भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2507

490 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/54-58 ] जो नारी कृष्णके मर्मको नहीं जानकर कृष्णके प्रति गाढ़ रोष करती है, वह जीवित ही क्यों रहती है? जो अपने सुखमें ही लाभ मानती है, उसके सिरपर तो वज्र पड़ना ही चाहिये। मैं तो केवल श्रीकृष्णका ही सन्तोष चाहती हूँ॥ 54-55॥ अनुभाष्य-जो भक्त अपने सुखमें अपनेको कृतार्थ मानता है, उसका सर्वनाश हो जाता है, वह प्राकृत सम्भोग-परायण सहजिया 'अभक्त' हो जाता है॥ 54-55॥ श्रीकृष्णका सुख विधान करनेवाली अपने प्रतिकूल श्रीकृष्णसेविकाका भी आदर :- ये-गोपी मोर करे द्वेषे, कृष्णेरे करे सन्तोषे, कृष्ण यारे करे अभिलाष। मुइ तार घरे याञा, तारे सेवों दासी हञा, तबे मोर सुखेर उल्लास॥ 56॥ अनुवाद-जो गोपी श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करती है और श्रीकृष्ण भी उसकी अभिलाषा करते हैं, किन्तु वह मुझसे द्वेष करती है, तथापि मैं उस गोपीके घरमें जाकर उसकी दासी बनकर उसकी सेवा करूँगी, तभी मेरा सुख वर्धित होगा॥ 56॥ कोढ़-रोगी ब्राह्मणकी पत्नीके पतिव्रता-धर्मका वर्णन :- कुष्ठी-विप्रेर रमणी, पतिव्रता-शिरोमणि, पति लागि' कैल वेश्यार सेवा। स्तम्भिल सूर्येर गति, जीवाइल मृत पति, तुष्ट कैल मुख्य तिन देवा॥ 57॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कहा जाता है कि किसी कोढ़से ग्रस्त ब्राह्मणकी पतिव्रता स्त्रीने पतिकी सन्तुष्टिके लिये पतिकी प्रिया वेश्याकी सेवा की थी; पतिकी मृत्युके समय पातिव्रत्यके बलसे उसने सूर्यकी गतिको रोककर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर-इन तीन देवताओंको सन्तुष्ट करके अपने मृत पतिको जीवित किया था। तात्पर्य यह है कि कृष्णके प्रति दृढ़-पातिव्रत्य ही जीवका शृङ्गाररससे उत्पन्न उत्तम धर्म है॥ 57॥ अनुभाष्य-आदित्य-पुराणमें और मार्कण्डेय-पुराण (15/19)में एवं पद्मपुराणमें उल्लिखित है कि किसी कोढ़ी ब्राह्मणकी पतिव्रता-शिरोमणि पत्नीने अपने अयोग्य कोढ़ी पतिकी वासनाकी परितृप्तिके लिये पापके वासस्थान वेश्याके भवनको शुद्ध करके वेश्याके साथ अपने निकम्मे कामुक पतिके सम्मिलनका प्रयास किया था। वेश्याके द्वारा उसकी बातको मान लेनेपर पतिव्रता ब्राह्मणी अपने कोढ़ी पतिको उसकी इच्छानुसार वेश्यालयमें ले गयी। वह कोढ़ी पापी नाममात्रका ब्राह्मण पतिव्रता पत्नीकी निष्ठाको देखकर अन्तमें पापसे सम्पूर्ण रूपसे निवृत्त होकर जब रात्रिमें अपने घर लौट रहा था, तब माण्डव्य-ऋषिके शरीरसे उसके पैरके स्पर्श होनेपर ऋषिने उसे अभिशाप दिया। पतिव्रता ब्राह्मणीने जब सुना कि उसके पतिके अनजानेमें किये गये कर्मसे समाधिके भङ्ग होनेके कारण ऋषिने क्रोधित होकर 'सूर्योदयके बाद ही उसके प्राण छूट जायेंगे' ऐसा कहकर अभिशाप दिया है एवं उसके फलस्वरूप पतिव्रता होनेपर भी उसका विधवा बनना अवश्यम्भावी है, तब उसके निवारणके लिये उसने सूर्योदयको स्थगित करनेकी प्रतिज्ञा की। उसके इस प्रयासको देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव,-इन प्रधान तीन देवोंने उसके पास आकर पतिव्रताकी पति-परायणतासे सन्तुष्ट होकर उसके पतिके पुनः स्वस्थ होने और नवजीवन प्राप्तिकी व्यवस्था कर दी। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार अपने स्वार्थसे रहित होकर केवल पातिव्रत्य ही (केवल-सेव्यके सुखकी वाञ्छा ही) शुद्धभक्तजनोंके लिये उचित है॥ 57॥ “कृष्णप्रेमभावित-चित्त-इन्द्रियकाया” :- कृष्ण-मोर जीवन, कृष्ण-मोर प्राणधन, कृष्ण-मोर प्राणेर पराण। हृदय-उपरे धरौं, सेवा करि' सुखी करौं, एइ मोर सदा रहे ध्यान॥ 58॥