भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2496

[ 20/21 बीसवाँ अध्याय 479

प्रकारसे सर्वत्र अमानी और मानदानकारी हो सकते हैं। चौथे-पादके “कीर्त्तनीयः सदा हरिः” महावाक्यने “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐत: 1/5/3) अर्थात् प्रेमभक्ति अप्राकृत ब्रह्मस्वरूप है—इस श्रुतिमन्त्रको पुष्पित किया है और ब्रह्मसूत्रके फलाध्यायके 'उपक्रम'-सूत्र “आवृत्तिरसकृदुपदेशात्” से 'उपसंहार'-सूत्र “अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्”—इस ब्रह्मसूत्रसमूहकी सार्थकताको सम्पादित किया है। “प्रज्ञानं ब्रह्म”-हरिकीर्त्तन ही वास्तवमें सत्य प्रज्ञा है, क्योंकि हरि और हरिकीर्त्तन दोनों ही अभिन्न, अप्राकृत ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्रह्मसूत्रके अकृत्रिम भाष्य श्रीद्भागवतमें कहा है,—“यज्ञैः सङ्कीर्त्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥”(भाः 11/5/32)—जो सङ्कीर्त्तनात्मक यज्ञके द्वारा “महान् प्रभुर्वैः पुरुषः”—इस श्रुतिके प्रतिपाद्य रुक्मवर्ण परब्रह्मकी उपासना करते हैं, वे ही वास्तव विचारसे सुमेधा—बुद्धिमान हैं। “आवृत्तिरसकृदुपदेशात्”—श्रीभगवन्नाम-रूप शब्दब्रह्मकी आराधना—'असकृत्' अर्थात् बार-बार 'आवृत्ति' और कीर्त्तनके द्वारा ही करनी होगी, क्योंकि समस्त शास्त्रोंमें वही उपदिष्ट हुआ है। इस ब्रह्मसूत्रकी व्याख्यामें आचार्य शङ्कर जो कहते हैं, उसका मर्मार्थ यह है—“आत्मा वा अरे दृष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (बृःआः 4/5/6), “तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” (बृःआः 4/4/21) आदि श्रुतिओंमें यह सन्देह उपस्थित होता है कि आत्मविषयक अनुशीलनादि एक बार ही करना होगा, अथवा पुनः पुनः करना होगा? किसी किसी अनुष्ठानका एकबार पालन करनेसे ही शास्त्रार्थका पालन हो जाता है, पुनः पुनः पालन करना अनर्थक होता है, अपितु पुनः पुनः पालन करनेसे शास्त्रके उल्लङ्घनरूपी दोषकी ही सम्भावना होती है। इस प्रकार एक बार श्रवणादि करनेपर उसे बार-बार नहीं करना होगा—यही क्या शास्त्रका उद्देश्य है? नहीं, जैसे, जब तक धानमें-से चावल बाहर नहीं हो, तब तक मूसलसे पीटना चाहिये। उसी प्रकार जब तक आत्मदर्शन ना हो, तब तक बार-बार श्रवण करना होगा। शिष्य गुरुकी उपासना करते हैं, प्रार्थी राजाकी चिन्ता करते हैं, विरहिणी स्त्री पतिका ध्यान करती है आदि स्थानोंमें 'उपासना', 'चिन्ता', 'ध्यान' आदि शब्दोंमें एक ही विषयका बार-बार संघटन ही लक्षित हुआ है। यदि कोई प्रोषितभर्तृकाको प्रतिक्षण उत्कण्ठाके सहित पतिकी चिन्ता करते देखे, तभी कहा जाता है—'अमुक स्त्री पतिकी चिन्ता कर रही है।' इन सब कारणोंसे वेद भी 'उपासितव्य' आदि शब्दसे एकबार मात्र उपासनाका उपदेश नहीं करते हैं। कोई पूर्वपक्ष करके कह सकते हैं,—जो शास्त्र, जो युक्ति अथवा जो उपदेश एक बार प्रयोगमें विशेष ज्ञानको उत्पन्न नहीं करता है, वह सौ बार प्रयोग करनेसे ज्ञानको उत्पन्न करेगा, उसका क्या आश्वासन है? सूत्रकार परवर्ती “लिङ्गाच्च” सूत्रमें उसको निरस्त करते हुए कहते हैं,—छांदोग्योपनिषदमें श्वेतकेतुके पिताने श्वेतकेतुको बार-बार उपदेश किया था, तभी श्वेतकेतु उसके फलको प्राप्त कर सके थे। अनेक बार देखा जाता है, एकबार सुनकर उसे सम्पूर्णरूपमें समझनेमें असमर्थ होनेपर लोग अन्य बार सुननेपर उसे समझ सकते हैं। क्योंकि वाक्यके अर्थका बोध पदार्थके बोधसे पहले ही उत्पन्न होता है। पदार्थका विज्ञान नहीं होनेपर वाक्यके अर्थका ज्ञान भी प्राप्त नहीं होता है। इसी पदार्थके विज्ञानकी उत्पत्तिके लिये ही बार-बार आवृत्ति आवश्यक है। श्रीगीतामें भी देखा जाता है,—“सततं कीर्त्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।” (गीता 9/14)। “मच्चित्ता मद्गतप्राणाः ×× कथयन्तश्च मां नित्यम्।” (गीता 10/9) आदि। आचार्य शङ्करने जो प्रोषित-नामक विरहिणीकी उत्कण्ठामयी आवृत्तिका उदाहरण दिया है, वह भगवान्