श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें482 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/25-29 ] जड़भरतने हिरन-देह प्राप्त करनेके अभिनयके द्वारा हमें शिक्षा दी है। जड़भरत प्रेमिक भक्त थे, उनके पतन या भगवद्-प्राप्तिमें बाधा नहीं आ सकती। किन्तु भगवद्भक्त भी यदि केवलमात्र प्राणियोंकी बहिर्मुख देहके प्रति आसक्तिके द्वारा कर्मकाण्डीय विचारका अनुसरण करके किसीकी दैहिक और मानसिक प्रीति विधानमें व्यस्त हों और उसके लिये श्रीभगवान्की सेवामें शिथिलता प्रदर्शन करें, अथवा बहिर्मुख जीव-सेवाको अप्राकृत श्रीभगवद्-सेवा कहकर कल्पना करें, तब उनके लिये बन्धन अनिवार्य है। जब इस प्रकारसे अन्योंका आदर करनेपर भी भक्तिहीन होनेपर पतन अवश्यम्भावी है, तो अन्योंकी निन्दा करनेकी तो बात ही नहीं है।"—"त्रिदण्डीस्वामी श्रीभक्तिमयूख भागवत महाराज, श्रीगौड़ीय-पत्रिका वर्ष 1952-1953" ॥ 25 ॥ शुद्धा अधोक्षज-श्रीकृष्णभक्तिकी कामना :- कहिते कहिते प्रभुर दैन्य बाड़िला। 'शुद्धभक्ति' कृष्ण-ठाञि मागिते लागिला ॥ 27 ॥ अनुवाद—ऐसा कहते-कहते महाप्रभुका दैन्य वर्धित हो गया और वे श्रीकृष्णसे 'शुद्धभक्ति' माँगने लगे ॥ 27 ॥ प्रेमीभक्तोंके लक्षण अथवा स्वभाव :- प्रेमेर स्वभाव, याँहा प्रेमेर सम्बन्ध। सेइ माने, -'कृष्णे मोर नाहि भक्तिगन्ध' ॥ 28 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमका यह एक स्वभाव है कि जिस व्यक्तिमें प्रेमका वास्तविक सम्बन्ध हुआ है, वह दीनतापूर्वक यह मानता है, - 'मुझमें कृष्णके प्रति भक्तिकी गन्ध भी नहीं है।' ॥ 28 ॥ अनुभाष्य—जो-प्रेमधनसे दरिद्र हैं, वे कपटता-वशतः प्रेम प्राप्त नहीं करनेपर भी जगत्के सामने अपनी प्रेम प्राप्तिकी बातका मिथ्या प्रचार करते हैं। वास्तवमें लोगोंके सामने बाह्य-प्रकाश अथवा घोषणाके द्वारा कपटी, कृष्णप्रेमत्सम्पत्तिहीन दरिद्रोंकी प्रेम प्राप्तिकी सम्भावना ही नहीं है। प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदाय अपने सौभाग्यका ज्ञापन करनेके लिये कपटताका आश्रय करके अनेक समय बाह्य-प्रेमके चिह्न परस्परमें प्रकाशित करते हैं। शुद्धभक्तगण ऐसे कपट सहजियाओंको 'प्रेमिक' कहनेकी बात तो दूर रहे, उनके सङ्ग तकको भक्तिके नाशका कारण जानकर उसका वर्जन करते हैं और कपटतापूर्वक उन्हें 'भक्त' कहकर शुद्धभक्तोंके समान माननेका उपदेश भी नहीं देते। यथार्थ प्रेमके उदित होनेपर, जीव अपनी महिमाको छिपाकर कृष्णभजनके लिये ही प्रयास करता है। कपटी प्राकृत-सहजिया लोग कनक-कामिनी- प्रतिष्ठादिके लोभसे शुद्धभक्तोंको 'दार्शनिक पण्डितप्रवर', 'तत्त्ववित्', 'सूक्ष्मदर्शी' आदि संज्ञाओंसे तिरस्कृत करके स्वयंको 'रसिक', 'भजनानन्दी', 'भागवतोत्तम', 'लीलारस-पानमें उन्मत्त', 'रागानुगीय-साधकोंमें अग्रगणी', 'रसज्ञ', 'रसिकचूड़ामणि' आदि भूषणोंसे अलंकृत करते हैं। वास्तवमें वे अपने-अपने चित्तके प्राकृत-भावरङ्गसे भजन-प्रणालीको कलुषित करके दुष्क्रियाओंमें आसक्त होकर स्वयंकी मिथ्या-वैष्णवताका ही बहुत आदर करते हैं। इस श्रेणीके लेखक अप्राकृत-रसकी बात लिखते हुए अपने-अपने प्राकृत भावोंको कृष्णसेवाके अङ्गीभूत करते हैं। वे अप्राकृत विप्रलम्भ-रसके स्वरूपको नहीं जानकर विरससे युक्त प्राकृत-सम्भोगको ही 'रस' समझते हैं ॥ 28 ॥ निष्कपट साधकके द्वारा एकमात्र नित्य और शुद्ध काम्य 'शुद्धभक्तिका स्वरूप' :- (पद्यावलीके 85वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका चौथा श्लोक) - "न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥ 29 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे जगदीश, मैं धन, जन