भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2506

[ 20/52–55 बीसवाँ अध्याय 489 गुरुके प्रति गौरव प्रदर्शनके लिये किञ्चित्मात्र भी हिले-डुले नहीं।”] किन्तु जब श्रीकृष्णके आनेपर उनकी सेवामें बाधा होगी, तब शुद्धभक्तोंमें श्रीकृष्णसे मिलनेकी लालसा नहीं होती। यदि श्रीकृष्ण द्वारकासे वृन्दावन आयें और एक कुञ्जमें बैठकर शोक कर रहे हों कि मैं माता-पिताको (देवकी-वसुदेवको), सोलह हजार महिषियों आदि निजजनोंको छोड़कर यहाँ क्यों आया? तब वृन्दावनवासी भक्तजनोंके हृदयमें ऐसी भावना आयेगी कि यदि हमारी सेवाके द्वारा अथवा हमसे मिलनेमें आपको कोई क्लेश है, तो आप द्वारकामें चले जाइये। इसलिये राधाजी कह रही हैं,—‘ना गणि----सेई दुख मोर सुखवर्य'—आपके विरहका दुःख हमारे लिये परम सुख है। राधाजीका भाव यही है कि किसी भी प्रकारसे श्रीकृष्णको प्रसन्नता होनी चाहिये। राधाजीने उद्धवजीको कहा था,—'यदि कृष्ण हमें छोड़ सकते है, तो हम उनको क्यों नहीं छोड़ सकती हैं? हमने भी उनको छोड़ दिया। आप मथुरामें जाकर उनसे कहना कि गोपियाँ व्रजमें बहुत आनन्दसे रह रही हैं। हे उद्धव, मैं जानती हूँ कि आपने यहाँ जो हमारी दशा देखी है, उसे कृष्णसे कहोगे। किन्तु उनको यह सब एक बारमें ही मत कहना। एक दिन थोड़ीसी बात कहना, पुनः कुछ-कुछ दिनोंके बाद थोड़ीसी अन्य-अन्य बातें कहना। पुराना कपड़ा पानीमें भीगनेपर निचोड़नेसे फट जाता है, इसलिये एक साथमें सब कुछ मत कहना। कृष्णका हृदय बड़े दुःखसे जर्जर हो चुका है। यदि वे दुःख पायेंगे तो उनका हृदय टूट जायेगा।' राधाजीका श्रीकृष्णके प्रति इतना उन्नत प्रेम है, उद्धवजीकी ऐसी धारणा ही नहीं थी। इसलिये यदि प्रियतमको या हमारे विषय श्रीकृष्णको हमसे मिलनेसे कष्ट होगा, तो हमें ऐसी अभिलाषा नहीं है और यदि उनको सुख है, तो हम उनसे मिलेंगे। प्रियतामें प्रथम लक्षण है—श्रीकृष्णको सुख हो, ऐसी क्रिया। द्वितीय लक्षण है—उनसे मिलनेकी लालसा, जिसके द्वारा उनकी सेवा कर सकें और तृतीय लक्षण है—उनकी सेवाके लिये चिन्ता करनेमें परम उल्लास हो। प्रथम लक्षण मूल लक्षण है और अन्य दो तटस्थ लक्षण हैं। इनके सम्मिलनसे प्रियता होती है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 52 ॥ निरन्तर श्रीकृष्णेन्द्रिय-तर्पण अथवा श्रीकृष्ण-सुखवर्धन चेष्टा :- ये नारीरे वाञ्छे कृष्ण, तार रूपे सतृष्ण, तारे ना पाञा हय दुःखी। मुइ तार पाये पड़ि', लञा याङ हाते धरि', क्रीड़ा कराञा ताँरे करौं सुखी ॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण जिस नारीके रूपके प्रति सतृष्ण होकर उसकी अभिलाषा करते हैं, परन्तु उसे प्राप्त नहीं कर पानेके कारण दुःखी होते हैं, मैं उस नारीके चरणोंमें पड़कर उसके हाथोंको पकड़कर श्रीकृष्णके पास ले जाऊँगी और श्रीकृष्णकी उसके साथ क्रीड़ा करवाकर मैं उन्हें प्रसन्न करूँगी ॥ 53 ॥ कान्ता कृष्णे करे रोष, कृष्ण पाय सन्तोष, सुख पाय ताड़न-भर्त्सने। यथायोग्य करे मान, कृष्ण ताते सुख पान, छाड़े मान अल्प-साधने ॥ 54 ॥ श्रीकृष्णकी सम्भोग-कामिनीका तिरस्कार :- सेइ नारी जीये केने, कृष्ण-मर्म नाहि जाने, तबु कृष्णे करे गाढ़ रोष। निज-सुखे माने लाभ, पड़ुक तार शिरे बाज, कृष्णेर मात्र चाहिये सन्तोष ॥ 55 ॥ अनुवाद—कान्ता यदि श्रीकृष्णके प्रति रोष प्रदर्शित करती है, तो श्रीकृष्ण उससे सन्तुष्ट होते हैं। वे कान्ताके द्वारा डाँट-फटकार और तिरस्कार करनेपर प्रसन्न होते हैं। जब कान्ता यथायोग्य मान करती है, तब श्रीकृष्णको सुख प्राप्त होता और उनके थोड़े प्रयाससे ही कान्ता अपने मानको छोड़ देती है। किन्तु