श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2503, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें486 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/48-52 ] श्लोकके अर्थकी व्याख्या ; “मैं आपकी हूँ, आप मेरे हैं, अन्य किसी वस्तुकी क्या आवश्यकता है?” :- आमि—कृष्णपद-दासी, तेंहो—रससुखराशि, आलिङ्गिया करे आत्मसाथ। किवा ना देय दरशन, ना जाने मोर तनु-मन, तबु तेंहो—मोर प्राणनाथ॥48॥ अनुवाद—सखि! मैं तो श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी दासी हूँ और वे रसिकशेखर सुखके सागर हैं। वे प्रगाढ़ आलिङ्गनके द्वारा मुझे आत्मसात् करें अथवा अपने दर्शन न देकर मर्मान्तिक पीड़ा प्रदान करें, तथापि वे मेरे प्राणनाथ ही हैं॥48॥ सखि हे, शुन मोर मनेर निश्चय। किवा अनुराग करे, किवा दुख दिया मारे, मोर प्राणेश्वर—कृष्ण, अन्य नय॥49॥ अनुवाद—हे सखि, मेरे मनके निश्चयको सुनो। श्रीकृष्ण मेरे प्रति अपने अनुरागको प्रकट करें अथवा मुझे दुःख देकर मार डालें, तथापि श्रीकृष्ण ही मेरे प्राणेश्वर हैं, अन्य कोई नहीं॥49॥ मदीयत्व और तदीयत्व-स्नेह, अथवा मधु और घृत स्नेह-माधुर्य-वैचित्र्य-वर्णन; उनके साथ मेरे सुखकालमें भी कृष्णेन्द्रिय-तर्पणकी इच्छुक मैं उनकी परतन्त्र :- छाड़ि' अन्य नारीगण, मोर वश तनुमन, मोर सौभाग्य प्रकट करिया। ता-सबारे देय पीड़ा, आमा-सने करे क्रीड़ा, सेइ नारीगणे देखाञा॥50॥ उनके विरहमें मेरे दुःखकालमें भी श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंके तर्पणकी इच्छुक मैं उनकी परतन्त्र :- किवा तेंहो लम्पट, शठ, धृष्ट, सकपट, अन्य नारीगण करि' साथ। मोरे दिते मनःपीड़ा, मोर आगे करे क्रीड़ा, तबु तेंहो—मोर प्राणनाथ॥51॥ अनुवाद—मेरे सौभाग्यको प्रकटकर यदि श्रीकृष्ण अन्य रमणियोंको त्यागकर मेरे तन और मनके सम्पूर्णरूपसे वशीभूत होवें और उन रमणियोंको दिखला-दिखलाकर उनके सामने मेरे साथ क्रीड़ा करके उन सबको पीड़ा दें अथवा वे लम्पट, शठ, धृष्ट, कपटी श्रीकृष्ण अन्य रमणियोंको अपने साथ लेकर मेरे मनको पीड़ा प्रदान करनेके लिये मेरे समक्ष उनके साथ क्रीड़ा करें, तब भी वे ही मेरे प्राणनाथ हैं॥50-51॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मोरे वश तनुमन',—काय और मनके एकान्त बाध्य॥50॥ एकान्तिकी कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छा—'तुम्हारी सेवा करनेमें जितना भी दुःख मिले, वही परम सुख हैं' :- ना गणि आपन दुःख, सबे वाञ्छि ताँर सुख, ताँर सुख—आमार तात्पर्य। मोरे यदि दिया दुःख, ताँर हैल महासुख, सेइ दुःख—मोर सुखवर्य॥52॥ अनुवाद—मुझे अपने कष्टोंकी तनिक भी चिन्ता नहीं है, मैं सदा-सर्वदा श्रीकृष्णके सुखकी कामना करती हूँ। उन्हें सर्वप्रकारसे सुखी रखना ही मेरे जीवनका मूल उद्देश्य है। यदि मुझे दुःख देनेसे उन्हें सुख मिले, तो वह दुःख ही मेरे लिये परम सुख है॥52॥ अनुभाष्य—भक्त अपने सुख-दुःखको नहीं गिनता; जिससे श्रीकृष्णके सुखका उदय होता है, वह उसके लिये ही अखिल चेष्टायुक्त रहता है। श्रीकृष्णके सुखके उदयके अतिरिक्त भक्तका अपना स्वतन्त्र सुख अन्य कुछ भी नहीं है। श्रीकृष्णके द्वारा भक्तको दुःख देकर महासुखी होनेपर, भक्त उस प्रकारके दुःखको ही सर्वोत्तम निज-सुख मानता है। प्राकृत रसिकाभिमानी अतत्त्वज्ञ सहजिया-सम्प्रदायमें कोई-कोई अपने सुखकी अभिलाषाको ही इच्छित फल मानते हैं, कोई प्राकृतसुखकी अपेक्षा कृष्णसेवाके उपलक्षमें 'स्वयं ही अधिकतर सुखभोग करूँगा',—आदि नाना प्रकारके स्वसुखभोग-