भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2498

[ 20/25 बीसवाँ अध्याय 481

अपने समान दूसरोंका उपकार करना होगा। तथापि नामाश्रित भगवद्भक्तका अधिक आदर करना होगा और अन्य जीवोंके प्रति यथायोग्य सम्मान प्रदर्शन करना विशेष कर्तव्य है। भगवान् कपिलदेवने देवहूति माताको कहा (भाः 3/29/34)— “मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहुमानयन्। ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति॥” “श्रीविष्णु अन्तर्यामी ईश्वररूपसे सभी जीवोंमें अवस्थित हैं, यह निश्चय करके हृदयसे सभी प्राणियोंका सम्मान करते हुए उन्हें प्रणाम करना चाहिये।” श्रीकृष्णका उद्ध्वजीके प्रति वचन (भाः 11/29/16)— “विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीड़ां च दैहिकीम्। प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥” “निजबन्धुगण भी यदि उपहास करें तो भी उसकी ओर ध्यान न दें और देह-विषयमें उच्च-नीच और लज्जाको त्यागकर कुत्ते-चण्डाल-गधे आदि सभी प्राणियोंमें भगवान्‌का अधिष्ठान जानकर उनको दण्डवत् प्रणाम करके सम्मान करना चाहिये।” जो कनिष्ठ अधिकारी लौकिक श्रद्धायुक्त होकर अर्चन और नाम करते हैं, उन्हें सभी जीवोंका अवश्य ही आदर करना चाहिये—यह उनके पक्षमें विधि है। इस विधिका उल्लङ्घन करनेसे उनका कभी भी मङ्गल नहीं होगा। जो दृढ़ श्रद्धावान् हैं, उनको सर्वत्र ही इष्टकी स्फूर्ति होनेपर वे सभी व्यक्तियों या वस्तुओंको भगवान्‌से युक्त दर्शन करते हैं। जो इस प्रकार जगत्‌को जगदीशके सेवा-उपकरणके रूपमें जानते हैं, वे सभी वस्तुओंकी गुरु जानकर सेवापूजा करते हैं। जो सेवक हैं, उनकी दृष्टि सर्वत्र ही सेव्यके सम्पर्कमें होती है। किन्तु भगवद्भक्त कभी भी जीवका आदर उनको ईश्वर मानकर नहीं करते हैं, क्योंकि मायावश योग्य जीव कभी भी मायाधीश ईश्वर नहीं हो सकता। श्रील जीव गोस्वामीने भक्ति-सन्दर्भमें बतलाया है—

“परमसिद्धानाञ्च ‘सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः' (भाः 11/2/45) इत्याद्यनुसारेण सिद्ध एव सः। तत्र साधकानां यत्तु ‘यथा तरोर्मूलनिषेचनेन' (भाः 4/31/14) इत्यादौ तदान्योपासनानां पुनरुक्तत्वमुपलभ्यते, तत् पुनः केवलस्वतन्त्र-तत्तद्दृष्ट्योपासनानामेव। अत्र तु तत्तदधिष्ठानक- भगवदुपासनमेव विधीयते। तदादरावश्यकत्वञ्च तत्सम्बन्धेनैव सम्पद्यते। तच्चान्यत्र झटिति रागद्वेषनिवृत्त्यर्थमिति ज्ञेयम्। अतएव केवलभूतानुकम्पया श्रीभगवदर्चनं त्यक्तवतो भरतस्यान्तरायः। तस्माद्भूतदयैव भगवद्भक्तिर्मुख्या नार्चनमिति निरस्तम्।” अर्थात् “जो देहाभिमान त्यागकर श्रीकृष्णमें अनुरक्त होकर परमहंस अवस्था लाभ करते हैं, उनमें निर्मत्सरता और सभी भूतोंमें आदरका स्वाभाविक धर्म होता है। क्योंकि (भाः 11/2/45)—‘जो सभी भूतोंमें बहिर्दृष्टि त्यागकर आत्मामें चिद्विलास श्रीभगवान्‌का आविर्भाव और आत्मस्वरूप श्रीहरिमें चिद्विलासके उपकरणसमूहका दर्शन करते हैं, वे ही भागवतोत्तम हैं।' यदि कहें कि ‘वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे जिस प्रकार उसका तना, शाखाएँ, उपशाखाएँ सभी तृप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अच्युतकी सेवासे सभी भूतोंकी पूजा हो जाती है, इसलिये पृथक् रूपसे अन्यान्य प्राणियोंके प्रति आदर करनेका प्रयोजन नहीं है'—तो यहाँ वक्तव्य इस प्रकार है—अन्यान्य प्राणियोंमें अन्तर्यामी ईश्वर रूपमें अधिष्ठित भगवान्‌की ही उपासना विहित हुई है और भगवद्-सम्बन्धसे ही अर्थात् अपने उपास्य हरिसम्बन्धी वस्तुज्ञानसे ही उन सभी प्राणियोंके प्रति आदर करना एकान्त कर्त्तव्य है। अपने अतिरिक्त अन्यान्य प्राणियोंमें शीघ्र ही राग-द्वेषकी निवृत्ति हो, उसके निमित्त ही सभीका आदर करना विहित हुआ है। अतएव केवल कर्मादि कामनामय जीव-दया या जीवके आदरके वशीभूत होकर श्रीभगवान्‌के अर्चनको त्यागनेसे जो भीषण दुर्गति होती है, उसे प्रेमिक भक्तवर