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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2504

[ 20/52 बीसवाँ अध्याय 487 तात्पर्यमय कर्मकाण्डको ही अपनी भजन-चेष्टाका 'फल' मानते हैं। वास्तवमें उनकी इस प्रकारकी चेष्टा और कल्पना-शुद्धभजनके विषयमें कपटतामूलक अनभिज्ञताका ही फलमात्र है॥ 52 ॥ अमृतानुकणिका-श्रीजीव गोस्वामीने प्रीति-सन्दर्भमें प्रीतिके तीन लक्षण बतलाये हैं-

  1. स्वरूप-लक्षण-'विषयानुकूल्यात्मक'-प्रीतिके विषय श्रीकृष्णके अनुकूल जो उन्हें सुखकर हो अथवा श्रीकृष्णको प्रीतिकर हो जिसके द्वारा कृष्ण प्रसन्न हों, भक्तका यही एकमात्र ध्येय होता है।
  2. तटस्थ-लक्षण (क)-'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा अर्थात् भक्तकी जितनी भी स्पृहाएँ होती हैं, वे श्रीकृष्णके सुखके लिये होती हैं।
  3. तटस्थ-लक्षण (ख)-'तदनुभव-हेतुकोल्लास'-ज्ञान। जैसे यशोदाजी कृष्णको गोदीमें लेकर प्यार कर रही हैं। शिशु कृष्णके अभी दो दाँत ही निकले हैं और वे मुस्कुराने लगे। कृष्णको मुस्कराते देखकर यशोदाजीकी प्रीति और वर्धित हो गयी और उनका मन उल्लाससे भर गया। कृष्णको प्रसन्न देख करके यशोदाजीको जो प्रसन्नता होती है, उसको अनुभव-हेतुकोल्लासमय ज्ञान कहते हैं। 'विषयानुकूल्यात्मक'-श्रीकृष्ण-प्रीतिके आश्रय भक्तोंकी अनुकूल भावसे श्रीकृष्णैक-सुखतात्पर्यमयी चेष्टाएँ होती हैं, उसके विरोधमें उनका कोई भी कार्य नहीं होता। साधकको भी कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये जो श्रीकृष्ण, गुरु अथवा वैष्णवोंके लिये प्रीतिकर नहीं हो। यशोदाजीका कृष्णके प्रति अनुकूल भाव है। किन्तु कभी वे कृष्णके लिये ही उनको छोड़कर दूधकी रक्षा अथवा रसोईकी व्यवस्था करने चली जाती हैं। यद्यपि उनके ऐसे कार्यसे कृष्ण रोने लगते हैं, तथापि यह प्रतिकूल भाव नहीं है। यशोदाजी यह समझती हैं कि कृष्ण अभी अबोध बालक है, उसको पूरा ज्ञान नहीं है। वे ये सब कार्य भी कृष्णके अनुकूल भावसे ही करती हैं। कभी राधाजी कृष्णको छोड़कर चली जा रही हैं और कृष्ण उन्हें रोकनेका प्रयास कर रहे हैं, परन्तु वे रुक नहीं रहीं। यह भी कृष्णके सुखके लिये है। यह राधाजीका जो वक्र भाव है जिसे 'मान' कहते हैं, यह प्रेमका ही विकार है। अनुकूल भावसे ही कृष्णसेवा उनके प्राण-स्वरूप है, यह प्रीतिका स्वरूप- लक्षण है। 'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा अर्थात् भक्तमें कृष्णको पानेकी इच्छा होती है जिसके द्वारा वह श्रीकृष्णकी सेवा करके उनको प्रसन्न कर सके। इसलिये श्रीकृष्णसे मिलनेकी लालसा उत्पन्न होना एक तटस्थ लक्षण है। जैसे श्रीकृष्ण द्वारकामें हैं और गोपियाँ उनसे बहुत दूर वृन्दावनमें हैं। उनको श्रीकृष्णसे मिलने की लालसा क्यों होती है? द्वारकामें श्रीकृष्णने सोलह हजार महिषियोंके साथ विवाह किया है और यदि वे बहुत आनन्दसे उनके साथमें रह रहे हैं, तो गोपियाँ उनसे मिलनेके लिये क्यों इतनी आतुर हैं? यद्यपि राधाजी कहती हैं-'ना गणि आपन दुःख, सबे वाञ्छि ताँर सुख',-तो श्रीकृष्ण द्वारकामें आनन्दसे रहें। तथापि राधाजीकी सब समय श्रीकृष्णसे मिलनेकी स्पृहा है। यदि श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जीवन द्वारकामें ही सुखसे रहें और गोपियोंसे कभी भी न मिलें, तो क्या गोपियाँ या राधाजी प्रसन्न होंगी? उनका क्या ऐसा विचार होगा कि श्रीकृष्णका द्वारकामें सब समय सुखमय जीवन हो और हमको उनका विरह हो, क्योंकि विप्रलम्भ रस सबसे श्रेष्ठ है? तो क्या ऐसा विप्रलम्भ भाव भक्तोंको और व्रजवासियोंको चाहिये कि भले ही श्रीकृष्ण हमको न मिले और वे सदा ही द्वारकामें रहें, हम उनसे मिलना नहीं चाहते, वे सदा वहीं प्रसन्न रहें? नहीं। इसलिये प्रियताका 'आनुकूल्यानुगत'-स्पृहा तटस्थ लक्षण भी अवश्य उसके साथ रहेगा। राधाजी और व्रजवासियोंकी श्रीकृष्णसे मिलनेकी उत्कण्ठा सदा रहेगी और मिलना चाहते हैं, किसलिये? इसलिये कि वे श्रीकृष्णकी सेवा कर सकें और उनको प्रसन्न कर सकें।