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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

476 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/3-12 ] समय-समयपर हर्ष, शोक, रोष, दैन्य, उद्वेग, आर्त्ति, उत्कण्ठा और सन्तोष आदि अनेक भाव उदित होते। वे उन-उन भावोंके अनुरूप स्वरचित श्लोक पढ़ते और अपने इन दो बन्धुओंके साथ उन श्लोकोंके अर्थका आस्वादन करते। किसी दिन किसी भावके श्लोकका पाठ करते और उस श्लोकका आस्वादन करते हुए रात्रि-जागरण हो जाता॥ 3-7॥ महाप्रभुके द्वारा साध्य-साधन अथवा उपेय और उपायके अभेदका वर्णन; सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्कृष्ट चरम अभिधेय अथवा शाब्दिक-अवतार श्रीनाम-कीर्तनके माहात्म्यका वर्णन :- हर्षे प्रभु कहेन,—“शुन, स्वरूप-रामराय। नामसङ्कीर्त्तन—कलौ परम उपाय॥ 8 ॥ श्रीकृष्णकीर्तन करनेवाला ही एकमात्र सुबुद्धिमान् :- सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण-आराधन। सेइ त' सुमेधा पाय कृष्णेर चरण॥ 9 ॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने हर्षित होते हुए कहा,—“हे स्वरूप! हे रामराय! सुनो! नाम-सङ्कीर्तन ही कलियुगमें [परम सिद्धि प्राप्त करनेका] परम उपाय है। कलियुगमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा कृष्णकी आराधना होती है। ऐसा करनेवाला व्यक्ति बहुत बुद्धिमान् है और वह श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति करता है॥ 8-9॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/76-77 संख्या देखें॥ 9 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/32) में— कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः॥ 10 ॥ अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 10 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 10 ॥ शुद्धनामका फल—निःश्रेयस और श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- नामसङ्कीर्त्तने हय सर्वानर्थ-नाश। सर्व-शुभोदय कृष्णे प्रेमेर उल्लास॥ 11 ॥ अनुवाद—नाम-सङ्कीर्तनके द्वारा ही समस्त अनर्थोंका नाश होता है, समस्त शुभ उदित होते हैं और कृष्णसे प्रेममें उल्लास होता है॥ 11 ॥ श्रीमुखनिःसृत श्रीशिक्षाष्टक (अथवा श्रीभागवतका सार); नामाभास और नामका फल :- (पद्यावलीके दशम अङ्कमें उद्धृत शिक्षाष्टकका पहला श्लोक)— चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्। आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनम्॥ 12 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चित्तरूपी दर्पणका मार्जन करनेवाले, भवरूपी महादावाग्निको (भयङ्कर वनकी अग्निको) बुझानेवाले, जीवोंके मङ्गलरूपी कुमुदिनीके [विकासके लिये] भाव-चन्द्रिकाको वितरण करनेवाले, विद्यावधूके जीवन-स्वरूप, आनन्दरूपी समुद्रको वर्धित करनेवाले, पग-पगमें पूर्णामृतास्वादन स्वरूप एवं सर्वस्वरूपको शीतल करनेवाले श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन विशेषरूपसे जययुक्त हों॥ 12 ॥ अनुभाष्य— चेतोदर्पणमार्जनं (चेतः एव दर्पणः आदर्शः तस्य मार्जनं मालिन्यस्य अपाकरणं यस्मात् तत्) भवमहादावाग्निनिर्वापणं (भवः संसारः एव महादावाग्निः तस्य निर्वापणं यस्मात् तत्) श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं (श्रेयांसि एव कैरवाणि कुमुदानि तेषां चन्द्रिका ज्योत्स्ना तस्याः वितरणं यस्मात् तत्) विद्यावधूजीवनं (विद्या एव वधूः पत्नी तस्याः जीवनं प्राणधारणं यस्मात् तत्) आनन्दाम्बुधिवर्धनं (आनन्दः प्रेमा एव अम्बुधिः समुद्रः तस्य वर्धनं यस्मात् तत्) प्रतिपदं (प्रतिक्षणं) पूर्णामृतास्वादनं (पूर्णामृतस्य आस्वादनं यस्मात् तत्) सर्वात्मस्नपनं (सर्वेषाम् आत्मनां

[ 20/12-19 बीसवाँ अध्याय 477

सर्वतोभावेन आत्मनो वा स्नपनं यस्मात् तत्) परं (केवलमद्वितीयं) श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनं विजयते (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार नाशन। चित्तशुद्धि, सर्वभक्तिसाधन-उद्गम॥ 13॥ कृष्णप्रेमोद्गम, प्रेमामृत-आस्वादन। कृष्णप्राप्ति, सेवामृत-समुद्रे मज्जन॥"14॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनसे जन्म-जन्मान्तरके पाप और उससे प्राप्त पुनः-पुनः जन्म-मृत्युरूप संसारका नाश, अनर्थ-निवृत्तिसे चित्त-शुद्धि, भक्तिके सभी साधनोंका उदय, कृष्णप्रेमका उदय और प्रेमामृतका रसास्वादन, श्रीकृष्ण-प्राप्ति और अन्तमें सेवामृतरूपी समुद्रमें निमज्जित हो जाना होता है॥ 13-14॥ अशोक, अभय, अमृतका आधार श्रीनाम :- उठिल विषाद, दैन्य, पड़े आपन-श्लोक। याहार अर्थ शुनि' सब याय दुःख-शोक॥ 15॥ अनुवाद-यह कहते हुए महाप्रभुमें विषाद और दैन्य उत्पन्न हो आया और वे स्वरचित एक श्लोक पढ़ने लगे, जिसके अर्थको सुनकर समस्त दुःख और शोक दूर हो जाते हैं॥ 15॥ नामसाधनके सुलभ होनेका कारण अथवा श्रीकृष्णकी महावदान्यता; दुर्देवरूपी अपराधमयी अवस्थामें जीवके द्वारा शुद्धनामके उच्चारणका अभाव :- (पद्यावलीके 19वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका दूसरा श्लोक) “नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति- स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः। एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्देवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥ 16॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥

अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन्, आपका नाम ही जीवोंके समस्त मङ्गलका विधान करता है, इसलिये अपने 'कृष्ण', 'गोविन्द' आदि अनेक नामोंका आपने विस्तार किया है। उन नामोंमें आपने अपनी समस्त शक्ति अर्पित की है और आपने उन नामोंके स्मरणमें कालादिका भी नियम (विधि अथवा विचार) नहीं रखा। हे प्रभो, जीवोंके प्रति ऐसी कृपा करके आपने अपने नामको सुलभ बनाया है, तथापि मेरे नामापराधरुपी दुर्भाग्यने ऐसा किया है कि वह आपके सुलभ नाममें भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं होने देता॥ 16॥ अनुभाष्य- हे भगवन्, (प्रभो कृष्ण,) [भवता अहैतुक्या कृपया] नाम्नां बहुधा (बहुप्रकारः) अकारि (प्रकटितवान्) तत्र (नाम्नि) निजसर्वशक्तिः (आत्मनः अनन्ता शक्तिः) अर्पिता (निहिता), [अतः तस्य] स्मरणे कालः अपि न नियमितः (न विहितः, अपेक्षितः; सर्वकालेऽपि न कोऽपि विधिः)-तव एतादृशी कृपा; [किन्तु तथापि] मम अपि ईदृशं दुर्देवं यत् इह (नाम्नि) अनुरागः न अजनि (न जातः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- अनेक लोकेर वाञ्छा अनेक प्रकार। कृपाते करिल अनेक-नामेर प्रचार॥ 17॥ खाइते शुइते यथा तथा नाम लय। काल, देश, नियम नाहि, सर्वसिद्धि हय॥ 18॥ सर्वशक्ति नामे दिला करिया विभाग। आमार दुर्देव, —नामे नाहि अनुराग॥ 19॥ अनुवाद-इस जगत्में लोगोंके हृदयमें नाना प्रकारकी कामनाएँ रहती हैं, इसलिये हे भगवन्! आपने कृपा करके अपने अनेक नामोंको प्रकटित किया है। उन नामोंके उच्चारण करनेमें देश, काल और पात्रादिका कोई विशेष नियम भी नहीं रखा है। खाते-पीते-सोते समयमें जिस किसी प्रकारसे भी श्रीकृष्णनाम करनेसे

478 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/17-21 ] सर्वसिद्धि होती है। अहो, श्रीकृष्णने अपने उन नामोंमें अपनी सारी शक्तियोंको भर दिया है। किन्तु मेरा दुर्भाग्य है कि ऐसे श्रीकृष्णनाममें मेरा तनिक भी अनुराग नहीं है॥ 17-19 ॥ प्रेमप्राप्तिके लिये नामकीर्तनके लक्षणोंका वर्णन :- येरूपे लइले नाम, प्रेम उपजाय। तार लक्षण-श्लोक शुन, स्वरूप-रामराय ॥ 20 ॥ अनुवाद - 'हे स्वरूप ! हे रामराय ! जिस प्रकारसे नाम ग्रहण करनेसे प्रेम उत्पन्न होता है, उसके लक्षणोंको इस श्लोकमें सुनो ॥ 20 ॥ साध्यनाम-प्रेमको प्राप्त करनेके लिये नामसाधनकी प्रणाली अथवा समस्त अपराधमूलक देहात्मबुद्धिका निषेध और नामको निरन्तर करनेकी विधि :- (पद्यावलीके 20 वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका तीसरा श्लोक)- तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ॥ 21 ॥ अनुवाद - जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्तन करनेके अधिकारी हैं॥ 21 ॥ अनुभाष्य - आदिलीला 17/31 संख्या देखें ॥ 21 ॥ अमृताणुकणा-श्रीगौरसुन्दरके मुख-निस्रुत उपदेश अथवा शिक्षाष्टक ब्रह्मसूत्र और श्रुतिमन्त्रसमूहके पल्लवित, मञ्जरित और पुष्पित फलोंका उद्यान है। विचारणीय शिक्षाश्लोकका प्रथम पाद 'तृणादपि सुनीचेन' महावाक्य “अहं ब्रह्मास्मि"-श्रुतिमन्त्रके वास्तविक तात्पर्यका ही ज्ञापन करता है। यद्यपि “अहं ब्रह्मास्मि” और 'तृणादपि सुनीचेन' इन दो वाक्योंके मध्यमें परस्पर आपात विरोध दिखलायी देता है, तथापि उनमें अति सुन्दर समन्वय श्रीरूपानुग गौरजनोंकी कृपासे देखा जा सकता है। 'तृणादपि सुनीचेन' अर्थात् “अहं गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः” – यह विज्ञान ही स्वरूपज्ञान अथवा सम्बन्ध-ज्ञान है, वही 'अहं ब्रह्मास्मि' मन्त्रका परिस्फुट तात्पर्य है। मैं मायाशक्तिसे उत्पन्न जड़वस्तु नहीं हूँ, जड़का भोक्ता नहीं हूँ, मैं चेतन हूँ-मैं स्वरूपसे पूर्णचेतनकी ही आलिङ्गित वस्तु-उनकी क्रोड़ीभूत वस्तु हूँ। जड़ वस्तुओंमें सबकी अपेक्षा क्षुद्र-अभिमान जो तृणके भीतर सदा रहता है, मैं वह भी नहीं हूँ, तथापि मैं केशके अग्रभागके दस हजारवें भागरूप अणुचेतनमय स्वरूपको पृथक् करके रखूँगा, जिसके द्वारा जड़के साथ समन्वय-चेष्टा कभी भी ना घटित हो। श्रुतियोंने भूत-शुद्धिके लिये जो “अहं ब्रह्मास्मि" मन्त्र सिखलाया है, उसने ही 'तृणादपि सुनीचेन' महावाक्यसे सौन्दर्य प्राप्त किया है। उक्त श्लोकके दूसरे पादका 'तरोरपि सहिष्णुना' महावाक्य “तत्त्वमसि श्वेतकेतो” (छाः 6/8/7) अर्थात् 'हे श्वेतकेतो, तुम वही हो'-यह श्रुति मन्त्रका परिव्यक्त रूप है। जो परब्रह्मकी वस्तु या जो परब्रह्म-जातीय वस्तु है, वह पार्थिव किसी क्षुद्र अवास्तव-वस्तुसे असहिष्णु नहीं हो सकता। जड़वस्तु जड़के द्वारा क्षुब्ध और लुब्ध होती है, तभी उसमें असहिष्णुता आ जाती है। और चेतन वस्तु जड़से कुछ भी प्रतिदान नहीं चाहती, केवल चेतनके निकट पुनः पुनः चेतनकी वार्त्ताको ही वहन करती है। शिक्षा श्लोकके तीसरे पादमें “अमानिना मानदेन", “सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छाः 3/14/1), “नेह नानास्ति किञ्चन” (बृः 4/4/19, कठ 2/1/11) अर्थात् परिदृश्यमान जगत् समस्त ही ब्रह्मसे अभिन्न है, ब्रह्मस्वरूपमें कोई जड़़ीय भेद नहीं है-यही श्रुतिमन्त्रका ही परिवर्धित रूप है। जो समस्त वस्तुओंमें परब्रह्मका अधिष्ठान दर्शन करते हैं- “वासुदेवः सर्वमिति” (गीता 7/19), जो ब्रह्मस्वरूपमें जड़भेद दर्शन नहीं करते हैं, वे सभी

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प्रकारसे सर्वत्र अमानी और मानदानकारी हो सकते हैं। चौथे-पादके “कीर्त्तनीयः सदा हरिः” महावाक्यने “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐत: 1/5/3) अर्थात् प्रेमभक्ति अप्राकृत ब्रह्मस्वरूप है—इस श्रुतिमन्त्रको पुष्पित किया है और ब्रह्मसूत्रके फलाध्यायके 'उपक्रम'-सूत्र “आवृत्तिरसकृदुपदेशात्” से 'उपसंहार'-सूत्र “अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्”—इस ब्रह्मसूत्रसमूहकी सार्थकताको सम्पादित किया है। “प्रज्ञानं ब्रह्म”-हरिकीर्त्तन ही वास्तवमें सत्य प्रज्ञा है, क्योंकि हरि और हरिकीर्त्तन दोनों ही अभिन्न, अप्राकृत ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्रह्मसूत्रके अकृत्रिम भाष्य श्रीद्भागवतमें कहा है,—“यज्ञैः सङ्कीर्त्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥”(भाः 11/5/32)—जो सङ्कीर्त्तनात्मक यज्ञके द्वारा “महान् प्रभुर्वैः पुरुषः”—इस श्रुतिके प्रतिपाद्य रुक्मवर्ण परब्रह्मकी उपासना करते हैं, वे ही वास्तव विचारसे सुमेधा—बुद्धिमान हैं। “आवृत्तिरसकृदुपदेशात्”—श्रीभगवन्नाम-रूप शब्दब्रह्मकी आराधना—'असकृत्' अर्थात् बार-बार 'आवृत्ति' और कीर्त्तनके द्वारा ही करनी होगी, क्योंकि समस्त शास्त्रोंमें वही उपदिष्ट हुआ है। इस ब्रह्मसूत्रकी व्याख्यामें आचार्य शङ्कर जो कहते हैं, उसका मर्मार्थ यह है—“आत्मा वा अरे दृष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (बृःआः 4/5/6), “तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” (बृःआः 4/4/21) आदि श्रुतिओंमें यह सन्देह उपस्थित होता है कि आत्मविषयक अनुशीलनादि एक बार ही करना होगा, अथवा पुनः पुनः करना होगा? किसी किसी अनुष्ठानका एकबार पालन करनेसे ही शास्त्रार्थका पालन हो जाता है, पुनः पुनः पालन करना अनर्थक होता है, अपितु पुनः पुनः पालन करनेसे शास्त्रके उल्लङ्घनरूपी दोषकी ही सम्भावना होती है। इस प्रकार एक बार श्रवणादि करनेपर उसे बार-बार नहीं करना होगा—यही क्या शास्त्रका उद्देश्य है? नहीं, जैसे, जब तक धानमें-से चावल बाहर नहीं हो, तब तक मूसलसे पीटना चाहिये। उसी प्रकार जब तक आत्मदर्शन ना हो, तब तक बार-बार श्रवण करना होगा। शिष्य गुरुकी उपासना करते हैं, प्रार्थी राजाकी चिन्ता करते हैं, विरहिणी स्त्री पतिका ध्यान करती है आदि स्थानोंमें 'उपासना', 'चिन्ता', 'ध्यान' आदि शब्दोंमें एक ही विषयका बार-बार संघटन ही लक्षित हुआ है। यदि कोई प्रोषितभर्तृकाको प्रतिक्षण उत्कण्ठाके सहित पतिकी चिन्ता करते देखे, तभी कहा जाता है—'अमुक स्त्री पतिकी चिन्ता कर रही है।' इन सब कारणोंसे वेद भी 'उपासितव्य' आदि शब्दसे एकबार मात्र उपासनाका उपदेश नहीं करते हैं। कोई पूर्वपक्ष करके कह सकते हैं,—जो शास्त्र, जो युक्ति अथवा जो उपदेश एक बार प्रयोगमें विशेष ज्ञानको उत्पन्न नहीं करता है, वह सौ बार प्रयोग करनेसे ज्ञानको उत्पन्न करेगा, उसका क्या आश्वासन है? सूत्रकार परवर्ती “लिङ्गाच्च” सूत्रमें उसको निरस्त करते हुए कहते हैं,—छांदोग्योपनिषदमें श्वेतकेतुके पिताने श्वेतकेतुको बार-बार उपदेश किया था, तभी श्वेतकेतु उसके फलको प्राप्त कर सके थे। अनेक बार देखा जाता है, एकबार सुनकर उसे सम्पूर्णरूपमें समझनेमें असमर्थ होनेपर लोग अन्य बार सुननेपर उसे समझ सकते हैं। क्योंकि वाक्यके अर्थका बोध पदार्थके बोधसे पहले ही उत्पन्न होता है। पदार्थका विज्ञान नहीं होनेपर वाक्यके अर्थका ज्ञान भी प्राप्त नहीं होता है। इसी पदार्थके विज्ञानकी उत्पत्तिके लिये ही बार-बार आवृत्ति आवश्यक है। श्रीगीतामें भी देखा जाता है,—“सततं कीर्त्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।” (गीता 9/14)। “मच्चित्ता मद्गतप्राणाः ×× कथयन्तश्च मां नित्यम्।” (गीता 10/9) आदि। आचार्य शङ्करने जो प्रोषित-नामक विरहिणीकी उत्कण्ठामयी आवृत्तिका उदाहरण दिया है, वह भगवान्

480 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/21–26 ] श्रीगौड़सुन्दरके शिक्षाष्टककी शिक्षामें बड़े सुन्दररूपसे संरक्षित है। प्रोषितभर्तृका पतिको सामने पानेपर भी अर्थात् सम्भोगके मध्यमें भी विप्रलम्भमें विभावित रहती है। यही विप्रलम्भ सम्भोगको परिपुष्ट करता है और सम्भोग विप्रलम्भकी और अधिक उद्दीपना करवाकर पतिकी स्मृतिको निरन्तर बनाये रखता है। उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता-फल, अर्थवाद और उपपत्ति देखकर शास्त्रके तात्पर्यका निर्णय करना होता है। उसके अनुसारसे ब्रह्मसूत्रमें फलाध्यायके भी तात्पर्यका निर्णय किया जा सकता है। उसकी प्रवृत्ति या उपक्रमके द्वारा 'आवृत्ति'-शब्द और निवृत्ति या उपसंहारके द्वारा 'अनावृत्ति'-शब्दका प्रयोग किया है—अर्थात् जो अभिधेय पराविद्याकी बार-बार आवृत्ति करेंगे, तभी ही अनावृत्ति सम्भव है, किसी और उपायसे वह सम्भव नहीं है। आवृत्ति एक बार अथवा स्तब्ध होनेपर जगत्में बार-बार आवृत्ति होगी—अनावृत्ति या अनर्थ-निवृत्ति सम्भव नहीं होगी। तभी उपसंहार-सूत्रमें अनावृत्तिकी बात कहनेपर भी आप उपदेशकी एकसे अधिक बार आवृत्ति कर रहे हैं अर्थात् “अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्”—इस प्रकार एकसे अधिक बार कहते हुए “कीर्त्तनीयः सदा हरिः—इस भगवत्-मुखसे निकले वाक्यकी प्रतिष्ठा की है—(‘‘आवृत्तिरसकृदुपदेशात्’’— गौड़ीय, 12वाँ खण्ड)। इस प्रसङ्गमें श्रीचैतन्यमहाप्रभुके श्रीशिक्षाष्टकका आश्रय करके श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिसे प्रकाशित श्रीश्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुर-कृत 'सन्मोदिनी-भाष्य', उक्त भाषाका बङ्गला अनुवाद और श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद-कृत 'विवृति'-युक्त 'श्रीचैतन्य-शिक्षाष्टक'-ग्रन्थ देखें॥ 21 ॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :— उत्तम हञा आपनाके माने तृणाधम। दुइ प्रकारे सहिष्णुता करे वृक्षसम ॥ 22 ॥ वृक्ष येन काटिलेह किछु ना बोलय। शुकाञा मैलह कारे पानी ना मागय ॥ 23 ॥ येइ ये मागये, तारे देय आपन-धन। घर्म-वृष्टि सहे, आनेर करये रक्षण ॥ 24 ॥ सर्वत्र श्रीकृष्णदर्शनरूपी सम्बन्धज्ञानसे युक्त नाम-साधनसे प्रेम-प्राप्ति :— उत्तम हञा वैष्णव हबे निरभिमान। जीवे सम्मान दिबे जानि 'कृष्ण'-अधिष्ठान ॥ 25 ॥ एमत हञा येइ कृष्णनाम लय। श्रीकृष्णचरणे ताँर प्रेम उपजाय ॥” 26 ॥ अनुवाद—उत्तम होनेपर भी जो अपनेको तुच्छ तृणसे भी अधिक क्षुद्र समझता है, जो वृक्षकी भाँति दो प्रकारसे सहनशील होता है—जैसे (1) वृक्ष काटे जानेपर भी कुछ भी नहीं कहता, सूखकर मर जानेपर भी किसीसे पानी नहीं माँगता, माँगनेवाला जो कुछ भी माँगता है, उसको अपना धन (फल, फूल, लकड़ी, छाल, रसादि सब कुछ) दे देता है, (2) स्वयं धूप और वर्षाको सहता हुआ भी दूसरोंकी धूप और वर्षासे रक्षा करता है; वैष्णव उत्तम होकर भी निरभिमानी होगा और जीवमात्रमें कृष्णका अधिष्ठान जानकर सबको यथायोग्य सम्मान देगा—इस प्रकार जो श्रीकृष्णनामका कीर्तन करता है उसका ही श्रीकृष्णचरणकमलोंमें प्रेम उत्पन्न होता है॥” 22-26 ॥ अमृताणुकणिका—मेरे हृदयमें जिस प्रकार भगवान् विराजमान हैं, वृक्ष-लता, हाथी-चींटी, धार्मिक-अधार्मिक, नर-नारी, सत्-असत्, पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग—सभीमें उसी प्रकार भगवान् अधिष्ठित हैं—साधु-गुरु-कृपासे इसकी उपलब्धि करके अपने समान दूसरोंके मङ्गल-अनुसन्धानको ही वास्तविक साधन कहते हैं। इसकी परिणतिको ही महाजन समदर्शन कहते हैं। प्रत्येक जीवके प्रति सहानुभूति-सम्पन्न होना होगा।

[ 20/25 बीसवाँ अध्याय 481

अपने समान दूसरोंका उपकार करना होगा। तथापि नामाश्रित भगवद्भक्तका अधिक आदर करना होगा और अन्य जीवोंके प्रति यथायोग्य सम्मान प्रदर्शन करना विशेष कर्तव्य है। भगवान् कपिलदेवने देवहूति माताको कहा (भाः 3/29/34)— “मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहुमानयन्। ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति॥” “श्रीविष्णु अन्तर्यामी ईश्वररूपसे सभी जीवोंमें अवस्थित हैं, यह निश्चय करके हृदयसे सभी प्राणियोंका सम्मान करते हुए उन्हें प्रणाम करना चाहिये।” श्रीकृष्णका उद्ध्वजीके प्रति वचन (भाः 11/29/16)— “विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीड़ां च दैहिकीम्। प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥” “निजबन्धुगण भी यदि उपहास करें तो भी उसकी ओर ध्यान न दें और देह-विषयमें उच्च-नीच और लज्जाको त्यागकर कुत्ते-चण्डाल-गधे आदि सभी प्राणियोंमें भगवान्‌का अधिष्ठान जानकर उनको दण्डवत् प्रणाम करके सम्मान करना चाहिये।” जो कनिष्ठ अधिकारी लौकिक श्रद्धायुक्त होकर अर्चन और नाम करते हैं, उन्हें सभी जीवोंका अवश्य ही आदर करना चाहिये—यह उनके पक्षमें विधि है। इस विधिका उल्लङ्घन करनेसे उनका कभी भी मङ्गल नहीं होगा। जो दृढ़ श्रद्धावान् हैं, उनको सर्वत्र ही इष्टकी स्फूर्ति होनेपर वे सभी व्यक्तियों या वस्तुओंको भगवान्‌से युक्त दर्शन करते हैं। जो इस प्रकार जगत्‌को जगदीशके सेवा-उपकरणके रूपमें जानते हैं, वे सभी वस्तुओंकी गुरु जानकर सेवापूजा करते हैं। जो सेवक हैं, उनकी दृष्टि सर्वत्र ही सेव्यके सम्पर्कमें होती है। किन्तु भगवद्भक्त कभी भी जीवका आदर उनको ईश्वर मानकर नहीं करते हैं, क्योंकि मायावश योग्य जीव कभी भी मायाधीश ईश्वर नहीं हो सकता। श्रील जीव गोस्वामीने भक्ति-सन्दर्भमें बतलाया है—

“परमसिद्धानाञ्च ‘सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः' (भाः 11/2/45) इत्याद्यनुसारेण सिद्ध एव सः। तत्र साधकानां यत्तु ‘यथा तरोर्मूलनिषेचनेन' (भाः 4/31/14) इत्यादौ तदान्योपासनानां पुनरुक्तत्वमुपलभ्यते, तत् पुनः केवलस्वतन्त्र-तत्तद्दृष्ट्योपासनानामेव। अत्र तु तत्तदधिष्ठानक- भगवदुपासनमेव विधीयते। तदादरावश्यकत्वञ्च तत्सम्बन्धेनैव सम्पद्यते। तच्चान्यत्र झटिति रागद्वेषनिवृत्त्यर्थमिति ज्ञेयम्। अतएव केवलभूतानुकम्पया श्रीभगवदर्चनं त्यक्तवतो भरतस्यान्तरायः। तस्माद्भूतदयैव भगवद्भक्तिर्मुख्या नार्चनमिति निरस्तम्।” अर्थात् “जो देहाभिमान त्यागकर श्रीकृष्णमें अनुरक्त होकर परमहंस अवस्था लाभ करते हैं, उनमें निर्मत्सरता और सभी भूतोंमें आदरका स्वाभाविक धर्म होता है। क्योंकि (भाः 11/2/45)—‘जो सभी भूतोंमें बहिर्दृष्टि त्यागकर आत्मामें चिद्विलास श्रीभगवान्‌का आविर्भाव और आत्मस्वरूप श्रीहरिमें चिद्विलासके उपकरणसमूहका दर्शन करते हैं, वे ही भागवतोत्तम हैं।' यदि कहें कि ‘वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे जिस प्रकार उसका तना, शाखाएँ, उपशाखाएँ सभी तृप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अच्युतकी सेवासे सभी भूतोंकी पूजा हो जाती है, इसलिये पृथक् रूपसे अन्यान्य प्राणियोंके प्रति आदर करनेका प्रयोजन नहीं है'—तो यहाँ वक्तव्य इस प्रकार है—अन्यान्य प्राणियोंमें अन्तर्यामी ईश्वर रूपमें अधिष्ठित भगवान्‌की ही उपासना विहित हुई है और भगवद्-सम्बन्धसे ही अर्थात् अपने उपास्य हरिसम्बन्धी वस्तुज्ञानसे ही उन सभी प्राणियोंके प्रति आदर करना एकान्त कर्त्तव्य है। अपने अतिरिक्त अन्यान्य प्राणियोंमें शीघ्र ही राग-द्वेषकी निवृत्ति हो, उसके निमित्त ही सभीका आदर करना विहित हुआ है। अतएव केवल कर्मादि कामनामय जीव-दया या जीवके आदरके वशीभूत होकर श्रीभगवान्‌के अर्चनको त्यागनेसे जो भीषण दुर्गति होती है, उसे प्रेमिक भक्तवर

482 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/25-29 ] जड़भरतने हिरन-देह प्राप्त करनेके अभिनयके द्वारा हमें शिक्षा दी है। जड़भरत प्रेमिक भक्त थे, उनके पतन या भगवद्-प्राप्तिमें बाधा नहीं आ सकती। किन्तु भगवद्भक्त भी यदि केवलमात्र प्राणियोंकी बहिर्मुख देहके प्रति आसक्तिके द्वारा कर्मकाण्डीय विचारका अनुसरण करके किसीकी दैहिक और मानसिक प्रीति विधानमें व्यस्त हों और उसके लिये श्रीभगवान्‌की सेवामें शिथिलता प्रदर्शन करें, अथवा बहिर्मुख जीव-सेवाको अप्राकृत श्रीभगवद्-सेवा कहकर कल्पना करें, तब उनके लिये बन्धन अनिवार्य है। जब इस प्रकारसे अन्योंका आदर करनेपर भी भक्तिहीन होनेपर पतन अवश्यम्भावी है, तो अन्योंकी निन्दा करनेकी तो बात ही नहीं है।"—"त्रिदण्डीस्वामी श्रीभक्तिमयूख भागवत महाराज, श्रीगौड़ीय-पत्रिका वर्ष 1952-1953" ॥ 25 ॥ शुद्धा अधोक्षज-श्रीकृष्णभक्तिकी कामना :- कहिते कहिते प्रभुर दैन्य बाड़िला। 'शुद्धभक्ति' कृष्ण-ठाञि मागिते लागिला ॥ 27 ॥ अनुवाद—ऐसा कहते-कहते महाप्रभुका दैन्य वर्धित हो गया और वे श्रीकृष्णसे 'शुद्धभक्ति' माँगने लगे ॥ 27 ॥ प्रेमीभक्तोंके लक्षण अथवा स्वभाव :- प्रेमेर स्वभाव, याँहा प्रेमेर सम्बन्ध। सेइ माने, -'कृष्णे मोर नाहि भक्तिगन्ध' ॥ 28 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमका यह एक स्वभाव है कि जिस व्यक्तिमें प्रेमका वास्तविक सम्बन्ध हुआ है, वह दीनतापूर्वक यह मानता है, - 'मुझमें कृष्णके प्रति भक्तिकी गन्ध भी नहीं है।' ॥ 28 ॥ अनुभाष्य—जो-प्रेमधनसे दरिद्र हैं, वे कपटता-वशतः प्रेम प्राप्त नहीं करनेपर भी जगत्के सामने अपनी प्रेम प्राप्तिकी बातका मिथ्या प्रचार करते हैं। वास्तवमें लोगोंके सामने बाह्य-प्रकाश अथवा घोषणाके द्वारा कपटी, कृष्णप्रेमत्सम्पत्तिहीन दरिद्रोंकी प्रेम प्राप्तिकी सम्भावना ही नहीं है। प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदाय अपने सौभाग्यका ज्ञापन करनेके लिये कपटताका आश्रय करके अनेक समय बाह्य-प्रेमके चिह्न परस्परमें प्रकाशित करते हैं। शुद्धभक्तगण ऐसे कपट सहजियाओंको 'प्रेमिक' कहनेकी बात तो दूर रहे, उनके सङ्ग तकको भक्तिके नाशका कारण जानकर उसका वर्जन करते हैं और कपटतापूर्वक उन्हें 'भक्त' कहकर शुद्धभक्तोंके समान माननेका उपदेश भी नहीं देते। यथार्थ प्रेमके उदित होनेपर, जीव अपनी महिमाको छिपाकर कृष्णभजनके लिये ही प्रयास करता है। कपटी प्राकृत-सहजिया लोग कनक-कामिनी- प्रतिष्ठादिके लोभसे शुद्धभक्तोंको 'दार्शनिक पण्डितप्रवर', 'तत्त्ववित्', 'सूक्ष्मदर्शी' आदि संज्ञाओंसे तिरस्कृत करके स्वयंको 'रसिक', 'भजनानन्दी', 'भागवतोत्तम', 'लीलारस-पानमें उन्मत्त', 'रागानुगीय-साधकोंमें अग्रगणी', 'रसज्ञ', 'रसिकचूड़ामणि' आदि भूषणोंसे अलंकृत करते हैं। वास्तवमें वे अपने-अपने चित्तके प्राकृत-भावरङ्गसे भजन-प्रणालीको कलुषित करके दुष्क्रियाओंमें आसक्त होकर स्वयंकी मिथ्या-वैष्णवताका ही बहुत आदर करते हैं। इस श्रेणीके लेखक अप्राकृत-रसकी बात लिखते हुए अपने-अपने प्राकृत भावोंको कृष्णसेवाके अङ्गीभूत करते हैं। वे अप्राकृत विप्रलम्भ-रसके स्वरूपको नहीं जानकर विरससे युक्त प्राकृत-सम्भोगको ही 'रस' समझते हैं ॥ 28 ॥ निष्कपट साधकके द्वारा एकमात्र नित्य और शुद्ध काम्य 'शुद्धभक्तिका स्वरूप' :- (पद्यावलीके 85वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका चौथा श्लोक) - "न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥ 29 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे जगदीश, मैं धन, जन

[ 20/29-35 बीसवाँ अध्याय 483 अथवा सुन्दर कविताकी कामना नहीं करता हूँ; मैं मनमें यही कामना करता हूँ कि जन्म-जन्ममें आपमें ही मेरी अहैतुकी भक्ति हो॥ 29 ॥ अनुभाष्य- हे जगदीश, (जगन्नाथ,) अहं धनं न, जनं न, सुन्दरीं कवितां वा (इत्यादि कैतवात्मक त्रिवर्गमूलं कर्म) न कामये (न प्रार्थये किन्तु) मम जन्मनि जन्मनि (अतः अपौनर्भवरूपं ज्ञानमपि न कामये, अपि तु) त्वयि (अधोक्षजे) अहैतुकी (निष्कामा व्यवधानरहिता) भक्तिः भवतात् (भूयात्, - अहं धर्मार्थकामात्मिकां भुक्तिं भवबन्धमोचनात्मिकां मुक्तिं न प्रार्थये, केवलां शुद्धामेव सेवां त्वच्चरणे अहं याचे इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-हे जगन्नाथ! मैं धन, जन अथवा सुन्दर कवितादि छलनेवाले त्रिवर्गमूलक कर्मोंकी कामना नहीं करता हूँ, किन्तु मैं जन्म-जन्ममें (अर्थात् मोक्षरूपी ज्ञानकी भी कामना नहीं करता) आप अधोक्षजमें मेरी अहैतुकी (निष्काम निरन्तर) भक्ति हो (मैं धर्म-अर्थ-कामवाली भुक्ति और भवबन्धनका मोचन करनेवाली मुक्तिकी भी इच्छा नहीं करता, केवल आपके चरणकमलोंमें शुद्धभक्ति (सेवा) की याचना करता हूँ, यही अर्थ है) ॥ 29 ॥ श्लोकार्थ-व्याख्या :- धन, जन नाहि मागौँ कविता सुन्दरी। 'शुद्धभक्ति' देह' मोरे, कृष्ण कृपा करि'॥"30॥ दीनता और श्रीकृष्णसेवा-प्रवृत्तिका अटूट संयोग :- अति दैन्ये पुनः मागे दास्यभक्ति-दान। आपनारे करे संसारी जीव-अभिमान॥ 31 ॥ अनुवाद-स्वयंभगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु अपनेको संसारी जीव मानते हुए श्रीकृष्णसे प्रार्थना करते हैं-मैं आपसे धन, जन और सुन्दरी कविता नहीं चाहता। मुझे तो आप अहैतुकी कृपा करके केवल अपनी शुद्धभक्ति ही प्रदान करें। मैं पुनः-पुनः दीनतापूर्वक श्रीचरणोंमें दास्यभक्तिका दान ही माँगता हूँ॥ 30-31 ॥ साधककी अपने स्वरूपमें चिद्विलासी अधोक्षजसे कृपा-याचना :- (पद्यावलीके 13वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका पाँचवाँ श्लोक)- “अयि नन्दतनुज किङ्करं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पादपङ्कजस्थितधूलीसदृशं विचिन्त्य ॥ 32 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ओहे [सेवानन्दलीलारसविग्रह], नन्दनन्दन, मैं आपका नित्यदास होकर भी अपने दुष्कर्मोंके फलस्वरूप विषम भवसागरमें पड़ा हुआ हूँ, आप कृपा करके मुझे अपने चरणकमलोंमें स्थित धूलिके [क्रय किये निज नित्यदासके] समान मानिये॥ 32 ॥ अनुभाष्य- अयि नन्दतनुज, (सेवानन्दलीलारसविग्रह व्रजेन्द्रसुत) विषमे भवाम्बुधौ (संसार-समुद्रे) पतितं किङ्करं कृपया (अनुकम्पया) तव पादपङ्कजस्थितधूलीसदृशं (पादः एव पङ्कजं पद्मं तस्मिन् स्थिता अधिष्ठिता संलग्ना या धूली तस्याः सदृशं निजचिर- क्रीतदासमेव) मां विचिन्त्य (भावय)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 32 ॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- तोमार नित्य दास मुइ, तोमा पासरिया। पड़ियाछौँ भवार्णवे मायाबद्ध हञा ॥ 33 ॥ कृपा करि' कर मोरे पदधूली-सम। तोमार सेवक, करों तोमार सेवन ॥"34 ॥ अनुवाद-प्रभो! मैं आपका नित्यदास हूँ। आपको भुलाकर मैं मायाबद्ध होकर अथाह भवसागरमें पड़ा हूँ। आप कृपा करके मुझे श्रीचरणकमलकी धूलिके रूपमें ग्रहण करें। मैं आपका सेवक बनकर नित्यकाल आपकी सेवा करूँगा ॥ "33-34 ॥ नामसङ्कीर्तनमें सिद्धि-प्रार्थना :- पुनः अति उत्कण्ठा, दैन्य हइल उद्गम। कृष्ण-ठाञि मागे प्रेम-नामसङ्कीर्त्तन ॥ 35 ॥

484 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/35-41 ] अनुवाद—ऐसा कहते-कहते महाप्रभुके हृदयमें अत्यन्त उत्कण्ठा बढ़ गयी, वे दीनतापूर्वक पुनः श्रीकृष्णसे नामसङ्कीर्तनमें प्रीतिके लिये प्रार्थना करने लगे ॥ 35 ॥ सिद्धि अथवा साध्यभक्तिके बाह्यलक्षण :- पद्यावलीके 84वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका छठा श्लोक— “नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गद रुद्धया गिरा। पुलकैनिचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति ॥ 36 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे नाथ, आपके नामग्रहणसे कब मेरे नयनयुगल अश्रुधारासे सुशोभित होंगे? [कब] वाक्य निकलनेके समय मुखसे गद्गद-स्वर बाहर निकलेगा और मेरा समस्त शरीर पुलकावलियोंसे व्याप्त होगा ? 36 ॥ अनुभाष्य- हे प्रभो, तव नामग्रहणे (नाम-भजनकाले) मम गलदश्रुधारया (गलन्ती या अश्रुधारा तया सह) नयनं, गद्गदरुद्धया (गद्गदेन स्वरभेदेन रुद्धया) गिरा (वचसा) वदनं, पुलकैः (रोमाञ्चैः सह) निचितं (व्याप्तं) वपुः कदा भविष्यति ? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। भक्तिसन्दर्भकी 69 संख्यामें उद्धृत प्रभुकी उक्ति— “श्रुतमप्यौपनिषदं दूरे हरिकथामृतात्। यत्र सन्ति द्रवच्चित्तकम्पाश्रुपुलकादयः ॥” [अर्थात् “हरिकथामृतसे शुद्ध जीवके हृदयमें जो चित्तका द्रवीभूत होना, कम्पन, अश्रु, पुलकादि अप्राकृत सात्त्विकभाव प्रकट होते हैं, वे सब लक्षण उपनिषद्में उक्त ब्रह्मज्ञानके श्रवणसे नहीं होते, अतएव उसे दूर ही रहने दो।”] ॥ 36 ॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- प्रेमधन बिना व्यर्थ दरिद्र जीवन ! ‘दास’ करि’ वेतन मोरे देह’ प्रेमधन ! !” 37 ॥ अनुवाद-प्रेमधनके बिना दरिद्र जीवन व्यर्थ है। प्रभो ! आप मुझे सेवकके रूपमें ग्रहणकर वेतनके रूपमें अपना प्रेमधन प्रदान करें!!” 37 ॥ सिद्धि अथवा साध्यभक्तिके आन्तरिक लक्षण; अप्राकृत विप्रलम्भ (श्रीकृष्णविरह)-मूलक-भजन :- रसान्तरावेशे हइल वियोग-स्फुरण। उद्वेग, विषाद, दैन्ये करे प्रलापन ॥ 38 ॥ अनुवाद-महाप्रभुमें वियोग स्फुरित होनेपर रसान्तरके कारण आवेश आ गया। वे उद्वेग, विषाद और दैन्य भावोंके उदय होनेपर प्रलाप करने लगे ॥ 38 ॥ पद्यावलीके 327वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका सातवाँ श्लोक :- “युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्। शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द-विरहेण मे॥” 39 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे गोविन्द, आपके अदर्शनमें मुझे 'निमेष'-काल भी 'युग'के समान प्रतीत हो रहा है; नेत्रोंसे वर्षाकी भाँति अश्रु प्रवाहित हो रहे हैं, समस्त जगत् शून्यके समान लग रहा है ॥ 39 ॥ अनुभाष्य- गोविन्दविरहेण (ब्रजेन्द्रनन्दनस्य विच्छेदेन) मे (मम) निमेषेण (त्रुटिलवपरिमितकालेन अत्यल्पेन) युगायितं (युगपरिमित-कालवत् तद्वत् आचरितं) चक्षुषा (नयनेन) प्रावृषायितं (वर्षाकालीन-मेघवत् आचरितं) सर्वं जगत् शून्यायितं (शून्यवत् आचरितम्- आभातीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 39 ॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- उद्वेगे दिवस ना याय, ‘क्षण’ हैल ‘युग’-सम। वर्षार मेघप्राय अश्रु वर्षे नयन ! ! 40 ॥ गोविन्द-विरहे शून्य हइल त्रिभुवन ! तुषानले पोड़े, -येन ना याय जीवन ॥ 41 ॥ अनुवाद-श्रीनन्दनन्दनके बिना, उद्वेगके कारण मेरे

[ 20/40-47 बीसवाँ अध्याय 485 दिन नहीं बीतते। एक-एक क्षणका समय भी एक-एक युगके समान प्रतीत होता है। जैसे मेघोंसे वर्षा होती है, वैसे ही मेरे नेत्रोंसे निरन्तर आँसुओंकी वर्षा हो रही है। गोविन्दके विरहमें सारा संसार शून्य-सा प्रतीत हो रहा है। इस तुषानलरूपी (भूसीमें लगी अग्निके समान) विरहाग्निमें सदा-सर्वदा शरीर जल रहा है, परन्तु प्राण नहीं निकल रहे हैं॥ 40-41 ॥ कृष्ण उदासीन हैला करिते परीक्षण। सखी सब कहे, – 'कृष्णे कर उपेक्षण ॥' 42 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण मेरी परीक्षा लेनेके लिये मुझसे उदासीन हो गये हैं। समस्त सखियाँ कह रही हैं, – 'तुम भी कृष्णकी उपेक्षा करो॥' 42 ॥ एतेक चिन्तिते राधार निर्मल हृदय। स्वाभाविक प्रेमार स्वभाव करिल उदय ॥ 43 ॥ एकान्त श्रीकृष्णपरतन्त्रा-शिरोमणि श्रीराधाभावमय महाप्रभु :- हर्ष, उत्कण्ठा, दैन्य, प्रौढ़ि, विनय। एतभाव एक-ठानि करिल उदय ॥ 44 ॥ एतभावे राधार मन अस्थिर हैला। सखीगण-आगे प्रौढ़ि-श्लोक ये पड़िला ॥ 45 ॥ अनुवाद—इस प्रकारके चिन्तनने श्रीराधाके निर्मल हृदयमें स्वाभाविक प्रेमके स्वभावका उदय करवाया। उनमें हर्ष, उत्कण्ठा, दैन्य, प्रौढ़ि और विनय-इतने भाव एक साथ उदित हो गये। इन भावोंके एक साथ उदित होनेसे श्रीराधाका मन अस्थिर हो गया। उन्होंने सखियोंके समक्ष प्रौढ़ि (परिपक्व)-श्लोकका उच्चारण किया॥ 43-45 ॥ सेइ भावे प्रभु सेइ श्लोक उच्चारिला। श्लोक उच्चारिते तद्रूप आपने हइला ॥ 46 ॥ अनुवाद—श्रीराधाके उसी भावमें विभावित होकर महाप्रभुने उस श्लोकका उच्चारण किया। वे श्लोकका उच्चारण करते ही स्वयं भी श्रीराधाके समान हो गये॥ 46 ॥ सिद्धि अथवा साध्यभक्तिकी निष्ठा अर्थात् एकान्त श्रीकृष्ण-परतन्त्रता :- पद्यावलीके 134वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका आठवाँ श्लोक- “आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्मर्महतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः ॥ 47 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपने चरणोंकी सेवामें अनुरक्त मुझ दासीको कृष्ण प्रगाढ़ आलिङ्गन करें अथवा पैरोंके तले रौंद डालें अथवा अदर्शनके द्वारा मर्माहत ही करें, वे-लम्पट पुरुष, मेरे प्रति जिस प्रकारका भी विधान क्यों नहीं करें, [तथापि] वे अन्य कोई नहीं, मेरे ही प्राणनाथ हैं॥ 47 ॥ अनुभाष्य- सः पादरतां (चरण-सेवैकपरायणां किङ्करीं) मां (राधाम्) आश्लिष्य (गाढ़तरं समालिंग्य) वा पिनष्टु (आत्मसात् करोतु) वा अदर्शनात् (विच्छेदात्) मां मर्महतां (मर्मसुप्रपीड़ितां) करोतु वा, सः लम्पटः (निजेन्द्रियतर्पणसुखाभिनिविष्टः) यथा तथा विदधातु (यदृच्छया अन्याभिः वल्लभाभिः सह विहरतु वा) तु (तथापि) सः (कृष्णः) एव मत्प्राणनाथः (मद्दयितः एव), अपरः न। श्लोक-भावानुवाद—कृष्ण चरण-सेवापरायण दासी मुझ राधाको प्रगाढ़ आलिङ्गनके द्वारा आत्मसात् करें अथवा विच्छेदके द्वारा मेरे हृदयको सुप्रीड़ित करें, अथवा वे (निजेन्द्रियतर्पणके सुखमें अभिनिविष्ट) लम्पट स्वेच्छासे अन्य प्रियतमाओंके साथ विहार करें, तथापि कृष्ण मेरे प्राणप्रियतम ही हैं, अन्य कोई नहीं ॥ 47 ॥

486 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/48-52 ] श्लोकके अर्थकी व्याख्या ; “मैं आपकी हूँ, आप मेरे हैं, अन्य किसी वस्तुकी क्या आवश्यकता है?” :- आमि—कृष्णपद-दासी, तेंहो—रससुखराशि, आलिङ्गिया करे आत्मसाथ। किवा ना देय दरशन, ना जाने मोर तनु-मन, तबु तेंहो—मोर प्राणनाथ॥48॥ अनुवाद—सखि! मैं तो श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी दासी हूँ और वे रसिकशेखर सुखके सागर हैं। वे प्रगाढ़ आलिङ्गनके द्वारा मुझे आत्मसात् करें अथवा अपने दर्शन न देकर मर्मान्तिक पीड़ा प्रदान करें, तथापि वे मेरे प्राणनाथ ही हैं॥48॥ सखि हे, शुन मोर मनेर निश्चय। किवा अनुराग करे, किवा दुख दिया मारे, मोर प्राणेश्वर—कृष्ण, अन्य नय॥49॥ अनुवाद—हे सखि, मेरे मनके निश्चयको सुनो। श्रीकृष्ण मेरे प्रति अपने अनुरागको प्रकट करें अथवा मुझे दुःख देकर मार डालें, तथापि श्रीकृष्ण ही मेरे प्राणेश्वर हैं, अन्य कोई नहीं॥49॥ मदीयत्व और तदीयत्व-स्नेह, अथवा मधु और घृत स्नेह-माधुर्य-वैचित्र्य-वर्णन; उनके साथ मेरे सुखकालमें भी कृष्णेन्द्रिय-तर्पणकी इच्छुक मैं उनकी परतन्त्र :- छाड़ि' अन्य नारीगण, मोर वश तनुमन, मोर सौभाग्य प्रकट करिया। ता-सबारे देय पीड़ा, आमा-सने करे क्रीड़ा, सेइ नारीगणे देखाञा॥50॥ उनके विरहमें मेरे दुःखकालमें भी श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंके तर्पणकी इच्छुक मैं उनकी परतन्त्र :- किवा तेंहो लम्पट, शठ, धृष्ट, सकपट, अन्य नारीगण करि' साथ। मोरे दिते मनःपीड़ा, मोर आगे करे क्रीड़ा, तबु तेंहो—मोर प्राणनाथ॥51॥ अनुवाद—मेरे सौभाग्यको प्रकटकर यदि श्रीकृष्ण अन्य रमणियोंको त्यागकर मेरे तन और मनके सम्पूर्णरूपसे वशीभूत होवें और उन रमणियोंको दिखला-दिखलाकर उनके सामने मेरे साथ क्रीड़ा करके उन सबको पीड़ा दें अथवा वे लम्पट, शठ, धृष्ट, कपटी श्रीकृष्ण अन्य रमणियोंको अपने साथ लेकर मेरे मनको पीड़ा प्रदान करनेके लिये मेरे समक्ष उनके साथ क्रीड़ा करें, तब भी वे ही मेरे प्राणनाथ हैं॥50-51॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मोरे वश तनुमन',—काय और मनके एकान्त बाध्य॥50॥ एकान्तिकी कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छा—'तुम्हारी सेवा करनेमें जितना भी दुःख मिले, वही परम सुख हैं' :- ना गणि आपन दुःख, सबे वाञ्छि ताँर सुख, ताँर सुख—आमार तात्पर्य। मोरे यदि दिया दुःख, ताँर हैल महासुख, सेइ दुःख—मोर सुखवर्य॥52॥ अनुवाद—मुझे अपने कष्टोंकी तनिक भी चिन्ता नहीं है, मैं सदा-सर्वदा श्रीकृष्णके सुखकी कामना करती हूँ। उन्हें सर्वप्रकारसे सुखी रखना ही मेरे जीवनका मूल उद्देश्य है। यदि मुझे दुःख देनेसे उन्हें सुख मिले, तो वह दुःख ही मेरे लिये परम सुख है॥52॥ अनुभाष्य—भक्त अपने सुख-दुःखको नहीं गिनता; जिससे श्रीकृष्णके सुखका उदय होता है, वह उसके लिये ही अखिल चेष्टायुक्त रहता है। श्रीकृष्णके सुखके उदयके अतिरिक्त भक्तका अपना स्वतन्त्र सुख अन्य कुछ भी नहीं है। श्रीकृष्णके द्वारा भक्तको दुःख देकर महासुखी होनेपर, भक्त उस प्रकारके दुःखको ही सर्वोत्तम निज-सुख मानता है। प्राकृत रसिकाभिमानी अतत्त्वज्ञ सहजिया-सम्प्रदायमें कोई-कोई अपने सुखकी अभिलाषाको ही इच्छित फल मानते हैं, कोई प्राकृतसुखकी अपेक्षा कृष्णसेवाके उपलक्षमें 'स्वयं ही अधिकतर सुखभोग करूँगा',—आदि नाना प्रकारके स्वसुखभोग-

[ 20/52 बीसवाँ अध्याय 487 तात्पर्यमय कर्मकाण्डको ही अपनी भजन-चेष्टाका 'फल' मानते हैं। वास्तवमें उनकी इस प्रकारकी चेष्टा और कल्पना-शुद्धभजनके विषयमें कपटतामूलक अनभिज्ञताका ही फलमात्र है॥ 52 ॥ अमृतानुकणिका-श्रीजीव गोस्वामीने प्रीति-सन्दर्भमें प्रीतिके तीन लक्षण बतलाये हैं-

  1. स्वरूप-लक्षण-'विषयानुकूल्यात्मक'-प्रीतिके विषय श्रीकृष्णके अनुकूल जो उन्हें सुखकर हो अथवा श्रीकृष्णको प्रीतिकर हो जिसके द्वारा कृष्ण प्रसन्न हों, भक्तका यही एकमात्र ध्येय होता है।
  2. तटस्थ-लक्षण (क)-'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा अर्थात् भक्तकी जितनी भी स्पृहाएँ होती हैं, वे श्रीकृष्णके सुखके लिये होती हैं।
  3. तटस्थ-लक्षण (ख)-'तदनुभव-हेतुकोल्लास'-ज्ञान। जैसे यशोदाजी कृष्णको गोदीमें लेकर प्यार कर रही हैं। शिशु कृष्णके अभी दो दाँत ही निकले हैं और वे मुस्कुराने लगे। कृष्णको मुस्कराते देखकर यशोदाजीकी प्रीति और वर्धित हो गयी और उनका मन उल्लाससे भर गया। कृष्णको प्रसन्न देख करके यशोदाजीको जो प्रसन्नता होती है, उसको अनुभव-हेतुकोल्लासमय ज्ञान कहते हैं। 'विषयानुकूल्यात्मक'-श्रीकृष्ण-प्रीतिके आश्रय भक्तोंकी अनुकूल भावसे श्रीकृष्णैक-सुखतात्पर्यमयी चेष्टाएँ होती हैं, उसके विरोधमें उनका कोई भी कार्य नहीं होता। साधकको भी कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये जो श्रीकृष्ण, गुरु अथवा वैष्णवोंके लिये प्रीतिकर नहीं हो। यशोदाजीका कृष्णके प्रति अनुकूल भाव है। किन्तु कभी वे कृष्णके लिये ही उनको छोड़कर दूधकी रक्षा अथवा रसोईकी व्यवस्था करने चली जाती हैं। यद्यपि उनके ऐसे कार्यसे कृष्ण रोने लगते हैं, तथापि यह प्रतिकूल भाव नहीं है। यशोदाजी यह समझती हैं कि कृष्ण अभी अबोध बालक है, उसको पूरा ज्ञान नहीं है। वे ये सब कार्य भी कृष्णके अनुकूल भावसे ही करती हैं। कभी राधाजी कृष्णको छोड़कर चली जा रही हैं और कृष्ण उन्हें रोकनेका प्रयास कर रहे हैं, परन्तु वे रुक नहीं रहीं। यह भी कृष्णके सुखके लिये है। यह राधाजीका जो वक्र भाव है जिसे 'मान' कहते हैं, यह प्रेमका ही विकार है। अनुकूल भावसे ही कृष्णसेवा उनके प्राण-स्वरूप है, यह प्रीतिका स्वरूप- लक्षण है। 'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा अर्थात् भक्तमें कृष्णको पानेकी इच्छा होती है जिसके द्वारा वह श्रीकृष्णकी सेवा करके उनको प्रसन्न कर सके। इसलिये श्रीकृष्णसे मिलनेकी लालसा उत्पन्न होना एक तटस्थ लक्षण है। जैसे श्रीकृष्ण द्वारकामें हैं और गोपियाँ उनसे बहुत दूर वृन्दावनमें हैं। उनको श्रीकृष्णसे मिलने की लालसा क्यों होती है? द्वारकामें श्रीकृष्णने सोलह हजार महिषियोंके साथ विवाह किया है और यदि वे बहुत आनन्दसे उनके साथमें रह रहे हैं, तो गोपियाँ उनसे मिलनेके लिये क्यों इतनी आतुर हैं? यद्यपि राधाजी कहती हैं-'ना गणि आपन दुःख, सबे वाञ्छि ताँर सुख',-तो श्रीकृष्ण द्वारकामें आनन्दसे रहें। तथापि राधाजीकी सब समय श्रीकृष्णसे मिलनेकी स्पृहा है। यदि श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जीवन द्वारकामें ही सुखसे रहें और गोपियोंसे कभी भी न मिलें, तो क्या गोपियाँ या राधाजी प्रसन्न होंगी? उनका क्या ऐसा विचार होगा कि श्रीकृष्णका द्वारकामें सब समय सुखमय जीवन हो और हमको उनका विरह हो, क्योंकि विप्रलम्भ रस सबसे श्रेष्ठ है? तो क्या ऐसा विप्रलम्भ भाव भक्तोंको और व्रजवासियोंको चाहिये कि भले ही श्रीकृष्ण हमको न मिले और वे सदा ही द्वारकामें रहें, हम उनसे मिलना नहीं चाहते, वे सदा वहीं प्रसन्न रहें? नहीं। इसलिये प्रियताका 'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा तटस्थ लक्षण भी अवश्य उसके साथ रहेगा। राधाजी और व्रजवासियोंकी श्रीकृष्णसे मिलनेकी उत्कण्ठा सदा रहेगी और मिलना चाहते हैं, किसलिये? इसलिये कि वे श्रीकृष्णकी सेवा कर सकें और उनको प्रसन्न कर सकें।

488 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/52 ]

श्रीकृष्ण यदि दूर हैं, तो वे कैसे प्रसन्न करेंगे? यदि श्रीकृष्ण सब समय ही यशोदाजी से दूर रहें, तो वे कैसे उनकी सेवा करेंगी? यशोदाजी कृष्णको अपनी गोदमें लेकर प्यार करना चाहती हैं। कभी-कभी उनके लिये इसलिये रोती हैं कि वह मक्खन नहीं चुराता, मैं उसकी कमर नहीं बाँधती। विरहमें रोते समय कहती हैं,-'अहो! कृष्ण कितना चञ्चल था। उसकी यह चञ्चलता कितनी प्यारी लगती थी। मेरी सखियाँ आकर उलाहना देती थीं कि कृष्ण हमारे घरमें आकर मक्खन चोरी करता है और मक्खन नहीं मिलता तो मटकी फोड़ देता है, कभी बछड़ोंको असमयमें खोल देता है। मुझे और रोहिणीको दिनभर व्यस्त रखता था। कभी इधर जाता था, कभी उधर जाता था, कभी बन्दरको पकड़ लेता था, कभी किसी साँडके सींगको पकड़ लेता था और कभी लटकती हुई तलवारको पकड़ लेता था। मैं इधर आती थी, तो वह उधर कुछ उत्पात करता था।' तो यशोदाजी को यह अच्छा लगता था या बुरा? उनको बहुत अच्छा लगता था। वे कभी थोड़ा क्रोध करती थीं कि मैं दिन भर तुम्हारे कारण व्यस्त रहती हूँ, कुछ देर शान्त नहीं बैठ सकते हो? और जब श्रीकृष्ण द्वारका चले गये, तब यशोदाजी उन सब लीलाओंका चिन्तन करके कितने दुःखसे रोती हैं कि वह सब समय हमको व्यस्त रखता था। परन्तु जब तक श्रीकृष्ण निकट नहीं रहेंगे, तब तक सेवा नहीं होगी। श्रीकृष्ण दूर रहें अथवा निकट रहें-उनको प्रसन्न करनेकी जो क्रिया होती है-यह प्रियताका स्वरूप लक्षण है। उनको प्राप्त करनेकी अभिलाषा किसलिये होती है? इसलिये कि उसके द्वारा उनकी अनुकूल रूपसे सेवा करनेका सुयोग मिलता है-यह प्रियताका तटस्थ लक्षण है। यदि किसी व्यक्तिके अन्दरमें श्रीकृष्णको पानेका भाव नहीं है कि वे दूर रहें या कहीं भी रहें, वे प्रसन्न रहें, तो ऐसे व्यक्तिमें कभी भी प्रेमाभक्ति या सेवाका भाव नहीं होता। भगवान् हमें मिलें या न मिलें, जब वे प्रसन्न होंगे तो आ जायेंगे। हम लोगोंको कोई चिन्ता करने अथवा साधन-भजन करनेकी आवश्यकता नहीं हैं, केवल वे प्रसन्न रहें-ऐसा ब्रह्मवादी लोगोंका विचार होता है। किन्तु प्रियजनके प्रतिकूल या अपने सुखके लिये उनको प्राप्त करनेकी अभिलाषा भी प्रियताके प्रतिकूल है। जैसे ध्रुव महाराजको भगवान्‌को प्राप्त करनेकी लालसा हुई, किन्तु केवल विशाल राज्यकी प्राप्तिके लिये, उनकी सेवा करनेके भावसे नहीं। यह प्रियता नहीं है। यदि प्रियजनको मिलनेसे उनके सुखमें कोई बाधा होती है, तब उस अवस्थामें साधक या कोई भी व्यक्ति उनसे मिलना नहीं चाहता, यह प्रियताका प्रतिकूल भाव है। इस विषयमें एक और भी विचार है-यदि श्रीकृष्ण अथवा गुरुके मिलनेसे हमारे सुखमें बाधा आ जाय, तो उस समय उनसे मिलनेकी लालसा नहीं होती। जैसे किसी शिष्यकी लोग प्रशंसा कर रहे हैं, उसको उपहार दे रहे है और उस समय वहाँ गुरुजी आयें, तो शिष्यको छोड़कर सभी गुरुजीको प्रणाम करके उनका सम्मान करेंगे। तब उस शिष्यके मनमें यह भावना आयेगी कि गुरुजी नहीं आते तो अच्छा होता। जैसे सभामें बृहस्पतिजीके आनेपर इन्द्रने किया था। (भाः 6/7/7-8)- स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्च ह। नाभ्यनन्दत संप्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभिः ॥ 7 ॥ वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम्। नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्नपि सभागताम् ॥ 8 ॥ [अर्थात् “इसी समय देवताओंके और स्वयं देवराज इन्द्रके परमगुरु एवं सुर-असुर सभीके पूजनीय मुनिश्रेष्ठ बृहस्पति सभामण्डलमें उपस्थित हुए। अपने सम्मुख देवगुरु बृहस्पति को आया देखकर भी देवराज इन्द्र अपने सिंहासनसे नहीं उठे और न ही उन्हें आसनादि प्रदान करके उनका अभिनन्दन किया। यहाँ तक कि

[ 20/52–55 बीसवाँ अध्याय 489 गुरुके प्रति गौरव प्रदर्शनके लिये किञ्चित्मात्र भी हिले-डुले नहीं।”] किन्तु जब श्रीकृष्णके आनेपर उनकी सेवामें बाधा होगी, तब शुद्धभक्तोंमें श्रीकृष्णसे मिलनेकी लालसा नहीं होती। यदि श्रीकृष्ण द्वारकासे वृन्दावन आयें और एक कुञ्जमें बैठकर शोक कर रहे हों कि मैं माता-पिताको (देवकी-वसुदेवको), सोलह हजार महिषियों आदि निजजनोंको छोड़कर यहाँ क्यों आया? तब वृन्दावनवासी भक्तजनोंके हृदयमें ऐसी भावना आयेगी कि यदि हमारी सेवाके द्वारा अथवा हमसे मिलनेमें आपको कोई क्लेश है, तो आप द्वारकामें चले जाइये। इसलिये राधाजी कह रही हैं,—‘ना गणि----सेई दुख मोर सुखवर्य'—आपके विरहका दुःख हमारे लिये परम सुख है। राधाजीका भाव यही है कि किसी भी प्रकारसे श्रीकृष्णको प्रसन्नता होनी चाहिये। राधाजीने उद्धवजीको कहा था,—'यदि कृष्ण हमें छोड़ सकते है, तो हम उनको क्यों नहीं छोड़ सकती हैं? हमने भी उनको छोड़ दिया। आप मथुरामें जाकर उनसे कहना कि गोपियाँ व्रजमें बहुत आनन्दसे रह रही हैं। हे उद्धव, मैं जानती हूँ कि आपने यहाँ जो हमारी दशा देखी है, उसे कृष्णसे कहोगे। किन्तु उनको यह सब एक बारमें ही मत कहना। एक दिन थोड़ीसी बात कहना, पुनः कुछ-कुछ दिनोंके बाद थोड़ीसी अन्य-अन्य बातें कहना। पुराना कपड़ा पानीमें भीगनेपर निचोड़नेसे फट जाता है, इसलिये एक साथमें सब कुछ मत कहना। कृष्णका हृदय बड़े दुःखसे जर्जर हो चुका है। यदि वे दुःख पायेंगे तो उनका हृदय टूट जायेगा।' राधाजीका श्रीकृष्णके प्रति इतना उन्नत प्रेम है, उद्धवजीकी ऐसी धारणा ही नहीं थी। इसलिये यदि प्रियतमको या हमारे विषय श्रीकृष्णको हमसे मिलनेसे कष्ट होगा, तो हमें ऐसी अभिलाषा नहीं है और यदि उनको सुख है, तो हम उनसे मिलेंगे। प्रियतामें प्रथम लक्षण है—श्रीकृष्णको सुख हो, ऐसी क्रिया। द्वितीय लक्षण है—उनसे मिलनेकी लालसा, जिसके द्वारा उनकी सेवा कर सकें और तृतीय लक्षण है—उनकी सेवाके लिये चिन्ता करनेमें परम उल्लास हो। प्रथम लक्षण मूल लक्षण है और अन्य दो तटस्थ लक्षण हैं। इनके सम्मिलनसे प्रियता होती है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 52 ॥ निरन्तर श्रीकृष्णेन्द्रिय-तर्पण अथवा श्रीकृष्ण-सुखवर्धन चेष्टा :- ये नारीरे वाञ्छे कृष्ण, तार रूपे सतृष्ण, तारे ना पाञा हय दुःखी। मुइ तार पाये पड़ि', लञा याङ हाते धरि', क्रीड़ा कराञा ताँरे करौं सुखी ॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण जिस नारीके रूपके प्रति सतृष्ण होकर उसकी अभिलाषा करते हैं, परन्तु उसे प्राप्त नहीं कर पानेके कारण दुःखी होते हैं, मैं उस नारीके चरणोंमें पड़कर उसके हाथोंको पकड़कर श्रीकृष्णके पास ले जाऊँगी और श्रीकृष्णकी उसके साथ क्रीड़ा करवाकर मैं उन्हें प्रसन्न करूँगी ॥ 53 ॥ कान्ता कृष्णे करे रोष, कृष्ण पाय सन्तोष, सुख पाय ताड़न-भर्त्सने। यथायोग्य करे मान, कृष्ण ताते सुख पान, छाड़े मान अल्प-साधने ॥ 54 ॥ श्रीकृष्णकी सम्भोग-कामिनीका तिरस्कार :- सेइ नारी जीये केने, कृष्ण-मर्म नाहि जाने, तबु कृष्णे करे गाढ़ रोष। निज-सुखे माने लाभ, पड़ुक तार शिरे बाज, कृष्णेर मात्र चाहिये सन्तोष ॥ 55 ॥ अनुवाद—कान्ता यदि श्रीकृष्णके प्रति रोष प्रदर्शित करती है, तो श्रीकृष्ण उससे सन्तुष्ट होते हैं। वे कान्ताके द्वारा डाँट-फटकार और तिरस्कार करनेपर प्रसन्न होते हैं। जब कान्ता यथायोग्य मान करती है, तब श्रीकृष्णको सुख प्राप्त होता और उनके थोड़े प्रयाससे ही कान्ता अपने मानको छोड़ देती है। किन्तु

490 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/54-58 ] जो नारी कृष्णके मर्मको नहीं जानकर कृष्णके प्रति गाढ़ रोष करती है, वह जीवित ही क्यों रहती है? जो अपने सुखमें ही लाभ मानती है, उसके सिरपर तो वज्र पड़ना ही चाहिये। मैं तो केवल श्रीकृष्णका ही सन्तोष चाहती हूँ॥ 54-55॥ अनुभाष्य-जो भक्त अपने सुखमें अपनेको कृतार्थ मानता है, उसका सर्वनाश हो जाता है, वह प्राकृत सम्भोग-परायण सहजिया 'अभक्त' हो जाता है॥ 54-55॥ श्रीकृष्णका सुख विधान करनेवाली अपने प्रतिकूल श्रीकृष्णसेविकाका भी आदर :- ये-गोपी मोर करे द्वेषे, कृष्णेरे करे सन्तोषे, कृष्ण यारे करे अभिलाष। मुइ तार घरे याञा, तारे सेवों दासी हञा, तबे मोर सुखेर उल्लास॥ 56॥ अनुवाद-जो गोपी श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करती है और श्रीकृष्ण भी उसकी अभिलाषा करते हैं, किन्तु वह मुझसे द्वेष करती है, तथापि मैं उस गोपीके घरमें जाकर उसकी दासी बनकर उसकी सेवा करूँगी, तभी मेरा सुख वर्धित होगा॥ 56॥ कोढ़-रोगी ब्राह्मणकी पत्नीके पतिव्रता-धर्मका वर्णन :- कुष्ठी-विप्रेर रमणी, पतिव्रता-शिरोमणि, पति लागि' कैल वेश्यार सेवा। स्तम्भिल सूर्येर गति, जीवाइल मृत पति, तुष्ट कैल मुख्य तिन देवा॥ 57॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कहा जाता है कि किसी कोढ़से ग्रस्त ब्राह्मणकी पतिव्रता स्त्रीने पतिकी सन्तुष्टिके लिये पतिकी प्रिया वेश्याकी सेवा की थी; पतिकी मृत्युके समय पातिव्रत्यके बलसे उसने सूर्यकी गतिको रोककर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर-इन तीन देवताओंको सन्तुष्ट करके अपने मृत पतिको जीवित किया था। तात्पर्य यह है कि कृष्णके प्रति दृढ़-पातिव्रत्य ही जीवका शृङ्गाररससे उत्पन्न उत्तम धर्म है॥ 57॥ अनुभाष्य-आदित्य-पुराणमें और मार्कण्डेय-पुराण (15/19)में एवं पद्मपुराणमें उल्लिखित है कि किसी कोढ़ी ब्राह्मणकी पतिव्रता-शिरोमणि पत्नीने अपने अयोग्य कोढ़ी पतिकी वासनाकी परितृप्तिके लिये पापके वासस्थान वेश्याके भवनको शुद्ध करके वेश्याके साथ अपने निकम्मे कामुक पतिके सम्मिलनका प्रयास किया था। वेश्याके द्वारा उसकी बातको मान लेनेपर पतिव्रता ब्राह्मणी अपने कोढ़ी पतिको उसकी इच्छानुसार वेश्यालयमें ले गयी। वह कोढ़ी पापी नाममात्रका ब्राह्मण पतिव्रता पत्नीकी निष्ठाको देखकर अन्तमें पापसे सम्पूर्ण रूपसे निवृत्त होकर जब रात्रिमें अपने घर लौट रहा था, तब माण्डव्य-ऋषिके शरीरसे उसके पैरके स्पर्श होनेपर ऋषिने उसे अभिशाप दिया। पतिव्रता ब्राह्मणीने जब सुना कि उसके पतिके अनजानेमें किये गये कर्मसे समाधिके भङ्ग होनेके कारण ऋषिने क्रोधित होकर 'सूर्योदयके बाद ही उसके प्राण छूट जायेंगे' ऐसा कहकर अभिशाप दिया है एवं उसके फलस्वरूप पतिव्रता होनेपर भी उसका विधवा बनना अवश्यम्भावी है, तब उसके निवारणके लिये उसने सूर्योदयको स्थगित करनेकी प्रतिज्ञा की। उसके इस प्रयासको देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव,-इन प्रधान तीन देवोंने उसके पास आकर पतिव्रताकी पति-परायणतासे सन्तुष्ट होकर उसके पतिके पुनः स्वस्थ होने और नवजीवन प्राप्तिकी व्यवस्था कर दी। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार अपने स्वार्थसे रहित होकर केवल पातिव्रत्य ही (केवल-सेव्यके सुखकी वाञ्छा ही) शुद्धभक्तजनोंके लिये उचित है॥ 57॥ “कृष्णप्रेमभावित-चित्त-इन्द्रियकाया” :- कृष्ण-मोर जीवन, कृष्ण-मोर प्राणधन, कृष्ण-मोर प्राणेर पराण। हृदय-उपरे धरौं, सेवा करि' सुखी करौं, एइ मोर सदा रहे ध्यान॥ 58॥

[ 20/58-64 बीसवाँ अध्याय 491

अनुवाद—श्रीकृष्ण मेरे जीवन स्वरूप हैं, श्रीकृष्ण मेरे प्राणधन हैं, श्रीकृष्ण मेरे प्राणोंके भी प्राण हैं। मैं श्रीकृष्णको सदा अपने हृदयमें धारण करती हूँ, उनकी सेवा करके उन्हें सुखी करूँ, यह बात ही सदा मेरे ध्यानमें रहती है॥58॥

अनुवाद—श्रीराधाके ये वचन विशुद्ध प्रेमके लक्षण प्रकाशित करनेवाले हैं, श्रीगौरसुन्दर उन्हींका आस्वादन कर रहे थे। श्रीराधाकी भावावस्थामें होनेके कारण उनका मन अस्थिर हो गया, उनके सम्पूर्ण शरीरमें सात्त्विक भाव प्रकट हो गये और वे अपने मन एवं देहको धारण नहीं कर पा रहे थे॥61॥

समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णसुखका विधान और निरन्तर श्रीकृष्ण-किङ्करी होनेका अभिमान :—

मोर सुख—सेवने, कृष्णेर सुख—सङ्गमे, अतएव देह देङ दान। कृष्ण मोरे ‘कान्ता’ करि’, कहे मोरे ‘प्राणेश्वरी’, मोर हय ‘दासी’-अभिमान॥59॥

श्रीकृष्णोन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छामें आत्मेन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छाका अभाव; स्वभजन-विप्रलम्भ-प्रयोजनावतार महावदान्य श्रीगौरका शिक्षाष्टकके द्वारा जीवको सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनात्मक श्रीमद्भागवतके फलके सारका वितरण :—

व्रजेश्वर-शुद्धप्रेम,— येन जाम्बुनद-हेम, आत्मसुखेर याँहा नाहि गन्ध। स्व-प्रेम जानांते लोके, प्रभु कैला एड् श्लोके, पद कैला अर्थेर निर्बन्ध॥62॥

अनुवाद—मेरा सुख श्रीकृष्णकी सेवा करनेमें है और श्रीकृष्णका सुख मुझसे मिलनेमें है, इसलिये मैं श्रीकृष्णको अपनी देह समर्पित करती हूँ। कृष्ण मुझे अपनी कान्ता मानकर अपनी प्राणेश्वरी कहते हैं, किन्तु मैं स्वयंको उनकी दासी ही मानती हूँ॥59॥

अनुवाद—श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति विशुद्धप्रेम जाम्बुनदीके सोनेकी भाँति है, उसमें आत्म-सुखकी गन्ध तक भी नहीं है। अपने उसी प्रेमका इस जगत्में प्रचार करनेके लिये महाप्रभुने (शिक्षाष्टकके) आठवें श्लोककी रचना की और उसके गूढ़ अर्थको प्रकाशित करनेवाले पदोंकी रचना की॥62॥

सम्भोगकी अपेक्षा सेवामें ही सेविकाकी असीम प्रीति :—

कान्त-सेवा-सुखपूर, सङ्गम हैते सुमधुर, ताते साक्षी—लक्ष्मी ठाकुराणी। नारायण-हृदि स्थिति, तबु पादसेवाय मति, सेवा करे ‘दासी’-अभिमानी॥"60॥

अनुभाष्य—पाठान्तरमें, 'व्रजेर विशुद्धप्रेम' (व्रजका विशुद्ध प्रेम), पाठान्तरमें, 'से-प्रेम' (वह-प्रेम)॥62॥

एइमत महाप्रभु भावाविष्ट हञा। प्रलाप करिला किछु श्लोक पड़िया॥63॥

अनुवाद—कान्त-सेवा सुखकी पूर्ण अवधि है, सेवा-सुख सङ्गमसे भी अधिक मधुर है, इसकी साक्षी लक्ष्मी ठाकुरानी हैं। यद्यपि वे नारायणके हृदयमें स्थित रहती हैं, तथापि नारायणकी चरणसेवा ही उनकी अभिलाषा है। इसलिये वे स्वयंको नारायणकी दासी मानकर उनकी सेवा करती हैं॥"60॥

अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु भावमें आविष्ट हो गये। उन्होंने प्रलाप करते हुए कुछ श्लोक पढ़े॥63॥

इस शिक्षाष्टकके स्वयं ही आस्वादक और स्वयं ही प्रचारक :—

श्रीराधा-भावमय महाप्रभुके द्वारा केवल प्रेम-आस्वादन :—

एइ राधार वचन, शुद्ध प्रेम-लक्षण, आस्वादये श्रीगौर-राय। भावे मन नहे स्थिर, सात्त्विके व्यापे शरीर, मन-देह धारण ना याय॥61॥

पूर्वे अष्ट-श्लोक करि’ लोके शिक्षा दिला। सेइ अष्ट-श्लोक आपने आस्वादिला॥64॥

492 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/64-72 ] अनुवाद-पहले महाप्रभुने आठ श्लोकोंकी रचना करके लोगोंको उसकी शिक्षा प्रदान की। और फिर उन्होंने स्वयं भी उन आठ श्लोकोंकी व्याख्या करके उनका आस्वादन किया॥ 64॥ 'श्रीशिक्षाष्टक'के श्रवण-कीर्तनसे निश्चय ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- प्रभुर् 'शिक्षाष्टक'-श्लोक येइ पड़े, शुने। कृष्णे प्रेमभक्ति तांर बाड़े दिने दिने ॥ 65 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा रचित 'शिक्षाष्टक'के श्लोकोंको जो व्यक्ति पढ़ता और सुनता है, उसके हृदयमें श्रीकृष्णके प्रति प्रेमभक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है॥ 65॥ पूर्णचन्द्रके उदित होनेपर समुद्रके उफननेके समान अतुल गम्भीरता होनेपर भी विप्रलम्भसे उत्पन्न दिव्योन्माद-महाभावमें महाप्रभुकी सदैव अस्थिरता :- यद्यपि प्रभु-कोटिसमुद्र-गम्भीर। नाना-भाव-चन्द्रोदये हयेन अस्थिर ॥ 66 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु करोड़ों समुद्रोंसे भी अधिक गम्भीर थे, तथापि अनेक भावरूपी चन्द्रमाओंके उदित होनेपर वे अस्थिर हो जाते थे॥ 66॥ महाभागवत, मुक्त, परमहंसगणोंके नित्य आस्वाद्य और विप्रलम्भ भावमें आविष्ट महाप्रभुकी प्रिय ग्रन्थावली :- येइ येइ श्लोक जयदेव, भागवते। रायेर नाटके, येइ आर कर्णामृते ॥ 67 ॥ सेइ सेइ भावे श्लोक करिया पठने। सेइ सेइ भावावेशे करेन आस्वादने ॥ 68 ॥ अनुवाद-जो-जो श्लोक श्रीजयदेवके गीत-गोविन्दमें, श्रीमद्भागवतमें, श्रीरायरामानन्दके जगन्नाथवल्लभ-नाटकमें और श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुर कृत श्रीकृष्णकर्णामृतमें वर्णित हैं, महाप्रभु उन-उन भावोंके अनुरूप श्लोकोंका पाठ करके उन-उन भावोंके आवेशमें उनका आस्वादन करते थे॥ 67-68॥ अनुभाष्य— 'जयदेव,'-अर्थात् उनके द्वारा रचित अष्टपदी अथवा गीतगोविन्द ॥ 67 ॥ अन्तिम बारह वर्षोंकी अन्त्यलीलामें निरन्तर कृष्णप्रेमका आस्वादन :- द्वादश वत्सर ऐछे दशा-रात्रि-दिने। कृष्णरस आस्वाद्ये दुइबन्धु-सने ॥ 69 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी बारह वर्षों तक रात-दिन ऐसी ही दशा थी। वे अपने दो बन्धुओंके (श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामStore/रामानन्दके) साथ कृष्णरसका आस्वादन करते थे॥ 69॥ साक्षात् भगवान् शेष-विष्णुकी भी महाप्रभुकी श्रीकृष्णप्रेम-दशाके वर्णनमें असमर्थता :- सेइ रस-लीला सब आपने अनन्त। सहस्र-वदने वर्णि' नाहि पांन अन्त ॥ 70 ॥ महासुकृतिके फलसे जीव उस सागरकी एक बूँदके स्पर्शसे धन्य :- जीव क्षुद्रबुद्धि कोन् ताहा पारे वर्णिते? तार एक कणा स्पर्शि आपना शोधिते ॥ 71 ॥ ग्रन्थके बड़े हो जानेके भयसे महाप्रभुकी प्रेमचेष्टा-वर्णनको विश्राम :- यत चेष्टा, यत प्रलाप,-नाहि पारावार। से-सब वर्णिते ग्रन्थ हय सुविस्तार ॥ 72 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी उन लीलाओंके रसका स्वयं अनन्त भी अपने सहस्र मुखोंके द्वारा वर्णन करके अन्त नहीं पाते। तब फिर क्षुद्रबुद्धिवाला कोई जीव कैसे उस लीला-रसका वर्णन कर सकता है? मैं तो स्वयंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे ही उसके एक कणका स्पर्श कर रहा हूँ। महाप्रभुकी जितनी चेष्टाएँ और जितने प्रलाप हैं, उनका कोई अन्त नहीं है। उन सबका वर्णन करनेसे ग्रन्थका बहुत विस्तार हो जायेगा॥ 70-72॥

[ 20/73-83 बीसवाँ अध्याय 493 चैतन्यभागवतमें विस्तृत वर्णन-हेतु इस ग्रन्थमें संक्षेपमें वर्णित, वहाँ संक्षेपमें वर्णन-हेतु यहाँपर विस्तृत वर्णित :- वृन्दावन-दास प्रथम ये लीला वर्णिल। सेइसब लीलार आमि सूत्रमात्र कैल॥ 73 ॥ ताँर त्यक्त 'अवशेष' संक्षेपे कहिल। लीलार बाहुल्ये ग्रन्थ तथापि बाड़िल ॥ 74 ॥ अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने पहले जिन लीलाओंका श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णन किया है, मैंने उन समस्त लीलाओंको केवल सूत्ररूपमें ही लिखा है। मैंने उनके द्वारा बची हुई महाप्रभुकी लीलाओंका संक्षेपमें वर्णन किया है, तथापि लीलाओंके आधिक्यके कारण ग्रन्थका विस्तार हो गया है॥ 73-74 ॥ अतएव सेइसब लीला ना पारि वर्णिवारे। समाप्त करिलुँ लीला करि' नमस्कारे ॥ 75 ॥ ये किछु कहिलुँ एइ दिग्दर्शन। एइ अनुसारे हवे तार आस्वादन ॥ 76 ॥ स्वयं श्रीचैतन्यकी इच्छासे परिचालित होनेपर भी ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- प्रभुर गम्भीर लीला ना पारि बुझिते। बुद्धि-प्रवेश नाहि, ताते ना पारि वर्णिते ॥ 77 ॥ अनुवाद-अतएव मेरे लिये महाप्रभुकी समस्त लीलाओंका वर्णन करना सम्भव नहीं है, इसलिये मैं उनकी लीलाओंको नमस्कार करके इस ग्रन्थको समाप्त कर रहा हूँ। मैंने अभी तक जो कुछ वर्णन किया है, वह उन लीलाओंका दिग्दर्शन मात्र है, इसके अनुसार ही भक्तगण उन लीलाओंका आस्वादन करेंगे। मैं महाप्रभुकी गम्भीर लीलाओंको नहीं समझ पाया, मेरी बुद्धिका उन लीलाओंमें प्रवेश नहीं है, इसलिये मैं उनका वर्णन नहीं कर पाया॥ 75-77 ॥ मानद ग्रन्थकारके द्वारा श्रोतृवर्गकी वन्दना :- सब श्रोता-वैष्णवेर वन्दिया चरण। चैतन्यचरित्र-वर्णन कैलुँ समापन ॥ 78 ॥ अनुवाद-मैं समस्त श्रोता-वैष्णवोंके चरणोंकी वन्दना करके चैतन्यचरित्रका वर्णन समाप्त कर रहा हूँ॥ 78 ॥ अलौकिक अधोक्षज श्रीगौरलीला-सिन्धु-बद्धजीवके स्पर्शसे परे, जीवके अभिमानमें दैन्यसे भरकर ग्रन्थकारके द्वारा उसके बिन्दुको स्पर्श करनेकी चेष्टा-मात्र :- आकाश-अनन्त, ताते यैछे पक्षीगण। यार यत शक्ति, तत करे आरोहण ॥ 79 ॥ ऐछे महाप्रभुर लीला नाहि ओर-पार। 'जीव' हञा केबा सम्यक् पारे वर्णिवार ? ॥ 80 ॥ अनुवाद-आकाश अनन्त है और जिस पक्षीकी जितनी शक्ति होती है, वह आकाशमें उतनी ऊँचाई तक उड़ता है। ऐसे ही महाप्रभुकी लीलाओंका भी ओर-छोर नहीं है, तब साधारण जीव कैसे उसका सम्पूर्ण रूपसे वर्णन कर सकता है? 79-80 ॥ अनुभाष्य-भा: 1/18/23 श्लोक देखें॥ 79 ॥ यावत् बुद्धिर गति, ततेक वर्णिलुँ। समुद्रर मध्ये येन एक कण छुँइलुँ ॥ 81 ॥ अनुवाद-मेरी बुद्धिकी जहाँ तक गति है, मैंने महाप्रभुकी लीलाओंका वहाँ तक वर्णन किया है, मानो मैंने समुद्रके एक कणको ही स्पर्श किया हो ॥ 81 ॥ श्रीठाकुर वृन्दावनका माहात्म्य और श्रीगौरलीला :- नित्यानन्द-कृपापात्र-वृन्दावन-दास। चैतन्यलीलाय तेंहो हयेन 'आदिव्यास' ॥ 82 ॥ अनुवाद-श्रीवृन्दावन-दास ठाकुर श्रीनित्यानन्द प्रभुके कृपापात्र हैं और वे चैतन्यलीलाके 'आदिव्यास' हैं॥ 82 ॥ अनुभाष्य-कोई-कोई कहते हैं कि,-परवर्ती शुद्ध गौरलीला-लेखक आचार्यगण भी 'आदिव्यास' श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके आनुगत्यमें उनके अभिन्न अङ्ग अथवा 'प्रकाश-व्यास'-कहलाये जा सकते हैं॥ 82 ॥ ताँर आगे यद्यपि सब लीलार भाण्डार। तथापि अल्प वर्णिया छाड़िलेन आर ॥ 83 ॥

494 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/83-91 ] ये किछु वर्णिलुँ, सेह संक्षेप करिया। लिखिते ना पारेन, तबु राखियाछेन लिखिया ॥ 84 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके समक्ष महाप्रभुकी समस्त लीलाओंका भण्डार था, तथापि उन्होंने उसमें-से अल्प लीलाओंका वर्णन करके अन्य सबको छोड़ दिया। यद्यपि उन्होंने जिन लीलाओंका वर्णन नहीं करके छोड़ दिया था, तथापि उन लीलाओंको उन्होंने संक्षेपमें लिखकर रखा है॥ 83-84 ॥ विष्णु, वैष्णव और शुद्धविष्णुभक्तिके सम्बन्धमें चूड़ान्त (सर्वोत्तम) ग्रन्थ चैतन्यभागवत ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण :- चैतन्य-मङ्गले तँहो लिखियाछे स्थाने स्थाने। सेइ वचन शुन, सेइ परम-प्रमाणे ॥ 85 ॥ “संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय कथने। विस्तारिया वेदव्यास करिबेन वर्णने ॥” 86 ॥ चैतन्यमङ्गले इहा लिखियाछे स्थाने-स्थाने। सत कहेन, —'आगे व्यास करिला वर्णने ॥' 87 ॥ अनुवाद—उन्होंने चैतन्यमङ्गलमें (चैतन्यभागवतमें) स्थान-स्थानपर लिखा है, उस वचनको आप सुनिये, वही सर्वोत्तम प्रमाण है, —“मैंने महाप्रभुकी लीलाओंका संक्षेपमें ही वर्णन किया है, विस्तारपूर्वक उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। विस्तारपूर्वक वेदव्यास उसका वर्णन करेंगे।” चैतन्यमङ्गलमें (चैतन्यभागवतमें) उन्होंने स्थान-स्थानपर यही लिखा है। उन्होंने सत्य ही कहा है,—'आगे व्यासने वर्णन किया है॥ '85-87 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें, —'आगे व्यास करिबेन वर्णने (आगे व्यास वर्णन करेंगे)' अर्थात् चैतन्यभागवतके आदिखण्डके (1/180) में - “शेषखण्डे चैतन्येर अनन्त विलास। विस्तारिया वर्णिते आछेन वेदव्यास ॥” [अर्थात् “शेषखण्डमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अनन्त विलास हैं, जिन्हें वेदव्यास विस्तारसे वर्णन करेंगे।”] आदि बहुतसे वचन श्रील कविराज गोस्वामी प्रमुख परवर्ती गौरलीला-लेखक शुद्धवैष्णवाचार्योंको उद्देश्य करके ही लिखे गये हैं, —कोई-कोई इस प्रकारकी व्याख्या भी करते हैं॥ 87 ॥ अमानी और मानद ग्रन्थकारके द्वारा स्वयंको ठाकुर-वृन्दावनका उच्छिष्ट भोजी समझना :- चैतन्यलीलामृत-सिन्धु-दुग्धाब्धि-समान। तृष्णानुरूप झारी भरि' तँहो कैला पान॥ 88 ॥ ताँर झारी-शेषामृत किछु मोरे दिला। ततेके भरिल पेट, तृष्णा मोर गेला ॥ 89 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्यलीलामृत-सिन्धु दुग्धके सागरके समान है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने उस सिन्धुसे मटकी भरकर उसमें-से अपनी प्यासके अनुरूप पान किया। उन्होंने उस मटकीमें बचे हुए अमृतमें-से कुछ मुझे दिया, उतनेसे ही मेरा पेट भर गया। अब मेरी तृष्णा मिट गयी है॥ 88-89 ॥ पुनः दैन्यपूर्ण उक्ति :- आमि-अति क्षुद्र जीव, पक्षी राङ्गाटूनि। से यैछे तृष्णाय पिये समुद्रेर पानी ॥ 90 ॥ तैछे आमि एक कण छुइँलुँ लीलार। एइ दृष्टान्ते जानिह प्रभुर लीलार विस्तार ॥ 91 ॥ अनुवाद—मैं बया पक्षीकी भाँति अति क्षुद्र जीव हूँ। वह बया जैसे प्यास बुझानेके लिये समुद्रका बिन्दुमात्र पानी पीती है, वैसे मैंने भी महाप्रभुकी लीलाके एक कणका ही स्पर्श किया है। इस दृष्टान्तसे महाप्रभुकी लीलाके विस्तारको समझा जा सकता है॥ 90-91 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'राङ्गाटूनि', —छोटीसी बया पक्षी॥ 90 ॥ प्राकृत कवि और साहित्यिककी भाँति अप्राकृत कविसम्राट ग्रन्थकार अहङ्कार विमूढात्मा नहीं होकर सम्पूर्ण रूपसे श्रीकृष्णके परतन्त्र और श्रीचैतन्य-इच्छासे परिचालित :-

[ 20/92–101 बीसवाँ अध्याय 495 'आमि लिखि',—इह मिथ्या करि अनुमान। आमार शरीर—काष्ठपुतली-समान ॥ 92 ॥ अनुवाद—'मैंने चैतन्यलीलाको लिखा है'—मेरा ऐसा मानना मिथ्या विचार है। मेरा शरीर तो कठपुतलीके समान है ॥ 92 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं कठपुतलीके समान कार्य करनेमें असमर्थ हूँ; मैंने यह ग्रन्थ लिखा है—ऐसा विचार करना व्यर्थ है। तात्पर्य यह है, भगवान् और भक्तगण ही मुझसे यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं ॥ 92 ॥ स्वयंको यन्त्र-मानकर अपनी अयोग्यताका वर्णन :— वृद्ध-जरातुर आमि अन्ध, बधिर। हस्त हाले, मनोबुद्धि नहे मोर स्थिर ॥ 93 ॥ अनुवाद—मैं वृद्ध और जर्जरित हूँ, मैं प्राय अन्धा और बहरा हूँ। मेरे हाथ काँपते हैं और मेरा मन और बुद्धि भी स्थिर नहीं है ॥ 93 ॥ नाना-रोगग्रस्त,—चलिते बसिते ना पारि। पञ्चरोग-पीड़ा-व्याकुल, रात्रि-दिने मरि ॥ 94 ॥ अनुवाद—मैं अनेक प्रकारके रोगोंसे ग्रस्त हूँ—मैं न तो चल पाता हूँ और न ही बैठ पाता हूँ। मैं पाँचों इन्द्रियोंके रोगोंकी पीड़ासे दुःखित रहता हूँ, रात्रि अथवा दिनमें मैं कभी भी शरीर त्याग कर सकता हूँ ॥ 94 ॥ पूर्वे ग्रन्थे इहा करियाछि निवेदन। तथापि लिखिये, शुन इहार कारण ॥ 95 ॥ अनुवाद—यद्यपि इस बातको मैंने पहले भी इसी ग्रन्थमें लिखा है, तथापि मैं कैसे लिखता जा रहा हूँ, इसका कारण सुनिये ॥ 95 ॥ अपने उपास्य-विग्रहोंका वर्णन :— श्रीगोविन्द, श्रीचैतन्य, श्रीनित्यानन्द। श्रीअद्वैत, श्रीभक्त, आर श्रीश्रोतृवृन्द ॥ 96 ॥ श्रीस्वरूप, श्रीरूप, श्रीसनातन। श्रीरघुनाथ-दास श्रीगुरु, श्रीजीवचरण ॥ 97 ॥ मदनमोहन-कृपा लाभरूपी अपने सौभाग्यका वर्णन :— इँहा-सबार चरण-कृपाय लेखाय आमारे। आर एक हय—तँहो अतिकृपा करे ॥ 98 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्ददेव, श्रीचैतन्यदेव, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीभक्तगण और समस्त श्रीश्रोतागण, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीगुरुदेव—श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी—इन सबके चरणकमलोंकी कृपा ही मुझसे लिखवाती है। इनके अतिरिक्त एक और भी हैं, जो मुझपर बहुत अधिक कृपा करते हैं ॥ 96–98 ॥ अनुभाष्य—'श्रीरघुनाथदास श्रीगुरु'—ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामी प्रभुके भजन-शिक्षा गुरु ही श्रीरूपानुगश्रेष्ठ श्रीरघुनाथदास गोस्वामी प्रभु हैं। परवर्ती 145 संख्या और आदिलीलाके पहले अध्यायके प्रारम्भमें अनुभाष्यमें श्रीरूपानुग-आम्नाय अथवा गुरु-परम्परा देखें ॥ 97 ॥ श्रीमदनगोपाल मोरे लेखाय आज्ञा करि'। कहिते ना युयाय, तबु रहिते ना पारि ॥ 99 ॥ अनुवाद—श्रीमदनगोपाल मुझे आदेश प्रदान करके मुझसे लिखवा रहे हैं। यद्यपि यह सब कहना उचित नहीं है, तथापि मैं कहे बिना रह नहीं पा रहा हूँ ॥ 99 ॥ ना कहिले हय मोर कृतघ्नता-दोष। दम्भ करि' बलि, श्रोता, ना करिह रोष ॥ 100 ॥ श्रोताओंकी वन्दना :— तोमा-सबार चरण-धूलि करिनु वन्दन। ताते चैतन्य-लीला हैल ये किछु लिखन ॥ 101 ॥ अनुवाद—मैं अभिमान करके यह कह रहा हूँ, हे श्रोताओं! ऐसा मानकर आप मेरे प्रति रोष मत करना, क्योंकि ऐसा नहीं कहनेपर मुझपर कृतघ्नताका दोष लगेगा। मैंने आप सबके चरणोंकी धूलिकी वन्दना की