् तन्नखस्पर्शतीव्र- स्मररुज उपमन्त्रिन् भण्यतामन्यवार्त्ता॥” 8॥ “हे दूत, मुग्ध कृष्णसारकी पत्नी हिरनियाँ जिस प्रकार व्याधके गीतमें आसक्त होकर बादमें बाणके प्रहारसे जनित व्यथाको अनुभव करती हैं, उसी प्रकार हमने भी कुटिल श्रीकृष्णके वाक्योंको सत्य मानकर अनेक बार उनके नखस्पर्शजनित तीव्र कामवेदनाको अनुभव किया है, इसलिये तुम किसी और विषयकी चर्चा करो॥”8॥ ओहे दूत, मूढ़पक्षी व्याधेर सङ्गीते। येरूप विश्वास करि’ बाण-विद्ध-चिते॥

क्लेश भोग करे यथा, आमरा तेमन। कृष्णकथा विश्वासिया पायेछि वेदन॥ कृष्णनखस्पर्श पीड़ा सुतीव्र मदन। जारितेछे मोरे, बल अपर वचन॥ 8॥ [ओहे दूत, मूर्ख पक्षी व्याधके सङ्गीतपर विश्वास करके अर्थात् उससे आकर्षित होकर जिस प्रकार हृदयमें उसके बाणसे वेधित होकर कष्ट भोग करता है, उसी प्रकार हम भी कृष्णकी बातोंपर विश्वास करके वेदना अनुभव कर रही हैं। कृष्णके नख-स्पर्श जनित सुतीव्र काम-व्याधि मुझे जला रही है, इसलिये तुम कोई अन्य चर्चा करो।] “प्रियसख पुनरागाः प्रेयसा प्रेषितः किं वरय किमनुरुन्धे माननीयोऽसि मेऽङ्ग। नयसि कथमहास्मान् दुस्त्यजद्वन्द्वपार्श्वं सततमुरसि सौम्य श्रीर्वधूः साकमास्ते॥” 9॥ “भ्रमरके प्रस्थान करके पुनः आनेपर श्रीराधा कहने लगीं, - हे प्रिय कृष्णबन्धो! तुम क्या पुनः प्रियतमके द्वारा प्रेरित करनेपर आये हो? हे दूत, तुम हमारे माननीय हो, इसलिये अपनी इच्छाको प्रकाशित करो। यदि तुम चाहते हो कि हम मधुपुरीमें गमन करें, तो देखो कि लक्ष्मीदेवी सदा जिनकी सहचरीरूपमें उनके वक्षपर विराजमान रहती हैं, वैसे दुस्तज्य युगलभावको प्राप्त पुरुषके निकट हमें किसलिये ले जाना चाहते हो?॥” 9॥ एइ सब कथा शुनि' भ्रमरे फिरिते। देखिया गोपिका कहे विचारिया चिते॥ तुमि-प्रियकृष्ण-सखा, कृष्णेर आज्ञाय। तथा ह'ते आसियाछ एथा पुनराय॥ तुमि तबे पूजनीय मम, दूतवर। प्रार्थना बलह मोरे, - किवा इच्छा धर॥ श्रीकृष्ण युगल-भाव कभु ना छाड़िबे। गोपीकाय तुमि एबे केन वा लइबे? श्रीकृष्णेर वधू लक्ष्मी प्रभुवक्षे रहि'। सतत सेविछे एबे, तव पाशे कहि॥ 9॥ [गोपीकी यह सब बातोंको सुनकर भ्रमर वहाँसे चला गया और पुनः लौट आया। ऐसा देखकर गोपीने मनमें कुछ विचार करके कहा, - हे भ्रमर ! तुम कृष्णके प्रिय सखा हो। तुम कृष्णकी आज्ञासे वहाँसे पुनः यहाँ लौटकर आ गये हो। हे दूतवर! तुम मेरे पूजनीय हो। तुम मुझे अपनी प्रार्थनाके विषयमें बतलाओ, तुम्हारी क्या इच्छा है? श्रीकृष्ण कभी भी युगल-भावका परित्याग नहीं करेंगे। श्रीकृष्णकी वधू लक्ष्मी उनके वक्षःस्थलपर रहकर जब निरन्तर उनकी सेवा कर रही हैं, तब तुम अब गोपियोंको किसलिये अपने साथ ले जाना चाहते हो? - उनसे ऐसा जाकर कहना।] “अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनास्ते स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान्। क्वचिदपि स कथा नः किङ्करीणां गृणीते भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध््न्यधास्यत् कदा नु॥” 10॥ “हे सौम्य, आर्यपुत्र श्रीकृष्ण गुरुकुलसे लौटकर क्या मथुरामें आ गये हैं? वे क्या अब नन्दालय और गोपोंको स्मरण करते हैं? वे क्या कभी हम दासियोंकी चर्चा करते हैं? वे कब पुनः अगुरुके समान सुगन्धित अपनी भुजाओंको हमारे मस्तकपर रखेंगे?॥” 10॥ 'सौम्य' सम्बोधिया बोले गोपी हर्षभरे। गुरुकुल ह'ते एबे मथुरा-नगरे॥ सुखे बसे आर्यपुत्र भूलि' व्रजाङ्गना। पितार आवास-कथा मने कि पड़े ना?? किङ्करी छिलाम मोरा, आमादेर कथा। मुखे आने कभु किवा भुलिया सर्वथा?? क्षेमास्पद मोरे जानि' कब परशिबे? अगुरु-सुगन्धि-कर गोपीशिर दिबे?? 10॥ [(भ्रमरको) 'हे सौम्य !' सम्बोधित करके गोपी प्रसन्नतापूर्वक कहने लगी, - गुरुकुलसे लौटकर अब आर्यपुत्र (कृष्ण) मथुरामें व्रजाङ्गनाओंको भुलाकर क्या सुखपूर्वक रह रहे हैं? क्या उनके मनमें उनके अपने पिता श्रीनन्दके आवासकी बातें स्मरण नहीं आती? हम कृष्णकी दासियाँ थीं, क्या कभी वे हमारी बात अपने मुखपर लाते हैं, अथवा हमें सम्पूर्ण रूपसे भूल गये हैं? मुझे क्षमाका पात्र जानकर वे कब मुझे स्पर्श करेंगे? कब अपने अगुरुके समान सुगन्धित हस्तको गोपीके सिरपर रखेंगे?] ॥ 107 ॥

470 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/108 निजेन्द्रियतर्पण-परायण महामहा-अक्षजज्ञानी स्वयंको पण्डित माननेवाले जड़विद्यामें मत्त व्यक्तियोंकी भी अप्राकृत विप्रलम्भ रसको समझनेमें असमर्थता :- महिषीर गीत येन 'दशमे'र शेषे। पण्डिते ना बुझे तार अर्थविशेषे ॥ 108 ॥ अनुवाद—श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धके अन्तमें महिषी-गीत है जिसका विशेष अर्थ है। इसको परम विद्वान व्यक्ति भी नहीं समझ पाते॥ 108॥ अनुभाष्य—(ख) महिषीर गीत-येन दशमेर शेषे (अर्थात् दशम स्कन्धके अन्तमें महिषी गीत)—भाः 10/90/15-24 श्लोक देखें; जैसे— “कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोधः। वयमिव सखि क्वचिद्गाढ़निर्षिद्धचेता नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥”1॥ “महिषियाँ कह रही हैं,—हे कुररि, अज्ञाततत्त्व ईश्वर श्रीकृष्ण जगत्में रात्रिकालमें सो रहे हैं, तुम निद्राशून्य होकर उनकी निद्रा भङ्ग करनेके लिये विलाप कर रही हो, परन्तु सोती नहीं हो, यह उचित नहीं है। अथवा हे सखि, नलिन-नयन श्रीकृष्णके हास्यसहित उदार लीलादृष्टिपातसे हमारे समान तुम्हारा चित्त भी क्या अतिशय बिद्ध हुआ है ? ॥”1॥ जलक्रीड़ा समापिया, कृष्णचिन्ता-पर हिया, चिन्तामग्न महिषीर गण। हे सखि कुररि, एबे, निशाय निद्रित देवे, मोरा करि' कृष्णे जागरण॥ ताँर निद्रासुख-भङ्ग, आमादेर देखि' रङ्ग, तुमि करितेछ विलापन। नाइ केन निद्रा तोर, कृष्णचिन्ता सुविभोर, किंवा बिंधियाछे हास्येक्षण?? कृष्णेर मधुर स्मित, कृष्णदृष्टिबिद्धचित्त, महिषीगणेर भावचय। आमादेर मत तव, अवस्था घटेछे सब, महिषीर तति तारे कय॥1॥ [जलक्रीड़ाको समाप्त करनेके पश्चात् हृदयमें श्रीकृष्णका चिन्तन करती हुई चिन्तामग्न महिषियाँ कह रही हैं,—हे सखि कुररि, इस समय रात्रिमें देव (श्रीकृष्ण) तो सोये हैं, किन्तु हम श्रीकृष्णके लिये जागरण कर रही हैं। श्रीकृष्णके निद्रा-सुखको भङ्ग करके और हमें देखकर तुम हमारा उपहास करते हुए विलाप कर रही हो। तुम्हें नींद क्यों नहीं आ रही, क्या तुम भी कृष्णकी चिन्तामें अत्यधिक विभोर हो? क्या तुम्हें भी श्रीकृष्णके हास्य-ईक्षणने बेध दिया है? श्रीकृष्णकी मधुर मुस्कान और कटाक्षसे बींधे गये चित्तवाली महिषियाँ अपने हृदयमें उदित भावोंके वशीभूत होकर कुररिसे कह रही हैं कि (क्या) तुम्हारी अवस्था भी हमारे समान ही हो गयी है।”] “नेत्रे निमीलयसि नक्तमदृष्टबन्धु- स्त्वं रोरवीषि करुणं बत चक्रवाकि। दास्यं गता वयमिवाच्युतपादजुष्टां किंवा स्रजं स्पृहयसे कबरेण वोढुम् ॥”2॥ “हे चक्रवाकि, तुम रात्रिकालमें प्रियतमको नहीं देखकर क्या करुणस्वरसे अतिशय रोदन कर रही हो और अपने नयनयुगलको बन्द नहीं करती हो? अथवा हमारे समान श्रीकृष्णकी दासी होकर उनकी श्रीचरणसेवित मालाको अपने केशपाशमें धारण करनेकी स्पृहासे इस प्रकार रोदन कर रही हो? ॥”2॥ रात्रे बन्धु ना देखिया, चक्षुद्वंय ना मेलिया, चक्रवाकि, तुमि दुःखभरे। कारुण्ये रोदन कर, किंवा तुमि किंवा स्मर, स्पृहा कर धरिबार तरे॥ अच्युतचरणजुष्ट, महिषी याहाते तुष्ट, सेइ माला शिरेते धरिते। रोदन-कारण तव, स्पष्ट करि' कह सब, चक्रवाकि, महिषी बुझिते॥2॥ [हे चक्रवाकि! रात्रिमें अपने प्रियतमको नहीं देखकर दुःखसे भरे हृदयसे करुण रोदन कर रही हो और नयनयुगलको नहीं मूँद रही हो। तुम किसको अथवा क्या स्मरण कर रही हो, तुम किसे धारण करनेकी स्पृहा कर रही हो? अच्युतकी चरणसेवित

[ 19/108 उन्नीसवाँ अध्याय 471 ] माला, जिससे महिषियाँ सन्तुष्ट होती है, क्या तुम उस मालाको अपने सिरपर धारण करनेके लिये ही रोदन कर रही हो। हे चक्रवाकि! तुम स्पष्ट रूपसे सब बतलाओ जिससे कि हम महिषियाँ तुम्हारे उद्देश्यको समझ सकें।] “भो भोः सदा निष्टनसे उदन्व- न्नलब्धनिद्रोऽधिगतप्रजागरः। किंवा मुकुन्दापहतात्मलाञ्छनः प्राप्तां दशां त्वञ्च गतो दुरत्ययाम्॥” ३॥ “हे जलनिधे, क्या तुम्हें स्वभावतः ही निद्रा नहीं आती जो सदा जागकर गर्जन करते रहते हो? अथवा सम्भोगकालमें श्रीकृष्णने जिस प्रकार हमारे कुङ्कुमादि चिह्नोंको हरण किया है, उसी प्रकार तुम्हारी लक्ष्मी, कौस्तुभ आदि चिह्नोंको हरण करनेपर क्या तुम्हारी इस प्रकार दशा हुई है?”॥ ३॥ जलनिधे, रात्रिकाले, ना लिखेछे तब भाले, निरन्तर निद्रा-सुखसङ्ग। जागिया रोदन-कर्म, पाइयाछ एइधर्म, आमादेर मत चित्तभङ्ग॥ कुङ्कुमादि-चिह्न नाश, मुकुन्देर सुप्रयास, महिषीवृन्देर प्रति यथा। पाइया से व्यवहार, समदशा कि तोमार, जलधि कि लभियाछ तथा?? ३॥ [हे जलनिधे (समुद्र)! क्या तुम्हारे भाग्यमें रात्रिकालमें भी निरन्तर निद्रा-सुख-सङ्ग नहीं लिखा है? हमारी भाँति हृदयके खण्डित होनेके कारण सारी रात्रि जागकर रोना, क्या तुम्हारा भी यही धर्म है? जिस प्रकार मुकुन्दने यत्नपूर्वक हम महिषियोंके कुङ्कुमादि चिह्नोंका हरण किया था, हे जलधि! क्या तुम्हारे साथ भी वैसा ही व्यवहार हुआ है, क्या तुम्हारी भी हमारे समान दशा है?] “त्वं यक्ष्मणा बलवतासि गृहीत इन्दो क्षीणस्तमो न निजदीधितिभिः क्षिणोषि। कच्चिन्मुकुन्दगदितानि यथा वयं त्वं विस्मृत्य भोः स्थगितगीरुपलक्ष्यसे नः॥” ४॥ “हे चन्द्र, तुम क्या प्रबल क्षयरोगसे पीड़ित होकर क्षीण हुए हो और अपनी किरणोंके द्वारा अन्धकारका नाश नहीं कर पा रहे हो? अथवा क्या तुम भी हमारे समान श्रीकृष्णकी समस्त रहस्योक्तियोंको भूलनेके कारण हमें ऐसे प्रतीत हो रहे हो जैसे तुम्हारी वाणी स्तब्ध हो गयी है?”॥ ४॥ अतिशय यक्ष्माक्रान्त, अशक्त नाशिते ध्वान्त, शशधर स्वीय कान्तिबले। किंवा कृष्ण-गाने भ्रान्त, वाक्य-व्यये रह क्षान्त, देखि' मोरा आमादेर दले॥ ४॥ [हे शशधर (चन्द्र)! क्या तुम अतिशय क्षयरोगसे आक्रान्त हो जो अपनी कान्तिके द्वारा अन्धकारका नाश नहीं कर पा रहे हो? अथवा श्रीकृष्णके गानसे भ्रान्त होकर, तुम्हारी वाणी बन्द हो गयी है? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तुम भी हमारे ही दलमें हो।] “किं न्वाचरितमस्माभिर्मलयानल तेऽप्रियम्। गोविन्दापाङ्गनिर्भिन्ने हृदीरयसि नः स्मरम्॥” ५॥ “हे मलय-पवन, हमने तुम्हारा क्या अनिष्ट किया है, जिस कारणसे श्रीकृष्णके कटाक्षपातरूपी बाणके द्वारा हमारा चित्त विदीर्ण होनेपर भी तुम हमारे चित्तमें कामको प्रवृत्त कर रहे हो?”॥ ५॥ आमादेर आचरण, अनुचित कि एमन, शुन, हे मलयसमीरण। गोविन्दकटाक्षबिद्ध, कन्दर्प-प्रेरणे सिद्ध, प्रतिशोधग्रहण-कारण॥ ५॥ [हे मलय-समीर! सुनो, हमने ऐसा कौन-सा अनुचित आचरण किया है, जिसका प्रतिशोध लेनेके लिये तुम गोविन्द-कटाक्षसे बिद्ध हमारे (महिषियोंके) पास कन्दर्पको भेज रहे हो?] “मेघ श्रीमंस्त्वमसि दयितो यादवेंद्रस्य नूनं श्रीवत्साङ्कं वयमिव भवान् ध्यायति प्रेमबद्धः। अत्युत्कण्ठः शबलहृदयोऽस्मद्विधो बाष्पधाराः स्मृत्वा स्मृत्वा विसृजसि मुहुर्दुःखदस्तत्प्रसङ्गः॥” ६॥

472 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/108 ] “हे श्रीमन् जलधर, तुम निश्चय ही लोगोंके तापजनित दुःखको हरण करनेके लिये श्रीकृष्णके सखा हुए हो और उसी कारण उनके प्रेममें आसक्तचित्त होकर हमारे समान श्रीवत्सलाञ्छन श्रीकृष्णको स्मरण करके और निरन्तर स्मरणके कारण हमारे समान मलिनचित्तसे अति उत्कण्ठित भावसे पुनः पुनः धारारूपमें नयनजलराशि विसर्जन कर रहे हो। हाय! तुमने किसलिये उनके साथ सख्य-सम्बन्ध स्थापित किया था? क्योंकि उनका घनिष्ठ सङ्ग अतिशय दुःख प्रदान करता है॥” 6॥ शुन, मेघ, कृष्णमित्र, चिन्तिछ श्रीवत्स-चित्र, प्रेमबद्ध महिषीर न्याय। कृष्णसङ्ग ध्यान करि’, उत्कण्ठाय दुःखे मरि’, सिञ्चितेछ वाष्पधारा-प्राय॥6॥ [हे कृष्णमित्र मेघ! सुनो, क्या तुम भी प्रेममें बद्ध महिषियोंकी भाँति श्रीवत्सादि चिह्नोंसे सुशोभित कृष्णका चिन्तन कर रहे हो? क्या तुम कृष्णके सङ्गका ध्यान करके, उत्कण्ठासे दुःखमें मृतप्राय होनेके कारण ही जलधाराका (अश्रुओंका) विसर्जन कर रहे हो?] “प्रियारावपदानि भाषसे मृतसञ्जीवनिकयानया गिरा। करवाणि किमद्य ते प्रियं वद मे वल्गितकण्ठ कोकिल॥”7॥ “हे रमणीयकण्ठ-कोयल, तुम इस मृतसञ्जीवनी वाक्यसे प्रियम्वद श्रीकृष्णके शब्दके समान मधुर शब्दोंका उच्चारण कर रही हो, इसलिये अब हम तुम्हारा कौनसे प्रिय कार्य साधन करें, यह आदेश करो॥”7॥ सुकण्ठ कोकिल, शुन, अनुकारे सुनिपुण, मृतसञ्जीवनी तव कथा। तव-प्रिय आचरण, महिषीर सुकरण, सेइरूप साधि, बल तथा॥7॥ [हे सुकण्ठी कोयल! तुम (कृष्णकी वाणीका) अनुकरण करनेमें सुनिपुण हो। तुम्हारी वाणी कृष्णके शब्दोंकी भाँति मधुर होनेके कारण मृतसञ्जीवनी स्वरूप है। तुम हमें बतलाओ, हम महिषियाँ तुम्हारा क्या प्रिय कार्य करें, हम वही करेंगी।] “न चलसि न वदस्युरदारबुद्धे क्षितिधर चिन्तयसे महान्तमर्थम्। अपि बत वसुदेवनन्दनाङ्घ्रिं वयमिव कामयसे स्तनैर्विधर्तुम्॥”8॥ “हे महामते पर्वत, जिस कारणसे तुम मौन और निस्पन्दनरूपसे अवस्थान करते हो, उसे विचार करके हमें लगता है कि तुम किसी विशेष प्रयोजनीय विषयमें चिन्ता कर रहे हो। ऐसा होनेपर क्या तुम भी हमारे समान उन्नत स्तन-सदृश शिखरोंके द्वारा श्रीकृष्णके चरणकमलोंको धारण करनेके इच्छुक ऐसा है, तो परिणाममें तुम्हारी भी हमारे समान अवस्था होगी॥”8॥ उदारधी क्षितिधर, अचञ्चल मौनवर, महदर्थ-चिन्ताय मगन। तुमि आमादेर मत, हृदये राखिते व्रत, वसुदेव-तनय-चरण॥8॥ [हे महामति पर्वत! तुम स्थिर और मौन हो, ऐसा प्रतीत होता है कि किसी महद्-अर्थकी चिन्तामें निमग्न हो और तुमने भी हमारी भाँति श्रीवसुदेवनन्दनके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करनेका व्रत लिया है।] “शुष्यद्ध्रदाः कर्शिता बत सिन्धुपत्न्यः सम्प्रत्यपास्तकमलश्रिय इष्टभर्त्तुः। यदद्द्रयं मधुपतेः प्रणयावलोक- मप्राप्य मुष्टहृदयाः पुरुकर्शिताः स्म॥”9॥ “हे सिन्धुपत्नी नदियों, अभी इस ग्रीष्मकालमें प्रियतम समुद्र मेघके द्वारा अमृत वर्षणसे तुम्हें आनन्द प्रदान नहीं कर रहा है। अहो! इसलिये ही हम जिस प्रकार प्रियतम पति श्रीकृष्णकी प्रणयदृष्टिके अभावसे अति क्षीणत्वको प्राप्त हुई हैं, उसी प्रकार तुम्हारा भी चित्त अपहृत होकर ह्रदसमूह शुष्क, कमल-शोभा

[ 19/108-110 उन्नीसवाँ अध्याय 473 दूरीभूत एवं शरीर क्षीणत्वको प्राप्त हुआ है॥”9॥ सिन्धुपत्नी नदी सब, शुष्कनीर देखि' तब, अरविन्द-शोभा नाइ आर। कृशाङ्ग हयेछे तारा, निदाघे आनन्द-हारा, सिन्धुसुख करे ना विस्तार॥ महिषीसकल दीना, शुष्कचित्त तनुक्षीणा, मधुपति-प्रणय-रहित। तोमरा कि सेइमत, तोयहीन शोभा-हत, ताँर प्रेमदृष्टि-विवर्जित??9॥ [हे समुद्रपत्नी नदियों! हम देख रही हैं कि तुम्हारा जल सूख गया है, उसमें कमलोंकी शोभा भी नहीं है, तुम बहुत क्षीण हो गयी हो, तुम्हारा सम्पूर्ण आनन्द दूर हो गया है और समुद्र तुम्हारे सुखका विस्तार नहीं कर रहा है। मधुपतिके प्रणयसे रहित हम महिषियाँ दीन, शुष्क-हृदय और क्षीण-देह हो गयी हैं, क्या तुम्हारी भी इसी प्रकार जलरहित, शोभा-विहीन अवस्था श्रीकृष्णकी प्रेमदृष्टिसे उपेक्षित होनेके कारण तो नहीं है?] “हंस स्वागतमास्यतां पिब पयो ब्रूह्यङ्ग शौरेः कथां दूतं त्वां नु विदाम कच्चिदजितः स्वस्थ्यास्त उक्तं पुरा। किंवा नश्चलसौहृदः स्मरति तं कस्माद्भजामो वयं क्षौद्रालापय कामदं श्रियमृते सैवैकनिष्ठा स्त्रियाम्॥”10॥ “हे हंस, तुम्हारा सुखसे तो आगमन हुआ है ना? अब तुम दुग्ध पान करो और श्रीकृष्णकी वार्त्ता सुनाओ। हम तुम्हें उनका दूत ही जानती हैं। वे क्या सुखसे हैं? हमारे पूर्वकालीन गोपनीय वचन क्या उन्हें स्मरण हैं? हे क्षुद्रके दूत! हम किसलिये उनकी सेवा करेंगी? यदि रतिके लिये वे हमारा आह्वान कर रहे हैं, तो जो लक्ष्मी हमें वञ्चित करके अकेले उनकी सेवा करती हैं, उन लक्ष्मीका त्याग करके केवलमात्र उन कामप्रद प्रियतमको यहाँ लेकर आओ। यदि कहो, लक्ष्मी उनके प्रति एकनिष्ठ चित्तवाली हैं, इसलिये उनका परित्याग असम्भव है, तो क्या स्त्रियोंमें एकमात्र वे ही एकनिष्ठ चित्तवाली हैं, हम क्या वैसी एकनिष्ठ चित्तवाली नहीं हैं?॥”10॥ सुखे आसियाछ, हंस, एस समादरि। कृष्णेर सन्देश बल, दुग्ध पान करि'॥ 'कृष्णदूत' बलि' तोमा मोरा सदा जानि। हरि किछु आमादेर बलियाछे वाणी?? सुखे त' आछेन कृष्ण?—जानिवारे चाइ। आमादेर कथा कि ताँर मने किछु नाइ?? एका लक्ष्मी सेवे ताँरे, आमरा-किङ्करी। अ-कामद-वाक्यव्ययि-जने किसे वरि??10॥ [हे हंस! तुम सुखपूर्वक आये हो ना, आओ, तुम्हारा समादर है। तुम दूध पीकर श्रीकृष्णका सन्देश सुनाओ। हम सदा तुम्हें 'कृष्णदूत'के रूपमें ही जानती हैं। कृष्ण सुखपूर्वक तो हैं ना? क्या हरिने हमारे लिये कुछ कहा है?—हम जानना चाहती हैं। क्या वे हमारे विषयमें कुछ स्मरण नहीं करते हैं? क्या लक्ष्मी अकेले ही उनकी सेवा करती है, हम भी तो उनकी दासियाँ हैं। जो केवल मुखसे ही बोलते हैं, किन्तु कभी हमारी कामनाओंको पूर्ण नहीं करते, हम उन कृष्णको कैसे वरण कर सकती हैं?]॥108॥ उन्नीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। गुरु (श्रीनित्यानन्द)-गौराङ्ग-सेवकोंकी कृपाके बलसे ही महाप्रभुकी अप्राकृत विप्रलम्भमयी लीलामें विश्वासका उदय :— महाप्रभु-नित्यानन्द, दोहार दासेर दास। यारे कृपा करेन, तार हय इथे विश्वास॥109॥ अनुवाद—महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु—इन दोनोंके दासोंके दास जिसपर कृपा करते हैं, उसीका महाप्रभुकी अप्राकृत विप्रलम्भमयी लीलामें विश्वास होता है॥109॥ महाप्रभुके श्रीकृष्णविरहमें उत्पन्न विप्रलम्भ-भावके अनुसरणसे ही अनर्थनिवृत्ति और श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— श्रद्धा करि' शुन इहा, शुनिते महासुख। खण्डिबे आध्यात्मिकादि सकल-दुःख॥110॥ अनुवाद—इन लीलाओंको श्रद्धापूर्वक सुननेसे

474 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/110-112 ] महासुखकी प्राप्ति होती है और आध्यात्मिकादि (त्रितापादि) चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥112॥ दुःखोंका सम्पूर्ण नाश हो जाता है॥110॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे नित्य नवनवायमान हृत्कर्णरसायन श्रीचैतन्यलीलामृत :- विरह-प्रलाप-मुख-सङ्घर्षणादिवर्णनं नाम ऊनविंशः परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृत-नित्य नूतन। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी शुनिते शुनिते जुड़ाय हृदय-श्रवण॥111॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका अनुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृत नित्य नवीन है। इसे वर्णन कर रहा है॥112॥ सुनते-सुनते हृदय और कर्ण शीतल हो जाते हैं॥111॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें विरह-प्रलाप-मुख-सङ्घर्षणादि वर्णन नामक उन्नीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

बीसवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुने दैन्य-उद्वेगादि उत्कण्ठाके साथ शिक्षाष्टकके आस्वादनमें श्रीस्वरूप-रामानन्दके साथ रात्रियाँ व्यतीत कीं। समय-समयपर महाप्रभु (जयदेवके द्वारा रचित) श्रीगीतगोविन्द, श्रीमद्भागवत, (श्रीराय- रामानन्दके द्वारा रचित) श्रीजगन्नाथवल्लभ नाटक, (श्रीबिल्वमङ्गलके द्वारा रचित) श्रीकृष्णकर्णामृतसे श्लोक पाठ करके भावमें आविष्ट हो जाते थे,—आदि इस अध्यायमें वर्णित है। इस प्रकार बारह वर्ष रसास्वादन करते हुए अड़तालीस वर्षकी आयुमें महाप्रभुने लीला समाप्त की, इस बातका ग्रन्थकारने आभास दिया है। इसके बाद उन्होंने अन्त्यलीलाके विवरणका संक्षिप्त अनुवाद देकर इस ग्रन्थको समाप्त किया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) जातप्रेम भक्तोंकी ही महाप्रभुके विप्रलम्भभावके अनुसरणमें योग्यता :— प्रेमोद्भावितहर्षेर्ष्यादैन्यार्त्तिमिश्रितम्। लपितं गौरचन्द्रस्य भाग्यवद्भिनिषेव्यते॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भाग्यवान् व्यक्ति ही श्रीगौरचन्द्रके प्रेममें उत्पन्न हर्ष, ईर्ष्या, उद्वेग, दैन्य और आर्त्तिसे मिश्रित विलापका आस्वादन करते हैं॥१॥ अनुभाष्य— भाग्यवद्भिः (प्रेमसम्युल्लब्धैः महात्मभिः एव) गौरचन्द्रस्य प्रेमोद्भावितहर्षेर्ष्याद्वेगदैन्यार्त्तिमिश्रितं (प्रेम्णः उद्भाविता जाताः चित्तोल्लासासहिष्णुतास्थिरता-निजक्षुद्रमननकातरतादिभावाः ताभिः मिश्रितं) लपितं (प्रलापं) निषेव्यते (आस्वाद्यते)। श्लोक-भावानुवाद—प्रेमसम्पत्ति प्राप्त महात्मागण ही श्रीगौरचन्द्रके प्रेमसे उत्पन्न चित्तमें उल्लास, असहिष्णुता, अस्थिरता, स्वयंको क्षुद्र मानकर कातरतादि भावोंसे मिश्रित प्रलापका आस्वादन करते हैं॥१॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौर भक्तोंकी जय हो॥२॥ पुरीमें निरन्तर विप्रलम्भभावमें व्याकुल महाप्रभु :— एइमत महाप्रभु वैसे नीलाचले। रजनी-दिवसे कृष्ण-विरहे विह्वले॥३॥ महाप्रभुके परमप्रिय अन्तरङ्ग दो नित्य-सङ्गी :— स्वरूप, रामानन्द-एइ दुइजन-सने। रात्रि-दिने रस-गीत-श्लोक आस्वादने॥४॥ आठ सात्त्विक और तैंतीस व्यभिचारी भावोंका उदय :— नाना-भाव उठे प्रभुर-हर्ष, शोक, रोष। दैन्योद्वेगादि, उत्कण्ठा, सन्तोष॥५॥ स्वयं अथवा दो भक्तोंके साथ उन-उन भावोंके उद्दीपक श्लोकोंका पाठ अथवा श्रवण :— सेइ सेइ भावे निज-श्लोक पड़िया। श्लोकेर अर्थ आस्वाद्ये दुइ बन्धु लञा॥६॥ कोन दिने, कोन भावे श्लोक-पठन। सेइ श्लोक आस्वादिते रात्रि-जागरण॥७॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु नीलाचलमें रात-दिन कृष्णविरहमें विह्वल रहते थे। वे रात-दिन श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके साथ (मधुर) रस-सम्बन्धीय गीतों एवं श्लोकोंका आस्वादन करते थे। महाप्रभुमें

476 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/3-12 ] समय-समयपर हर्ष, शोक, रोष, दैन्य, उद्वेग, आर्त्ति, उत्कण्ठा और सन्तोष आदि अनेक भाव उदित होते। वे उन-उन भावोंके अनुरूप स्वरचित श्लोक पढ़ते और अपने इन दो बन्धुओंके साथ उन श्लोकोंके अर्थका आस्वादन करते। किसी दिन किसी भावके श्लोकका पाठ करते और उस श्लोकका आस्वादन करते हुए रात्रि-जागरण हो जाता॥ 3-7॥ महाप्रभुके द्वारा साध्य-साधन अथवा उपेय और उपायके अभेदका वर्णन; सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्कृष्ट चरम अभिधेय अथवा शाब्दिक-अवतार श्रीनाम-कीर्तनके माहात्म्यका वर्णन :- हर्षे प्रभु कहेन,—“शुन, स्वरूप-रामराय। नामसङ्कीर्त्तन—कलौ परम उपाय॥ 8 ॥ श्रीकृष्णकीर्तन करनेवाला ही एकमात्र सुबुद्धिमान् :- सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण-आराधन। सेइ त' सुमेधा पाय कृष्णेर चरण॥ 9 ॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने हर्षित होते हुए कहा,—“हे स्वरूप! हे रामराय! सुनो! नाम-सङ्कीर्तन ही कलियुगमें [परम सिद्धि प्राप्त करनेका] परम उपाय है। कलियुगमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा कृष्णकी आराधना होती है। ऐसा करनेवाला व्यक्ति बहुत बुद्धिमान् है और वह श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति करता है॥ 8-9॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/76-77 संख्या देखें॥ 9 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/32) में— कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः॥ 10 ॥ अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 10 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 10 ॥ शुद्धनामका फल—निःश्रेयस और श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- नामसङ्कीर्त्तने हय सर्वानर्थ-नाश। सर्व-शुभोदय कृष्णे प्रेमेर उल्लास॥ 11 ॥ अनुवाद—नाम-सङ्कीर्तनके द्वारा ही समस्त अनर्थोंका नाश होता है, समस्त शुभ उदित होते हैं और कृष्णसे प्रेममें उल्लास होता है॥ 11 ॥ श्रीमुखनिःसृत श्रीशिक्षाष्टक (अथवा श्रीभागवतका सार); नामाभास और नामका फल :- (पद्यावलीके दशम अङ्कमें उद्धृत शिक्षाष्टकका पहला श्लोक)— चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्। आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनम्॥ 12 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चित्तरूपी दर्पणका मार्जन करनेवाले, भवरूपी महादावाग्निको (भयङ्कर वनकी अग्निको) बुझानेवाले, जीवोंके मङ्गलरूपी कुमुदिनीके [विकासके लिये] भाव-चन्द्रिकाको वितरण करनेवाले, विद्यावधूके जीवन-स्वरूप, आनन्दरूपी समुद्रको वर्धित करनेवाले, पग-पगमें पूर्णामृतास्वादन स्वरूप एवं सर्वस्वरूपको शीतल करनेवाले श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन विशेषरूपसे जययुक्त हों॥ 12 ॥ अनुभाष्य— चेतोदर्पणमार्जनं (चेतः एव दर्पणः आदर्शः तस्य मार्जनं मालिन्यस्य अपाकरणं यस्मात् तत्) भवमहादावाग्निनिर्वापणं (भवः संसारः एव महादावाग्निः तस्य निर्वापणं यस्मात् तत्) श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं (श्रेयांसि एव कैरवाणि कुमुदानि तेषां चन्द्रिका ज्योत्स्ना तस्याः वितरणं यस्मात् तत्) विद्यावधूजीवनं (विद्या एव वधूः पत्नी तस्याः जीवनं प्राणधारणं यस्मात् तत्) आनन्दाम्बुधिवर्धनं (आनन्दः प्रेमा एव अम्बुधिः समुद्रः तस्य वर्धनं यस्मात् तत्) प्रतिपदं (प्रतिक्षणं) पूर्णामृतास्वादनं (पूर्णामृतस्य आस्वादनं यस्मात् तत्) सर्वात्मस्नपनं (सर्वेषाम् आत्मनां

[ 20/12-19 बीसवाँ अध्याय 477

सर्वतोभावेन आत्मनो वा स्नपनं यस्मात् तत्) परं (केवलमद्वितीयं) श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनं विजयते (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार नाशन। चित्तशुद्धि, सर्वभक्तिसाधन-उद्गम॥ 13॥ कृष्णप्रेमोद्गम, प्रेमामृत-आस्वादन। कृष्णप्राप्ति, सेवामृत-समुद्रे मज्जन॥"14॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनसे जन्म-जन्मान्तरके पाप और उससे प्राप्त पुनः-पुनः जन्म-मृत्युरूप संसारका नाश, अनर्थ-निवृत्तिसे चित्त-शुद्धि, भक्तिके सभी साधनोंका उदय, कृष्णप्रेमका उदय और प्रेमामृतका रसास्वादन, श्रीकृष्ण-प्राप्ति और अन्तमें सेवामृतरूपी समुद्रमें निमज्जित हो जाना होता है॥ 13-14॥ अशोक, अभय, अमृतका आधार श्रीनाम :- उठिल विषाद, दैन्य, पड़े आपन-श्लोक। याहार अर्थ शुनि' सब याय दुःख-शोक॥ 15॥ अनुवाद-यह कहते हुए महाप्रभुमें विषाद और दैन्य उत्पन्न हो आया और वे स्वरचित एक श्लोक पढ़ने लगे, जिसके अर्थको सुनकर समस्त दुःख और शोक दूर हो जाते हैं॥ 15॥ नामसाधनके सुलभ होनेका कारण अथवा श्रीकृष्णकी महावदान्यता; दुर्देवरूपी अपराधमयी अवस्थामें जीवके द्वारा शुद्धनामके उच्चारणका अभाव :- (पद्यावलीके 19वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका दूसरा श्लोक) “नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति- स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः। एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्देवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥ 16॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥

अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन्, आपका नाम ही जीवोंके समस्त मङ्गलका विधान करता है, इसलिये अपने 'कृष्ण', 'गोविन्द' आदि अनेक नामोंका आपने विस्तार किया है। उन नामोंमें आपने अपनी समस्त शक्ति अर्पित की है और आपने उन नामोंके स्मरणमें कालादिका भी नियम (विधि अथवा विचार) नहीं रखा। हे प्रभो, जीवोंके प्रति ऐसी कृपा करके आपने अपने नामको सुलभ बनाया है, तथापि मेरे नामापराधरुपी दुर्भाग्यने ऐसा किया है कि वह आपके सुलभ नाममें भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं होने देता॥ 16॥ अनुभाष्य- हे भगवन्, (प्रभो कृष्ण,) [भवता अहैतुक्या कृपया] नाम्नां बहुधा (बहुप्रकारः) अकारि (प्रकटितवान्) तत्र (नाम्नि) निजसर्वशक्तिः (आत्मनः अनन्ता शक्तिः) अर्पिता (निहिता), [अतः तस्य] स्मरणे कालः अपि न नियमितः (न विहितः, अपेक्षितः; सर्वकालेऽपि न कोऽपि विधिः)-तव एतादृशी कृपा; [किन्तु तथापि] मम अपि ईदृशं दुर्देवं यत् इह (नाम्नि) अनुरागः न अजनि (न जातः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- अनेक लोकेर वाञ्छा अनेक प्रकार। कृपाते करिल अनेक-नामेर प्रचार॥ 17॥ खाइते शुइते यथा तथा नाम लय। काल, देश, नियम नाहि, सर्वसिद्धि हय॥ 18॥ सर्वशक्ति नामे दिला करिया विभाग। आमार दुर्देव, —नामे नाहि अनुराग॥ 19॥ अनुवाद-इस जगत्में लोगोंके हृदयमें नाना प्रकारकी कामनाएँ रहती हैं, इसलिये हे भगवन्! आपने कृपा करके अपने अनेक नामोंको प्रकटित किया है। उन नामोंके उच्चारण करनेमें देश, काल और पात्रादिका कोई विशेष नियम भी नहीं रखा है। खाते-पीते-सोते समयमें जिस किसी प्रकारसे भी श्रीकृष्णनाम करनेसे

478 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/17-21 ] सर्वसिद्धि होती है। अहो, श्रीकृष्णने अपने उन नामोंमें अपनी सारी शक्तियोंको भर दिया है। किन्तु मेरा दुर्भाग्य है कि ऐसे श्रीकृष्णनाममें मेरा तनिक भी अनुराग नहीं है॥ 17-19 ॥ प्रेमप्राप्तिके लिये नामकीर्तनके लक्षणोंका वर्णन :- येरूपे लइले नाम, प्रेम उपजाय। तार लक्षण-श्लोक शुन, स्वरूप-रामराय ॥ 20 ॥ अनुवाद - 'हे स्वरूप ! हे रामराय ! जिस प्रकारसे नाम ग्रहण करनेसे प्रेम उत्पन्न होता है, उसके लक्षणोंको इस श्लोकमें सुनो ॥ 20 ॥ साध्यनाम-प्रेमको प्राप्त करनेके लिये नामसाधनकी प्रणाली अथवा समस्त अपराधमूलक देहात्मबुद्धिका निषेध और नामको निरन्तर करनेकी विधि :- (पद्यावलीके 20 वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका तीसरा श्लोक)- तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ॥ 21 ॥ अनुवाद - जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्तन करनेके अधिकारी हैं॥ 21 ॥ अनुभाष्य - आदिलीला 17/31 संख्या देखें ॥ 21 ॥ अमृताणुकणा-श्रीगौरसुन्दरके मुख-निस्रुत उपदेश अथवा शिक्षाष्टक ब्रह्मसूत्र और श्रुतिमन्त्रसमूहके पल्लवित, मञ्जरित और पुष्पित फलोंका उद्यान है। विचारणीय शिक्षाश्लोकका प्रथम पाद 'तृणादपि सुनीचेन' महावाक्य “अहं ब्रह्मास्मि"-श्रुतिमन्त्रके वास्तविक तात्पर्यका ही ज्ञापन करता है। यद्यपि “अहं ब्रह्मास्मि” और 'तृणादपि सुनीचेन' इन दो वाक्योंके मध्यमें परस्पर आपात विरोध दिखलायी देता है, तथापि उनमें अति सुन्दर समन्वय श्रीरूपानुग गौरजनोंकी कृपासे देखा जा सकता है। 'तृणादपि सुनीचेन' अर्थात् “अहं गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः” – यह विज्ञान ही स्वरूपज्ञान अथवा सम्बन्ध-ज्ञान है, वही 'अहं ब्रह्मास्मि' मन्त्रका परिस्फुट तात्पर्य है। मैं मायाशक्तिसे उत्पन्न जड़वस्तु नहीं हूँ, जड़का भोक्ता नहीं हूँ, मैं चेतन हूँ-मैं स्वरूपसे पूर्णचेतनकी ही आलिङ्गित वस्तु-उनकी क्रोड़ीभूत वस्तु हूँ। जड़ वस्तुओंमें सबकी अपेक्षा क्षुद्र-अभिमान जो तृणके भीतर सदा रहता है, मैं वह भी नहीं हूँ, तथापि मैं केशके अग्रभागके दस हजारवें भागरूप अणुचेतनमय स्वरूपको पृथक् करके रखूँगा, जिसके द्वारा जड़के साथ समन्वय-चेष्टा कभी भी ना घटित हो। श्रुतियोंने भूत-शुद्धिके लिये जो “अहं ब्रह्मास्मि" मन्त्र सिखलाया है, उसने ही 'तृणादपि सुनीचेन' महावाक्यसे सौन्दर्य प्राप्त किया है। उक्त श्लोकके दूसरे पादका 'तरोरपि सहिष्णुना' महावाक्य “तत्त्वमसि श्वेतकेतो” (छाः 6/8/7) अर्थात् 'हे श्वेतकेतो, तुम वही हो'-यह श्रुति मन्त्रका परिव्यक्त रूप है। जो परब्रह्मकी वस्तु या जो परब्रह्म-जातीय वस्तु है, वह पार्थिव किसी क्षुद्र अवास्तव-वस्तुसे असहिष्णु नहीं हो सकता। जड़वस्तु जड़के द्वारा क्षुब्ध और लुब्ध होती है, तभी उसमें असहिष्णुता आ जाती है। और चेतन वस्तु जड़से कुछ भी प्रतिदान नहीं चाहती, केवल चेतनके निकट पुनः पुनः चेतनकी वार्त्ताको ही वहन करती है। शिक्षा श्लोकके तीसरे पादमें “अमानिना मानदेन", “सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छाः 3/14/1), “नेह नानास्ति किञ्चन” (बृः 4/4/19, कठ 2/1/11) अर्थात् परिदृश्यमान जगत् समस्त ही ब्रह्मसे अभिन्न है, ब्रह्मस्वरूपमें कोई जड़़ीय भेद नहीं है-यही श्रुतिमन्त्रका ही परिवर्धित रूप है। जो समस्त वस्तुओंमें परब्रह्मका अधिष्ठान दर्शन करते हैं- “वासुदेवः सर्वमिति” (गीता 7/19), जो ब्रह्मस्वरूपमें जड़भेद दर्शन नहीं करते हैं, वे सभी

[ 20/21 बीसवाँ अध्याय 479

प्रकारसे सर्वत्र अमानी और मानदानकारी हो सकते हैं। चौथे-पादके “कीर्त्तनीयः सदा हरिः” महावाक्यने “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐत: 1/5/3) अर्थात् प्रेमभक्ति अप्राकृत ब्रह्मस्वरूप है—इस श्रुतिमन्त्रको पुष्पित किया है और ब्रह्मसूत्रके फलाध्यायके 'उपक्रम'-सूत्र “आवृत्तिरसकृदुपदेशात्” से 'उपसंहार'-सूत्र “अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्”—इस ब्रह्मसूत्रसमूहकी सार्थकताको सम्पादित किया है। “प्रज्ञानं ब्रह्म”-हरिकीर्त्तन ही वास्तवमें सत्य प्रज्ञा है, क्योंकि हरि और हरिकीर्त्तन दोनों ही अभिन्न, अप्राकृत ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्रह्मसूत्रके अकृत्रिम भाष्य श्रीद्भागवतमें कहा है,—“यज्ञैः सङ्कीर्त्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥”(भाः 11/5/32)—जो सङ्कीर्त्तनात्मक यज्ञके द्वारा “महान् प्रभुर्वैः पुरुषः”—इस श्रुतिके प्रतिपाद्य रुक्मवर्ण परब्रह्मकी उपासना करते हैं, वे ही वास्तव विचारसे सुमेधा—बुद्धिमान हैं। “आवृत्तिरसकृदुपदेशात्”—श्रीभगवन्नाम-रूप शब्दब्रह्मकी आराधना—'असकृत्' अर्थात् बार-बार 'आवृत्ति' और कीर्त्तनके द्वारा ही करनी होगी, क्योंकि समस्त शास्त्रोंमें वही उपदिष्ट हुआ है। इस ब्रह्मसूत्रकी व्याख्यामें आचार्य शङ्कर जो कहते हैं, उसका मर्मार्थ यह है—“आत्मा वा अरे दृष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (बृःआः 4/5/6), “तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” (बृःआः 4/4/21) आदि श्रुतिओंमें यह सन्देह उपस्थित होता है कि आत्मविषयक अनुशीलनादि एक बार ही करना होगा, अथवा पुनः पुनः करना होगा? किसी किसी अनुष्ठानका एकबार पालन करनेसे ही शास्त्रार्थका पालन हो जाता है, पुनः पुनः पालन करना अनर्थक होता है, अपितु पुनः पुनः पालन करनेसे शास्त्रके उल्लङ्घनरूपी दोषकी ही सम्भावना होती है। इस प्रकार एक बार श्रवणादि करनेपर उसे बार-बार नहीं करना होगा—यही क्या शास्त्रका उद्देश्य है? नहीं, जैसे, जब तक धानमें-से चावल बाहर नहीं हो, तब तक मूसलसे पीटना चाहिये। उसी प्रकार जब तक आत्मदर्शन ना हो, तब तक बार-बार श्रवण करना होगा। शिष्य गुरुकी उपासना करते हैं, प्रार्थी राजाकी चिन्ता करते हैं, विरहिणी स्त्री पतिका ध्यान करती है आदि स्थानोंमें 'उपासना', 'चिन्ता', 'ध्यान' आदि शब्दोंमें एक ही विषयका बार-बार संघटन ही लक्षित हुआ है। यदि कोई प्रोषितभर्तृकाको प्रतिक्षण उत्कण्ठाके सहित पतिकी चिन्ता करते देखे, तभी कहा जाता है—'अमुक स्त्री पतिकी चिन्ता कर रही है।' इन सब कारणोंसे वेद भी 'उपासितव्य' आदि शब्दसे एकबार मात्र उपासनाका उपदेश नहीं करते हैं। कोई पूर्वपक्ष करके कह सकते हैं,—जो शास्त्र, जो युक्ति अथवा जो उपदेश एक बार प्रयोगमें विशेष ज्ञानको उत्पन्न नहीं करता है, वह सौ बार प्रयोग करनेसे ज्ञानको उत्पन्न करेगा, उसका क्या आश्वासन है? सूत्रकार परवर्ती “लिङ्गाच्च” सूत्रमें उसको निरस्त करते हुए कहते हैं,—छांदोग्योपनिषदमें श्वेतकेतुके पिताने श्वेतकेतुको बार-बार उपदेश किया था, तभी श्वेतकेतु उसके फलको प्राप्त कर सके थे। अनेक बार देखा जाता है, एकबार सुनकर उसे सम्पूर्णरूपमें समझनेमें असमर्थ होनेपर लोग अन्य बार सुननेपर उसे समझ सकते हैं। क्योंकि वाक्यके अर्थका बोध पदार्थके बोधसे पहले ही उत्पन्न होता है। पदार्थका विज्ञान नहीं होनेपर वाक्यके अर्थका ज्ञान भी प्राप्त नहीं होता है। इसी पदार्थके विज्ञानकी उत्पत्तिके लिये ही बार-बार आवृत्ति आवश्यक है। श्रीगीतामें भी देखा जाता है,—“सततं कीर्त्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।” (गीता 9/14)। “मच्चित्ता मद्गतप्राणाः ×× कथयन्तश्च मां नित्यम्।” (गीता 10/9) आदि। आचार्य शङ्करने जो प्रोषित-नामक विरहिणीकी उत्कण्ठामयी आवृत्तिका उदाहरण दिया है, वह भगवान्

480 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/21–26 ] श्रीगौड़सुन्दरके शिक्षाष्टककी शिक्षामें बड़े सुन्दररूपसे संरक्षित है। प्रोषितभर्तृका पतिको सामने पानेपर भी अर्थात् सम्भोगके मध्यमें भी विप्रलम्भमें विभावित रहती है। यही विप्रलम्भ सम्भोगको परिपुष्ट करता है और सम्भोग विप्रलम्भकी और अधिक उद्दीपना करवाकर पतिकी स्मृतिको निरन्तर बनाये रखता है। उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता-फल, अर्थवाद और उपपत्ति देखकर शास्त्रके तात्पर्यका निर्णय करना होता है। उसके अनुसारसे ब्रह्मसूत्रमें फलाध्यायके भी तात्पर्यका निर्णय किया जा सकता है। उसकी प्रवृत्ति या उपक्रमके द्वारा 'आवृत्ति'-शब्द और निवृत्ति या उपसंहारके द्वारा 'अनावृत्ति'-शब्दका प्रयोग किया है—अर्थात् जो अभिधेय पराविद्याकी बार-बार आवृत्ति करेंगे, तभी ही अनावृत्ति सम्भव है, किसी और उपायसे वह सम्भव नहीं है। आवृत्ति एक बार अथवा स्तब्ध होनेपर जगत्में बार-बार आवृत्ति होगी—अनावृत्ति या अनर्थ-निवृत्ति सम्भव नहीं होगी। तभी उपसंहार-सूत्रमें अनावृत्तिकी बात कहनेपर भी आप उपदेशकी एकसे अधिक बार आवृत्ति कर रहे हैं अर्थात् “अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्”—इस प्रकार एकसे अधिक बार कहते हुए “कीर्त्तनीयः सदा हरिः—इस भगवत्-मुखसे निकले वाक्यकी प्रतिष्ठा की है—(‘‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्’’— गौड़ीय, 12वाँ खण्ड)। इस प्रसङ्गमें श्रीचैतन्यमहाप्रभुके श्रीशिक्षाष्टकका आश्रय करके श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिसे प्रकाशित श्रीश्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुर-कृत 'सन्मोदिनी-भाष्य', उक्त भाषाका बङ्गला अनुवाद और श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद-कृत 'विवृति'-युक्त 'श्रीचैतन्य-शिक्षाष्टक'-ग्रन्थ देखें॥ 21 ॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :— उत्तम हञा आपनाके माने तृणाधम। दुइ प्रकारे सहिष्णुता करे वृक्षसम ॥ 22 ॥ वृक्ष येन काटिलेह किछु ना बोलय। शुकाञा मैलह कारे पानी ना मागय ॥ 23 ॥ येइ ये मागये, तारे देय आपन-धन। घर्म-वृष्टि सहे, आनेर करये रक्षण ॥ 24 ॥ सर्वत्र श्रीकृष्णदर्शनरूपी सम्बन्धज्ञानसे युक्त नाम-साधनसे प्रेम-प्राप्ति :— उत्तम हञा वैष्णव हबे निरभिमान। जीवे सम्मान दिबे जानि 'कृष्ण'-अधिष्ठान ॥ 25 ॥ एमत हञा येइ कृष्णनाम लय। श्रीकृष्णचरणे ताँर प्रेम उपजाय ॥” 26 ॥ अनुवाद—उत्तम होनेपर भी जो अपनेको तुच्छ तृणसे भी अधिक क्षुद्र समझता है, जो वृक्षकी भाँति दो प्रकारसे सहनशील होता है—जैसे (1) वृक्ष काटे जानेपर भी कुछ भी नहीं कहता, सूखकर मर जानेपर भी किसीसे पानी नहीं माँगता, माँगनेवाला जो कुछ भी माँगता है, उसको अपना धन (फल, फूल, लकड़ी, छाल, रसादि सब कुछ) दे देता है, (2) स्वयं धूप और वर्षाको सहता हुआ भी दूसरोंकी धूप और वर्षासे रक्षा करता है; वैष्णव उत्तम होकर भी निरभिमानी होगा और जीवमात्रमें कृष्णका अधिष्ठान जानकर सबको यथायोग्य सम्मान देगा—इस प्रकार जो श्रीकृष्णनामका कीर्तन करता है उसका ही श्रीकृष्णचरणकमलोंमें प्रेम उत्पन्न होता है॥” 22-26 ॥ अमृताणुकणिका—मेरे हृदयमें जिस प्रकार भगवान् विराजमान हैं, वृक्ष-लता, हाथी-चींटी, धार्मिक-अधार्मिक, नर-नारी, सत्-असत्, पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग—सभीमें उसी प्रकार भगवान् अधिष्ठित हैं—साधु-गुरु-कृपासे इसकी उपलब्धि करके अपने समान दूसरोंके मङ्गल-अनुसन्धानको ही वास्तविक साधन कहते हैं। इसकी परिणतिको ही महाजन समदर्शन कहते हैं। प्रत्येक जीवके प्रति सहानुभूति-सम्पन्न होना होगा।

[ 20/25 बीसवाँ अध्याय 481

अपने समान दूसरोंका उपकार करना होगा। तथापि नामाश्रित भगवद्भक्तका अधिक आदर करना होगा और अन्य जीवोंके प्रति यथायोग्य सम्मान प्रदर्शन करना विशेष कर्तव्य है। भगवान् कपिलदेवने देवहूति माताको कहा (भाः 3/29/34)— “मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहुमानयन्। ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति॥” “श्रीविष्णु अन्तर्यामी ईश्वररूपसे सभी जीवोंमें अवस्थित हैं, यह निश्चय करके हृदयसे सभी प्राणियोंका सम्मान करते हुए उन्हें प्रणाम करना चाहिये।” श्रीकृष्णका उद्ध्वजीके प्रति वचन (भाः 11/29/16)— “विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीड़ां च दैहिकीम्। प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥” “निजबन्धुगण भी यदि उपहास करें तो भी उसकी ओर ध्यान न दें और देह-विषयमें उच्च-नीच और लज्जाको त्यागकर कुत्ते-चण्डाल-गधे आदि सभी प्राणियोंमें भगवान्‌का अधिष्ठान जानकर उनको दण्डवत् प्रणाम करके सम्मान करना चाहिये।” जो कनिष्ठ अधिकारी लौकिक श्रद्धायुक्त होकर अर्चन और नाम करते हैं, उन्हें सभी जीवोंका अवश्य ही आदर करना चाहिये—यह उनके पक्षमें विधि है। इस विधिका उल्लङ्घन करनेसे उनका कभी भी मङ्गल नहीं होगा। जो दृढ़ श्रद्धावान् हैं, उनको सर्वत्र ही इष्टकी स्फूर्ति होनेपर वे सभी व्यक्तियों या वस्तुओंको भगवान्‌से युक्त दर्शन करते हैं। जो इस प्रकार जगत्‌को जगदीशके सेवा-उपकरणके रूपमें जानते हैं, वे सभी वस्तुओंकी गुरु जानकर सेवापूजा करते हैं। जो सेवक हैं, उनकी दृष्टि सर्वत्र ही सेव्यके सम्पर्कमें होती है। किन्तु भगवद्भक्त कभी भी जीवका आदर उनको ईश्वर मानकर नहीं करते हैं, क्योंकि मायावश योग्य जीव कभी भी मायाधीश ईश्वर नहीं हो सकता। श्रील जीव गोस्वामीने भक्ति-सन्दर्भमें बतलाया है—

“परमसिद्धानाञ्च ‘सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः' (भाः 11/2/45) इत्याद्यनुसारेण सिद्ध एव सः। तत्र साधकानां यत्तु ‘यथा तरोर्मूलनिषेचनेन' (भाः 4/31/14) इत्यादौ तदान्योपासनानां पुनरुक्तत्वमुपलभ्यते, तत् पुनः केवलस्वतन्त्र-तत्तद्दृष्ट्योपासनानामेव। अत्र तु तत्तदधिष्ठानक- भगवदुपासनमेव विधीयते। तदादरावश्यकत्वञ्च तत्सम्बन्धेनैव सम्पद्यते। तच्चान्यत्र झटिति रागद्वेषनिवृत्त्यर्थमिति ज्ञेयम्। अतएव केवलभूतानुकम्पया श्रीभगवदर्चनं त्यक्तवतो भरतस्यान्तरायः। तस्माद्भूतदयैव भगवद्भक्तिर्मुख्या नार्चनमिति निरस्तम्।” अर्थात् “जो देहाभिमान त्यागकर श्रीकृष्णमें अनुरक्त होकर परमहंस अवस्था लाभ करते हैं, उनमें निर्मत्सरता और सभी भूतोंमें आदरका स्वाभाविक धर्म होता है। क्योंकि (भाः 11/2/45)—‘जो सभी भूतोंमें बहिर्दृष्टि त्यागकर आत्मामें चिद्विलास श्रीभगवान्‌का आविर्भाव और आत्मस्वरूप श्रीहरिमें चिद्विलासके उपकरणसमूहका दर्शन करते हैं, वे ही भागवतोत्तम हैं।' यदि कहें कि ‘वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे जिस प्रकार उसका तना, शाखाएँ, उपशाखाएँ सभी तृप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अच्युतकी सेवासे सभी भूतोंकी पूजा हो जाती है, इसलिये पृथक् रूपसे अन्यान्य प्राणियोंके प्रति आदर करनेका प्रयोजन नहीं है'—तो यहाँ वक्तव्य इस प्रकार है—अन्यान्य प्राणियोंमें अन्तर्यामी ईश्वर रूपमें अधिष्ठित भगवान्‌की ही उपासना विहित हुई है और भगवद्-सम्बन्धसे ही अर्थात् अपने उपास्य हरिसम्बन्धी वस्तुज्ञानसे ही उन सभी प्राणियोंके प्रति आदर करना एकान्त कर्त्तव्य है। अपने अतिरिक्त अन्यान्य प्राणियोंमें शीघ्र ही राग-द्वेषकी निवृत्ति हो, उसके निमित्त ही सभीका आदर करना विहित हुआ है। अतएव केवल कर्मादि कामनामय जीव-दया या जीवके आदरके वशीभूत होकर श्रीभगवान्‌के अर्चनको त्यागनेसे जो भीषण दुर्गति होती है, उसे प्रेमिक भक्तवर

482 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/25-29 ] जड़भरतने हिरन-देह प्राप्त करनेके अभिनयके द्वारा हमें शिक्षा दी है। जड़भरत प्रेमिक भक्त थे, उनके पतन या भगवद्-प्राप्तिमें बाधा नहीं आ सकती। किन्तु भगवद्भक्त भी यदि केवलमात्र प्राणियोंकी बहिर्मुख देहके प्रति आसक्तिके द्वारा कर्मकाण्डीय विचारका अनुसरण करके किसीकी दैहिक और मानसिक प्रीति विधानमें व्यस्त हों और उसके लिये श्रीभगवान्‌की सेवामें शिथिलता प्रदर्शन करें, अथवा बहिर्मुख जीव-सेवाको अप्राकृत श्रीभगवद्-सेवा कहकर कल्पना करें, तब उनके लिये बन्धन अनिवार्य है। जब इस प्रकारसे अन्योंका आदर करनेपर भी भक्तिहीन होनेपर पतन अवश्यम्भावी है, तो अन्योंकी निन्दा करनेकी तो बात ही नहीं है।"—"त्रिदण्डीस्वामी श्रीभक्तिमयूख भागवत महाराज, श्रीगौड़ीय-पत्रिका वर्ष 1952-1953" ॥ 25 ॥ शुद्धा अधोक्षज-श्रीकृष्णभक्तिकी कामना :- कहिते कहिते प्रभुर दैन्य बाड़िला। 'शुद्धभक्ति' कृष्ण-ठाञि मागिते लागिला ॥ 27 ॥ अनुवाद—ऐसा कहते-कहते महाप्रभुका दैन्य वर्धित हो गया और वे श्रीकृष्णसे 'शुद्धभक्ति' माँगने लगे ॥ 27 ॥ प्रेमीभक्तोंके लक्षण अथवा स्वभाव :- प्रेमेर स्वभाव, याँहा प्रेमेर सम्बन्ध। सेइ माने, -'कृष्णे मोर नाहि भक्तिगन्ध' ॥ 28 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमका यह एक स्वभाव है कि जिस व्यक्तिमें प्रेमका वास्तविक सम्बन्ध हुआ है, वह दीनतापूर्वक यह मानता है, - 'मुझमें कृष्णके प्रति भक्तिकी गन्ध भी नहीं है।' ॥ 28 ॥ अनुभाष्य—जो-प्रेमधनसे दरिद्र हैं, वे कपटता-वशतः प्रेम प्राप्त नहीं करनेपर भी जगत्के सामने अपनी प्रेम प्राप्तिकी बातका मिथ्या प्रचार करते हैं। वास्तवमें लोगोंके सामने बाह्य-प्रकाश अथवा घोषणाके द्वारा कपटी, कृष्णप्रेमत्सम्पत्तिहीन दरिद्रोंकी प्रेम प्राप्तिकी सम्भावना ही नहीं है। प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदाय अपने सौभाग्यका ज्ञापन करनेके लिये कपटताका आश्रय करके अनेक समय बाह्य-प्रेमके चिह्न परस्परमें प्रकाशित करते हैं। शुद्धभक्तगण ऐसे कपट सहजियाओंको 'प्रेमिक' कहनेकी बात तो दूर रहे, उनके सङ्ग तकको भक्तिके नाशका कारण जानकर उसका वर्जन करते हैं और कपटतापूर्वक उन्हें 'भक्त' कहकर शुद्धभक्तोंके समान माननेका उपदेश भी नहीं देते। यथार्थ प्रेमके उदित होनेपर, जीव अपनी महिमाको छिपाकर कृष्णभजनके लिये ही प्रयास करता है। कपटी प्राकृत-सहजिया लोग कनक-कामिनी- प्रतिष्ठादिके लोभसे शुद्धभक्तोंको 'दार्शनिक पण्डितप्रवर', 'तत्त्ववित्', 'सूक्ष्मदर्शी' आदि संज्ञाओंसे तिरस्कृत करके स्वयंको 'रसिक', 'भजनानन्दी', 'भागवतोत्तम', 'लीलारस-पानमें उन्मत्त', 'रागानुगीय-साधकोंमें अग्रगणी', 'रसज्ञ', 'रसिकचूड़ामणि' आदि भूषणोंसे अलंकृत करते हैं। वास्तवमें वे अपने-अपने चित्तके प्राकृत-भावरङ्गसे भजन-प्रणालीको कलुषित करके दुष्क्रियाओंमें आसक्त होकर स्वयंकी मिथ्या-वैष्णवताका ही बहुत आदर करते हैं। इस श्रेणीके लेखक अप्राकृत-रसकी बात लिखते हुए अपने-अपने प्राकृत भावोंको कृष्णसेवाके अङ्गीभूत करते हैं। वे अप्राकृत विप्रलम्भ-रसके स्वरूपको नहीं जानकर विरससे युक्त प्राकृत-सम्भोगको ही 'रस' समझते हैं ॥ 28 ॥ निष्कपट साधकके द्वारा एकमात्र नित्य और शुद्ध काम्य 'शुद्धभक्तिका स्वरूप' :- (पद्यावलीके 85वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका चौथा श्लोक) - "न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥ 29 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे जगदीश, मैं धन, जन