श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2510, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/73-83 बीसवाँ अध्याय 493 चैतन्यभागवतमें विस्तृत वर्णन-हेतु इस ग्रन्थमें संक्षेपमें वर्णित, वहाँ संक्षेपमें वर्णन-हेतु यहाँपर विस्तृत वर्णित :- वृन्दावन-दास प्रथम ये लीला वर्णिल। सेइसब लीलार आमि सूत्रमात्र कैल॥ 73 ॥ ताँर त्यक्त 'अवशेष' संक्षेपे कहिल। लीलार बाहुल्ये ग्रन्थ तथापि बाड़िल ॥ 74 ॥ अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने पहले जिन लीलाओंका श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णन किया है, मैंने उन समस्त लीलाओंको केवल सूत्ररूपमें ही लिखा है। मैंने उनके द्वारा बची हुई महाप्रभुकी लीलाओंका संक्षेपमें वर्णन किया है, तथापि लीलाओंके आधिक्यके कारण ग्रन्थका विस्तार हो गया है॥ 73-74 ॥ अतएव सेइसब लीला ना पारि वर्णिवारे। समाप्त करिलुँ लीला करि' नमस्कारे ॥ 75 ॥ ये किछु कहिलुँ एइ दिग्दर्शन। एइ अनुसारे हवे तार आस्वादन ॥ 76 ॥ स्वयं श्रीचैतन्यकी इच्छासे परिचालित होनेपर भी ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- प्रभुर गम्भीर लीला ना पारि बुझिते। बुद्धि-प्रवेश नाहि, ताते ना पारि वर्णिते ॥ 77 ॥ अनुवाद-अतएव मेरे लिये महाप्रभुकी समस्त लीलाओंका वर्णन करना सम्भव नहीं है, इसलिये मैं उनकी लीलाओंको नमस्कार करके इस ग्रन्थको समाप्त कर रहा हूँ। मैंने अभी तक जो कुछ वर्णन किया है, वह उन लीलाओंका दिग्दर्शन मात्र है, इसके अनुसार ही भक्तगण उन लीलाओंका आस्वादन करेंगे। मैं महाप्रभुकी गम्भीर लीलाओंको नहीं समझ पाया, मेरी बुद्धिका उन लीलाओंमें प्रवेश नहीं है, इसलिये मैं उनका वर्णन नहीं कर पाया॥ 75-77 ॥ मानद ग्रन्थकारके द्वारा श्रोतृवर्गकी वन्दना :- सब श्रोता-वैष्णवेर वन्दिया चरण। चैतन्यचरित्र-वर्णन कैलुँ समापन ॥ 78 ॥ अनुवाद-मैं समस्त श्रोता-वैष्णवोंके चरणोंकी वन्दना करके चैतन्यचरित्रका वर्णन समाप्त कर रहा हूँ॥ 78 ॥ अलौकिक अधोक्षज श्रीगौरलीला-सिन्धु-बद्धजीवके स्पर्शसे परे, जीवके अभिमानमें दैन्यसे भरकर ग्रन्थकारके द्वारा उसके बिन्दुको स्पर्श करनेकी चेष्टा-मात्र :- आकाश-अनन्त, ताते यैछे पक्षीगण। यार यत शक्ति, तत करे आरोहण ॥ 79 ॥ ऐछे महाप्रभुर लीला नाहि ओर-पार। 'जीव' हञा केबा सम्यक् पारे वर्णिवार ? ॥ 80 ॥ अनुवाद-आकाश अनन्त है और जिस पक्षीकी जितनी शक्ति होती है, वह आकाशमें उतनी ऊँचाई तक उड़ता है। ऐसे ही महाप्रभुकी लीलाओंका भी ओर-छोर नहीं है, तब साधारण जीव कैसे उसका सम्पूर्ण रूपसे वर्णन कर सकता है? 79-80 ॥ अनुभाष्य-भा: 1/18/23 श्लोक देखें॥ 79 ॥ यावत् बुद्धिर गति, ततेक वर्णिलुँ। समुद्रर मध्ये येन एक कण छुँइलुँ ॥ 81 ॥ अनुवाद-मेरी बुद्धिकी जहाँ तक गति है, मैंने महाप्रभुकी लीलाओंका वहाँ तक वर्णन किया है, मानो मैंने समुद्रके एक कणको ही स्पर्श किया हो ॥ 81 ॥ श्रीठाकुर वृन्दावनका माहात्म्य और श्रीगौरलीला :- नित्यानन्द-कृपापात्र-वृन्दावन-दास। चैतन्यलीलाय तेंहो हयेन 'आदिव्यास' ॥ 82 ॥ अनुवाद-श्रीवृन्दावन-दास ठाकुर श्रीनित्यानन्द प्रभुके कृपापात्र हैं और वे चैतन्यलीलाके 'आदिव्यास' हैं॥ 82 ॥ अनुभाष्य-कोई-कोई कहते हैं कि,-परवर्ती शुद्ध गौरलीला-लेखक आचार्यगण भी 'आदिव्यास' श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके आनुगत्यमें उनके अभिन्न अङ्ग अथवा 'प्रकाश-व्यास'-कहलाये जा सकते हैं॥ 82 ॥ ताँर आगे यद्यपि सब लीलार भाण्डार। तथापि अल्प वर्णिया छाड़िलेन आर ॥ 83 ॥