भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2497

480 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/21–26 ] श्रीगौड़सुन्दरके शिक्षाष्टककी शिक्षामें बड़े सुन्दररूपसे संरक्षित है। प्रोषितभर्तृका पतिको सामने पानेपर भी अर्थात् सम्भोगके मध्यमें भी विप्रलम्भमें विभावित रहती है। यही विप्रलम्भ सम्भोगको परिपुष्ट करता है और सम्भोग विप्रलम्भकी और अधिक उद्दीपना करवाकर पतिकी स्मृतिको निरन्तर बनाये रखता है। उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता-फल, अर्थवाद और उपपत्ति देखकर शास्त्रके तात्पर्यका निर्णय करना होता है। उसके अनुसारसे ब्रह्मसूत्रमें फलाध्यायके भी तात्पर्यका निर्णय किया जा सकता है। उसकी प्रवृत्ति या उपक्रमके द्वारा 'आवृत्ति'-शब्द और निवृत्ति या उपसंहारके द्वारा 'अनावृत्ति'-शब्दका प्रयोग किया है—अर्थात् जो अभिधेय पराविद्याकी बार-बार आवृत्ति करेंगे, तभी ही अनावृत्ति सम्भव है, किसी और उपायसे वह सम्भव नहीं है। आवृत्ति एक बार अथवा स्तब्ध होनेपर जगत्में बार-बार आवृत्ति होगी—अनावृत्ति या अनर्थ-निवृत्ति सम्भव नहीं होगी। तभी उपसंहार-सूत्रमें अनावृत्तिकी बात कहनेपर भी आप उपदेशकी एकसे अधिक बार आवृत्ति कर रहे हैं अर्थात् “अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्”—इस प्रकार एकसे अधिक बार कहते हुए “कीर्त्तनीयः सदा हरिः—इस भगवत्-मुखसे निकले वाक्यकी प्रतिष्ठा की है—(‘‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्’’— गौड़ीय, 12वाँ खण्ड)। इस प्रसङ्गमें श्रीचैतन्यमहाप्रभुके श्रीशिक्षाष्टकका आश्रय करके श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिसे प्रकाशित श्रीश्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुर-कृत 'सन्मोदिनी-भाष्य', उक्त भाषाका बङ्गला अनुवाद और श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद-कृत 'विवृति'-युक्त 'श्रीचैतन्य-शिक्षाष्टक'-ग्रन्थ देखें॥ 21 ॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :— उत्तम हञा आपनाके माने तृणाधम। दुइ प्रकारे सहिष्णुता करे वृक्षसम ॥ 22 ॥ वृक्ष येन काटिलेह किछु ना बोलय। शुकाञा मैलह कारे पानी ना मागय ॥ 23 ॥ येइ ये मागये, तारे देय आपन-धन। घर्म-वृष्टि सहे, आनेर करये रक्षण ॥ 24 ॥ सर्वत्र श्रीकृष्णदर्शनरूपी सम्बन्धज्ञानसे युक्त नाम-साधनसे प्रेम-प्राप्ति :— उत्तम हञा वैष्णव हबे निरभिमान। जीवे सम्मान दिबे जानि 'कृष्ण'-अधिष्ठान ॥ 25 ॥ एमत हञा येइ कृष्णनाम लय। श्रीकृष्णचरणे ताँर प्रेम उपजाय ॥” 26 ॥ अनुवाद—उत्तम होनेपर भी जो अपनेको तुच्छ तृणसे भी अधिक क्षुद्र समझता है, जो वृक्षकी भाँति दो प्रकारसे सहनशील होता है—जैसे (1) वृक्ष काटे जानेपर भी कुछ भी नहीं कहता, सूखकर मर जानेपर भी किसीसे पानी नहीं माँगता, माँगनेवाला जो कुछ भी माँगता है, उसको अपना धन (फल, फूल, लकड़ी, छाल, रसादि सब कुछ) दे देता है, (2) स्वयं धूप और वर्षाको सहता हुआ भी दूसरोंकी धूप और वर्षासे रक्षा करता है; वैष्णव उत्तम होकर भी निरभिमानी होगा और जीवमात्रमें कृष्णका अधिष्ठान जानकर सबको यथायोग्य सम्मान देगा—इस प्रकार जो श्रीकृष्णनामका कीर्तन करता है उसका ही श्रीकृष्णचरणकमलोंमें प्रेम उत्पन्न होता है॥” 22-26 ॥ अमृताणुकणिका—मेरे हृदयमें जिस प्रकार भगवान् विराजमान हैं, वृक्ष-लता, हाथी-चींटी, धार्मिक-अधार्मिक, नर-नारी, सत्-असत्, पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग—सभीमें उसी प्रकार भगवान् अधिष्ठित हैं—साधु-गुरु-कृपासे इसकी उपलब्धि करके अपने समान दूसरोंके मङ्गल-अनुसन्धानको ही वास्तविक साधन कहते हैं। इसकी परिणतिको ही महाजन समदर्शन कहते हैं। प्रत्येक जीवके प्रति सहानुभूति-सम्पन्न होना होगा।