श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें492 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/64-72 ] अनुवाद-पहले महाप्रभुने आठ श्लोकोंकी रचना करके लोगोंको उसकी शिक्षा प्रदान की। और फिर उन्होंने स्वयं भी उन आठ श्लोकोंकी व्याख्या करके उनका आस्वादन किया॥ 64॥ 'श्रीशिक्षाष्टक'के श्रवण-कीर्तनसे निश्चय ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- प्रभुर् 'शिक्षाष्टक'-श्लोक येइ पड़े, शुने। कृष्णे प्रेमभक्ति तांर बाड़े दिने दिने ॥ 65 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा रचित 'शिक्षाष्टक'के श्लोकोंको जो व्यक्ति पढ़ता और सुनता है, उसके हृदयमें श्रीकृष्णके प्रति प्रेमभक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है॥ 65॥ पूर्णचन्द्रके उदित होनेपर समुद्रके उफननेके समान अतुल गम्भीरता होनेपर भी विप्रलम्भसे उत्पन्न दिव्योन्माद-महाभावमें महाप्रभुकी सदैव अस्थिरता :- यद्यपि प्रभु-कोटिसमुद्र-गम्भीर। नाना-भाव-चन्द्रोदये हयेन अस्थिर ॥ 66 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु करोड़ों समुद्रोंसे भी अधिक गम्भीर थे, तथापि अनेक भावरूपी चन्द्रमाओंके उदित होनेपर वे अस्थिर हो जाते थे॥ 66॥ महाभागवत, मुक्त, परमहंसगणोंके नित्य आस्वाद्य और विप्रलम्भ भावमें आविष्ट महाप्रभुकी प्रिय ग्रन्थावली :- येइ येइ श्लोक जयदेव, भागवते। रायेर नाटके, येइ आर कर्णामृते ॥ 67 ॥ सेइ सेइ भावे श्लोक करिया पठने। सेइ सेइ भावावेशे करेन आस्वादने ॥ 68 ॥ अनुवाद-जो-जो श्लोक श्रीजयदेवके गीत-गोविन्दमें, श्रीमद्भागवतमें, श्रीरायरामानन्दके जगन्नाथवल्लभ-नाटकमें और श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुर कृत श्रीकृष्णकर्णामृतमें वर्णित हैं, महाप्रभु उन-उन भावोंके अनुरूप श्लोकोंका पाठ करके उन-उन भावोंके आवेशमें उनका आस्वादन करते थे॥ 67-68॥ अनुभाष्य— 'जयदेव,'-अर्थात् उनके द्वारा रचित अष्टपदी अथवा गीतगोविन्द ॥ 67 ॥ अन्तिम बारह वर्षोंकी अन्त्यलीलामें निरन्तर कृष्णप्रेमका आस्वादन :- द्वादश वत्सर ऐछे दशा-रात्रि-दिने। कृष्णरस आस्वाद्ये दुइबन्धु-सने ॥ 69 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी बारह वर्षों तक रात-दिन ऐसी ही दशा थी। वे अपने दो बन्धुओंके (श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामStore/रामानन्दके) साथ कृष्णरसका आस्वादन करते थे॥ 69॥ साक्षात् भगवान् शेष-विष्णुकी भी महाप्रभुकी श्रीकृष्णप्रेम-दशाके वर्णनमें असमर्थता :- सेइ रस-लीला सब आपने अनन्त। सहस्र-वदने वर्णि' नाहि पांन अन्त ॥ 70 ॥ महासुकृतिके फलसे जीव उस सागरकी एक बूँदके स्पर्शसे धन्य :- जीव क्षुद्रबुद्धि कोन् ताहा पारे वर्णिते? तार एक कणा स्पर्शि आपना शोधिते ॥ 71 ॥ ग्रन्थके बड़े हो जानेके भयसे महाप्रभुकी प्रेमचेष्टा-वर्णनको विश्राम :- यत चेष्टा, यत प्रलाप,-नाहि पारावार। से-सब वर्णिते ग्रन्थ हय सुविस्तार ॥ 72 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी उन लीलाओंके रसका स्वयं अनन्त भी अपने सहस्र मुखोंके द्वारा वर्णन करके अन्त नहीं पाते। तब फिर क्षुद्रबुद्धिवाला कोई जीव कैसे उस लीला-रसका वर्णन कर सकता है? मैं तो स्वयंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे ही उसके एक कणका स्पर्श कर रहा हूँ। महाप्रभुकी जितनी चेष्टाएँ और जितने प्रलाप हैं, उनका कोई अन्त नहीं है। उन सबका वर्णन करनेसे ग्रन्थका बहुत विस्तार हो जायेगा॥ 70-72॥