श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2501, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें484 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/35-41 ] अनुवाद—ऐसा कहते-कहते महाप्रभुके हृदयमें अत्यन्त उत्कण्ठा बढ़ गयी, वे दीनतापूर्वक पुनः श्रीकृष्णसे नामसङ्कीर्तनमें प्रीतिके लिये प्रार्थना करने लगे ॥ 35 ॥ सिद्धि अथवा साध्यभक्तिके बाह्यलक्षण :- पद्यावलीके 84वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका छठा श्लोक— “नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गद रुद्धया गिरा। पुलकैनिचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति ॥ 36 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे नाथ, आपके नामग्रहणसे कब मेरे नयनयुगल अश्रुधारासे सुशोभित होंगे? [कब] वाक्य निकलनेके समय मुखसे गद्गद-स्वर बाहर निकलेगा और मेरा समस्त शरीर पुलकावलियोंसे व्याप्त होगा ? 36 ॥ अनुभाष्य- हे प्रभो, तव नामग्रहणे (नाम-भजनकाले) मम गलदश्रुधारया (गलन्ती या अश्रुधारा तया सह) नयनं, गद्गदरुद्धया (गद्गदेन स्वरभेदेन रुद्धया) गिरा (वचसा) वदनं, पुलकैः (रोमाञ्चैः सह) निचितं (व्याप्तं) वपुः कदा भविष्यति ? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। भक्तिसन्दर्भकी 69 संख्यामें उद्धृत प्रभुकी उक्ति— “श्रुतमप्यौपनिषदं दूरे हरिकथामृतात्। यत्र सन्ति द्रवच्चित्तकम्पाश्रुपुलकादयः ॥” [अर्थात् “हरिकथामृतसे शुद्ध जीवके हृदयमें जो चित्तका द्रवीभूत होना, कम्पन, अश्रु, पुलकादि अप्राकृत सात्त्विकभाव प्रकट होते हैं, वे सब लक्षण उपनिषद्में उक्त ब्रह्मज्ञानके श्रवणसे नहीं होते, अतएव उसे दूर ही रहने दो।”] ॥ 36 ॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- प्रेमधन बिना व्यर्थ दरिद्र जीवन ! ‘दास’ करि’ वेतन मोरे देह’ प्रेमधन ! !” 37 ॥ अनुवाद-प्रेमधनके बिना दरिद्र जीवन व्यर्थ है। प्रभो ! आप मुझे सेवकके रूपमें ग्रहणकर वेतनके रूपमें अपना प्रेमधन प्रदान करें!!” 37 ॥ सिद्धि अथवा साध्यभक्तिके आन्तरिक लक्षण; अप्राकृत विप्रलम्भ (श्रीकृष्णविरह)-मूलक-भजन :- रसान्तरावेशे हइल वियोग-स्फुरण। उद्वेग, विषाद, दैन्ये करे प्रलापन ॥ 38 ॥ अनुवाद-महाप्रभुमें वियोग स्फुरित होनेपर रसान्तरके कारण आवेश आ गया। वे उद्वेग, विषाद और दैन्य भावोंके उदय होनेपर प्रलाप करने लगे ॥ 38 ॥ पद्यावलीके 327वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका सातवाँ श्लोक :- “युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्। शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द-विरहेण मे॥” 39 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे गोविन्द, आपके अदर्शनमें मुझे 'निमेष'-काल भी 'युग'के समान प्रतीत हो रहा है; नेत्रोंसे वर्षाकी भाँति अश्रु प्रवाहित हो रहे हैं, समस्त जगत् शून्यके समान लग रहा है ॥ 39 ॥ अनुभाष्य- गोविन्दविरहेण (ब्रजेन्द्रनन्दनस्य विच्छेदेन) मे (मम) निमेषेण (त्रुटिलवपरिमितकालेन अत्यल्पेन) युगायितं (युगपरिमित-कालवत् तद्वत् आचरितं) चक्षुषा (नयनेन) प्रावृषायितं (वर्षाकालीन-मेघवत् आचरितं) सर्वं जगत् शून्यायितं (शून्यवत् आचरितम्- आभातीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 39 ॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- उद्वेगे दिवस ना याय, ‘क्षण’ हैल ‘युग’-सम। वर्षार मेघप्राय अश्रु वर्षे नयन ! ! 40 ॥ गोविन्द-विरहे शून्य हइल त्रिभुवन ! तुषानले पोड़े, -येन ना याय जीवन ॥ 41 ॥ अनुवाद-श्रीनन्दनन्दनके बिना, उद्वेगके कारण मेरे