श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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श्रीकृष्ण यदि दूर हैं, तो वे कैसे प्रसन्न करेंगे? यदि श्रीकृष्ण सब समय ही यशोदाजी से दूर रहें, तो वे कैसे उनकी सेवा करेंगी? यशोदाजी कृष्णको अपनी गोदमें लेकर प्यार करना चाहती हैं। कभी-कभी उनके लिये इसलिये रोती हैं कि वह मक्खन नहीं चुराता, मैं उसकी कमर नहीं बाँधती। विरहमें रोते समय कहती हैं,-'अहो! कृष्ण कितना चञ्चल था। उसकी यह चञ्चलता कितनी प्यारी लगती थी। मेरी सखियाँ आकर उलाहना देती थीं कि कृष्ण हमारे घरमें आकर मक्खन चोरी करता है और मक्खन नहीं मिलता तो मटकी फोड़ देता है, कभी बछड़ोंको असमयमें खोल देता है। मुझे और रोहिणीको दिनभर व्यस्त रखता था। कभी इधर जाता था, कभी उधर जाता था, कभी बन्दरको पकड़ लेता था, कभी किसी साँडके सींगको पकड़ लेता था और कभी लटकती हुई तलवारको पकड़ लेता था। मैं इधर आती थी, तो वह उधर कुछ उत्पात करता था।' तो यशोदाजी को यह अच्छा लगता था या बुरा? उनको बहुत अच्छा लगता था। वे कभी थोड़ा क्रोध करती थीं कि मैं दिन भर तुम्हारे कारण व्यस्त रहती हूँ, कुछ देर शान्त नहीं बैठ सकते हो? और जब श्रीकृष्ण द्वारका चले गये, तब यशोदाजी उन सब लीलाओंका चिन्तन करके कितने दुःखसे रोती हैं कि वह सब समय हमको व्यस्त रखता था। परन्तु जब तक श्रीकृष्ण निकट नहीं रहेंगे, तब तक सेवा नहीं होगी। श्रीकृष्ण दूर रहें अथवा निकट रहें-उनको प्रसन्न करनेकी जो क्रिया होती है-यह प्रियताका स्वरूप लक्षण है। उनको प्राप्त करनेकी अभिलाषा किसलिये होती है? इसलिये कि उसके द्वारा उनकी अनुकूल रूपसे सेवा करनेका सुयोग मिलता है-यह प्रियताका तटस्थ लक्षण है। यदि किसी व्यक्तिके अन्दरमें श्रीकृष्णको पानेका भाव नहीं है कि वे दूर रहें या कहीं भी रहें, वे प्रसन्न रहें, तो ऐसे व्यक्तिमें कभी भी प्रेमाभक्ति या सेवाका भाव नहीं होता। भगवान् हमें मिलें या न मिलें, जब वे प्रसन्न होंगे तो आ जायेंगे। हम लोगोंको कोई चिन्ता करने अथवा साधन-भजन करनेकी आवश्यकता नहीं हैं, केवल वे प्रसन्न रहें-ऐसा ब्रह्मवादी लोगोंका विचार होता है। किन्तु प्रियजनके प्रतिकूल या अपने सुखके लिये उनको प्राप्त करनेकी अभिलाषा भी प्रियताके प्रतिकूल है। जैसे ध्रुव महाराजको भगवान्को प्राप्त करनेकी लालसा हुई, किन्तु केवल विशाल राज्यकी प्राप्तिके लिये, उनकी सेवा करनेके भावसे नहीं। यह प्रियता नहीं है। यदि प्रियजनको मिलनेसे उनके सुखमें कोई बाधा होती है, तब उस अवस्थामें साधक या कोई भी व्यक्ति उनसे मिलना नहीं चाहता, यह प्रियताका प्रतिकूल भाव है। इस विषयमें एक और भी विचार है-यदि श्रीकृष्ण अथवा गुरुके मिलनेसे हमारे सुखमें बाधा आ जाय, तो उस समय उनसे मिलनेकी लालसा नहीं होती। जैसे किसी शिष्यकी लोग प्रशंसा कर रहे हैं, उसको उपहार दे रहे है और उस समय वहाँ गुरुजी आयें, तो शिष्यको छोड़कर सभी गुरुजीको प्रणाम करके उनका सम्मान करेंगे। तब उस शिष्यके मनमें यह भावना आयेगी कि गुरुजी नहीं आते तो अच्छा होता। जैसे सभामें बृहस्पतिजीके आनेपर इन्द्रने किया था। (भाः 6/7/7-8)- स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्च ह। नाभ्यनन्दत संप्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभिः ॥ 7 ॥ वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम्। नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्नपि सभागताम् ॥ 8 ॥ [अर्थात् “इसी समय देवताओंके और स्वयं देवराज इन्द्रके परमगुरु एवं सुर-असुर सभीके पूजनीय मुनिश्रेष्ठ बृहस्पति सभामण्डलमें उपस्थित हुए। अपने सम्मुख देवगुरु बृहस्पति को आया देखकर भी देवराज इन्द्र अपने सिंहासनसे नहीं उठे और न ही उन्हें आसनादि प्रदान करके उनका अभिनन्दन किया। यहाँ तक कि