श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2508, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/58-64 बीसवाँ अध्याय 491
अनुवाद—श्रीकृष्ण मेरे जीवन स्वरूप हैं, श्रीकृष्ण मेरे प्राणधन हैं, श्रीकृष्ण मेरे प्राणोंके भी प्राण हैं। मैं श्रीकृष्णको सदा अपने हृदयमें धारण करती हूँ, उनकी सेवा करके उन्हें सुखी करूँ, यह बात ही सदा मेरे ध्यानमें रहती है॥58॥
अनुवाद—श्रीराधाके ये वचन विशुद्ध प्रेमके लक्षण प्रकाशित करनेवाले हैं, श्रीगौरसुन्दर उन्हींका आस्वादन कर रहे थे। श्रीराधाकी भावावस्थामें होनेके कारण उनका मन अस्थिर हो गया, उनके सम्पूर्ण शरीरमें सात्त्विक भाव प्रकट हो गये और वे अपने मन एवं देहको धारण नहीं कर पा रहे थे॥61॥
समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णसुखका विधान और निरन्तर श्रीकृष्ण-किङ्करी होनेका अभिमान :—
मोर सुख—सेवने, कृष्णेर सुख—सङ्गमे, अतएव देह देङ दान। कृष्ण मोरे ‘कान्ता’ करि’, कहे मोरे ‘प्राणेश्वरी’, मोर हय ‘दासी’-अभिमान॥59॥
श्रीकृष्णोन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छामें आत्मेन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छाका अभाव; स्वभजन-विप्रलम्भ-प्रयोजनावतार महावदान्य श्रीगौरका शिक्षाष्टकके द्वारा जीवको सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनात्मक श्रीमद्भागवतके फलके सारका वितरण :—
व्रजेश्वर-शुद्धप्रेम,— येन जाम्बुनद-हेम, आत्मसुखेर याँहा नाहि गन्ध। स्व-प्रेम जानांते लोके, प्रभु कैला एड् श्लोके, पद कैला अर्थेर निर्बन्ध॥62॥
अनुवाद—मेरा सुख श्रीकृष्णकी सेवा करनेमें है और श्रीकृष्णका सुख मुझसे मिलनेमें है, इसलिये मैं श्रीकृष्णको अपनी देह समर्पित करती हूँ। कृष्ण मुझे अपनी कान्ता मानकर अपनी प्राणेश्वरी कहते हैं, किन्तु मैं स्वयंको उनकी दासी ही मानती हूँ॥59॥
अनुवाद—श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति विशुद्धप्रेम जाम्बुनदीके सोनेकी भाँति है, उसमें आत्म-सुखकी गन्ध तक भी नहीं है। अपने उसी प्रेमका इस जगत्में प्रचार करनेके लिये महाप्रभुने (शिक्षाष्टकके) आठवें श्लोककी रचना की और उसके गूढ़ अर्थको प्रकाशित करनेवाले पदोंकी रचना की॥62॥
सम्भोगकी अपेक्षा सेवामें ही सेविकाकी असीम प्रीति :—
कान्त-सेवा-सुखपूर, सङ्गम हैते सुमधुर, ताते साक्षी—लक्ष्मी ठाकुराणी। नारायण-हृदि स्थिति, तबु पादसेवाय मति, सेवा करे ‘दासी’-अभिमानी॥"60॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें, 'व्रजेर विशुद्धप्रेम' (व्रजका विशुद्ध प्रेम), पाठान्तरमें, 'से-प्रेम' (वह-प्रेम)॥62॥
एइमत महाप्रभु भावाविष्ट हञा। प्रलाप करिला किछु श्लोक पड़िया॥63॥
अनुवाद—कान्त-सेवा सुखकी पूर्ण अवधि है, सेवा-सुख सङ्गमसे भी अधिक मधुर है, इसकी साक्षी लक्ष्मी ठाकुरानी हैं। यद्यपि वे नारायणके हृदयमें स्थित रहती हैं, तथापि नारायणकी चरणसेवा ही उनकी अभिलाषा है। इसलिये वे स्वयंको नारायणकी दासी मानकर उनकी सेवा करती हैं॥"60॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु भावमें आविष्ट हो गये। उन्होंने प्रलाप करते हुए कुछ श्लोक पढ़े॥63॥
इस शिक्षाष्टकके स्वयं ही आस्वादक और स्वयं ही प्रचारक :—
श्रीराधा-भावमय महाप्रभुके द्वारा केवल प्रेम-आस्वादन :—
एइ राधार वचन, शुद्ध प्रेम-लक्षण, आस्वादये श्रीगौर-राय। भावे मन नहे स्थिर, सात्त्विके व्यापे शरीर, मन-देह धारण ना याय॥61॥
पूर्वे अष्ट-श्लोक करि’ लोके शिक्षा दिला। सेइ अष्ट-श्लोक आपने आस्वादिला॥64॥