श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें476 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/3-12 ] समय-समयपर हर्ष, शोक, रोष, दैन्य, उद्वेग, आर्त्ति, उत्कण्ठा और सन्तोष आदि अनेक भाव उदित होते। वे उन-उन भावोंके अनुरूप स्वरचित श्लोक पढ़ते और अपने इन दो बन्धुओंके साथ उन श्लोकोंके अर्थका आस्वादन करते। किसी दिन किसी भावके श्लोकका पाठ करते और उस श्लोकका आस्वादन करते हुए रात्रि-जागरण हो जाता॥ 3-7॥ महाप्रभुके द्वारा साध्य-साधन अथवा उपेय और उपायके अभेदका वर्णन; सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्कृष्ट चरम अभिधेय अथवा शाब्दिक-अवतार श्रीनाम-कीर्तनके माहात्म्यका वर्णन :- हर्षे प्रभु कहेन,—“शुन, स्वरूप-रामराय। नामसङ्कीर्त्तन—कलौ परम उपाय॥ 8 ॥ श्रीकृष्णकीर्तन करनेवाला ही एकमात्र सुबुद्धिमान् :- सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण-आराधन। सेइ त' सुमेधा पाय कृष्णेर चरण॥ 9 ॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने हर्षित होते हुए कहा,—“हे स्वरूप! हे रामराय! सुनो! नाम-सङ्कीर्तन ही कलियुगमें [परम सिद्धि प्राप्त करनेका] परम उपाय है। कलियुगमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा कृष्णकी आराधना होती है। ऐसा करनेवाला व्यक्ति बहुत बुद्धिमान् है और वह श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति करता है॥ 8-9॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/76-77 संख्या देखें॥ 9 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/32) में— कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः॥ 10 ॥ अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 10 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 10 ॥ शुद्धनामका फल—निःश्रेयस और श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- नामसङ्कीर्त्तने हय सर्वानर्थ-नाश। सर्व-शुभोदय कृष्णे प्रेमेर उल्लास॥ 11 ॥ अनुवाद—नाम-सङ्कीर्तनके द्वारा ही समस्त अनर्थोंका नाश होता है, समस्त शुभ उदित होते हैं और कृष्णसे प्रेममें उल्लास होता है॥ 11 ॥ श्रीमुखनिःसृत श्रीशिक्षाष्टक (अथवा श्रीभागवतका सार); नामाभास और नामका फल :- (पद्यावलीके दशम अङ्कमें उद्धृत शिक्षाष्टकका पहला श्लोक)— चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्। आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनम्॥ 12 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चित्तरूपी दर्पणका मार्जन करनेवाले, भवरूपी महादावाग्निको (भयङ्कर वनकी अग्निको) बुझानेवाले, जीवोंके मङ्गलरूपी कुमुदिनीके [विकासके लिये] भाव-चन्द्रिकाको वितरण करनेवाले, विद्यावधूके जीवन-स्वरूप, आनन्दरूपी समुद्रको वर्धित करनेवाले, पग-पगमें पूर्णामृतास्वादन स्वरूप एवं सर्वस्वरूपको शीतल करनेवाले श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन विशेषरूपसे जययुक्त हों॥ 12 ॥ अनुभाष्य— चेतोदर्पणमार्जनं (चेतः एव दर्पणः आदर्शः तस्य मार्जनं मालिन्यस्य अपाकरणं यस्मात् तत्) भवमहादावाग्निनिर्वापणं (भवः संसारः एव महादावाग्निः तस्य निर्वापणं यस्मात् तत्) श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं (श्रेयांसि एव कैरवाणि कुमुदानि तेषां चन्द्रिका ज्योत्स्ना तस्याः वितरणं यस्मात् तत्) विद्यावधूजीवनं (विद्या एव वधूः पत्नी तस्याः जीवनं प्राणधारणं यस्मात् तत्) आनन्दाम्बुधिवर्धनं (आनन्दः प्रेमा एव अम्बुधिः समुद्रः तस्य वर्धनं यस्मात् तत्) प्रतिपदं (प्रतिक्षणं) पूर्णामृतास्वादनं (पूर्णामृतस्य आस्वादनं यस्मात् तत्) सर्वात्मस्नपनं (सर्वेषाम् आत्मनां